Renu Arun

Saahitya Ki Orr

Arts HI ↓ 144 episodios

Listen to the invaluable stories and poetries from our rich Hindi literature. Stories from eminent writers and creators like Munshi Premchand, Fanishwar Nath Renu, Amrita Pritam, Mahadevi Verma, and many more gems! Aaiye, hindi saahitya ko phir se jagaaein... Suniye adbhut aur atulniya kahaniyaan, mere yaani Renu ke saath. ☺️🙏🕯

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Autor

Renu Arun

Categoría

Arts

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Último episodio

29 de feb. de 2024

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Episodios

Subhadra kumari chauhan : Abhiyukta 31.05.2022

पहले जब इन्होंने मुझे गुण्डों से बचाकर अपने घर में आश्रय दिया था, तब मेरे हृदय में इनके लिए श्रद्धा और कृतज्ञताके भाव थे। परन्तु वे धीरे-धीरे घृणा और तिरस्कार में बदल गये। मैंने देखा कि बैरिस्टर साहब की खुद की नीयत ठिकाने नहीं है। वह मुझे अपनी वासना का शिकार बनाने पर तुले हुए हैं। धीरे धीरे वह मुझे हर तरह की लालच दिखाने लगे और धमकियां देने ...

अनुरोध : सुभद्रा कुमारी चौहान की बहुत ही अद्भुत कहानी 24.05.2022

उन्होंने अपने जेब से एक पत्र निकाल कर वीणा के सामने फेंक दिया और शान्त स्वर में बोले- 'मुझे तो कोई आपत्ति नहीं आप इस पत्र को पढ़ लीजिए। इसके बाद भी यदि आपकी यही धारणा रही कि मैं न जाऊँ तो जब तक आप न कहेंगी मैं न जाऊँगा ।' वीणा ने सर हिलाते हुए कहा-'जी नहीं,रहने दीजिए; मैं कोई पत्र-वत्र न पढ़ूँगी और न आपको...

करुणा से भरी एक मूक प्रेम कथा, "थाती" : सुभद्रा कुमारी चौहान 19.05.2022

मैं जरा हंसी और अपना घूँघट सरकाने लगी । मुझे घूँघट सरकाते देख वे जरा मुस्कराए, मैं भी जरा हंस पड़ी पर कुछ बोली नहीं। उनके नौकर आए और देखते-ही-देखते रस्सी समेत घड़ा निकाल लिया गया। मैं घड़ा उठाकर अपने घर की तरफ चली। शब्दों में नहीं, किंतु कृतज्ञता भरी आँखों से मैंने उनसे कहा, “मैं आपके इस उपकार का बदला जीवन में कभी न चुका सकूँगी।” करीब पौन घंटा कुएँ पर लग गया। अम्मा जी की घुड़कियों का डर तो लगा ही...

जंबक की डिबिया : सुभद्रा कुमारी चौहान 17.05.2022

एक दिन मैं कॉलेज जा रहा था. देखा केठानी सिर पर गारे का तसला रखे चाली पर से कारीगरों को दे रहा है. चालीस फ़ुट ऊपर चाली पर चढ़ा आह बूढ़ा केठानी, खड़ा काम कर रहा था. मेरी अंतरात्मा ने मुझे काटा. यह सब मेरे कारण है और मैंने निश्चय कर लिया कि शाम को लौट कर मां से कहूंगा अब केठानी को बुला लो. वह बहुत बूढ़ा और कमज़ोर हो गया है. इतनी कड़ी सज़ा उसे न मिलनी चाहिए. दिन भर मुझे उसका ख़्याल बना रहा. शाम ज़रा ज...

सुभद्रा कुमारी चौहान की कहानी : होली 14.05.2022

नरेश के जाने के आधे घंटे बाद ही करुणा के पति जगत प्रसाद ने घर में प्रवेश किया. उनकी आंखें लाल थीं. मुंह से तेज़ शराब की बू आ रही थी. जलती हुई सिगरेट को एक ओर फेंकते हुए वे कुर्सी खींचकर बैठ गए. भयभीत हिरनी की तरह पति की ओर देखते हुए करुणा ने पूछा,‘‘दो दिन तक घर नहीं आए, क्या कुछ तबीयत ख़राब थी? यदि न आया करो तो ख़बर तो भिजवा दिया करो. मैं प्रतीक्षा में ही बैठी रहती हूं.’’ उन्होंने करुणा की बातों प...

दुराचारी : सुभद्रा कुमारी चौहान 12.05.2022

किशन चुप रहा, पर जीवन बोल उठा-पंडितजी, रामायण-भागवत और पूजा- पाठ से फायदा ही क्या अगर हम आदमी को आदमी न समझ सके ! मैं तो रामायण-भागवत का पाठ करता नहीं , पर आदमी को आदमी समझता हूँ भगवान मंदिरों में नहीं हम आप और गरीबों में हैं । पर किराये के लिए उस दिन जैसा जो कुछ आपने उस गरीब स्त्री के साथ किया वह उचित ...

कल्याणी : सुभद्रा कुमारी चौहान 10.05.2022

सीढ़ियों पर चढ़ते ही देखा, कल्याणी नहाकर बाल सुखा रही है। खूब लंबे, घने काले केशों के बीच गोरा-गोरा मुँह बिलकुल चाँद-सा लग रहा था। बड़ी-बड़ी आँखों में एक विशेष प्रकार का आकर्षण था। ऐसा सौंदर्य तो जयकृष्ण ने कभी देखा ही न था। अंग-प्रत्यंग से यौवन जैसे फूटा-सा पड़ता था। क्षण भर निहारने का लोभ जयकृष्ण संवरण न कर सके। और तभी कल्याणी की नजर जयकृष्ण पर पड़ी। उसने सिर ढँक लिया। लज्जा की लाली उसके चेहरे प...

सुभद्रा कुमारी चौहान : ग्रामीणा 09.05.2022

पंडित रामधन तिवारी को परमात्मा ने बहुत धन-संपत्ति दी थी, किंतु संतान के बिना उनका घर सूना था। धन धान्य से भरा पूरा घर उन्हें जंगल की तरह जान पड़ता। संतान की लालसा में उन्होंने न जानें कितने जप-तप एवं विधान करवाए और अंत में उनकी ढलती उम्र में पुत्र तो नहीं, किंतु एक पुत्री का जन्म अवश्य हुआ। तिवारी जी ने खूब खुले हाथ से खर्च किया। सारे गाँव को प्रीतिभाज दिया गया। महीनों घर में डोलक ठनकती रही। कन्या...

सुभद्रा कुमारी चौहान की कहानी : कदंब के फूल 06.05.2022

भामा अब कुछ चिढ़ गई थी, बोली-बड़प्पन कैसे निकालोगी मां जी, क्या मारोगी?’ मां जी को और भी क्रोध आ गया और बोलीं,‘मारूंगी भी तो मुझे कौन रोक लेगा? मैं गंगा को मार सकती हूं, तो क्या तुझे मारने में कोई मेरा हाथ पकड़ लेगा?’ ‘मारो, देखूं कैसे मारती हो? मुझे वह बहू न समझ लेना जो सास की मार चुपचाप सह लेती हैं.’ ‘तो क्या तू भी मुझे मारेगी? बाप रे बाप! इसने तो घड़ी भर में मेरा पानी उतार दिया. मुझे मारने कहती...

हींगवाला : सुभद्रा कुमारी चौहान 04.05.2022

सावित्री बोली,‘‘पर हींग लेकर करूंगी क्या? ढेर-सी तो रखी है.’’ ख़ान ने कहा‍,‘‘ले लो अम्मा! घर में पड़ी रहेगी. हम अपने देश कू जाता है. ख़ुदा जाने, कब लौटेगा?’’ और ख़ान बिना उत्तर की प्रतीक्षा किए हींग तोलने लगा. इसपर सावित्री के बच्चे नाराज़ हुए. सभी बोल उठे,‘‘मत लेना मां. ज़बरदस्ती तोले जा रहा है.’’ सावित्री ने बच्चों को उत्तर न देकर, हींग की पुड़िया ले ली. पूछा,‘‘कितने पैसे हुए ख़ान?’’ ‘‘पैंतीस पैसे...

सुभद्रा कुमारी चौहान की कहानी : किस्मत 02.05.2022

किस्मत कौन है, भौजी ! वह भी क्या अम्मा की तरह तुमसे लड़ा करती है और गालियाँ देती है ।” सात साल की मुन्नी ने किशोरी के गले में बाहें डाल कर पीठ पर झूलते हुए पूँछा–“किस्मत कहाँ है ? भौजी मुझे भी बता दो ।” सिल पर का पिसा हुआ मसाला कटोरी में उठाते हुए किशोरो ने एक ठंडी साँस ली; बोली-"किस्मत कहाँ है मुन्नी, क्या बताऊँ"।

कैलाशी नानी : सुभद्रा कुमारी चौहान 30.04.2022

हाँ, तो मेरी कैलाशी नानी, उस गाँव के रहनेवालों के जानवर चराने ले जाया करती थीं। उस गाँव में करीब चालीस घर थे और प्रत्येक घर से एक सेर अनाज चराई में मिल जाया करता था। कैलाशी नानी की जीविका यही थी। इसी में कैलाशी नानी का दान-पुण्य हो जाया करता था और इसी अनाज को बदलकर उन्हें रोज़ के व्यवहार के लिए नमक, मिर्च, मसाला भी लेना पड़ता था। पैसे तो गांव वालों को वैसे ही बड़ी कठिनाई से देखने को मिलते हैं। कैलाश...

अंगूठी की खोज : सुभद्रा कुमारी चौहान 28.04.2022

इसी समय, कुछ युवतियाँ; मेरे पास से निकलीं। उनके पैरों के लच्छे और स्‍्लीपरों की ध्वनि मैंने साफ-साफ सुनी। वे लोग आपस में हँसती, खिलखिलाती और बातें करती हुई चली जा रही थीं। ऐसा लगता था जैसे सांसारिक चिंताओं को इनके पास पहुँचने का साहस ही नहीं होता। परंतु मुझे उनसे क्या प्रयोजन? मैंने तो उनकी ओर आँख उठाकर देखा भी नहीं। देखकर करता भी क्या? व्यर्थ ही हृदय में एक प्रकार की टीस उठती। वेदना और बढ़ जाती।...

एक गरीब की हाय से क्या होता है सुनिए, मुंशी प्रेमचंद की कहानी : गरीब की हाय 25.04.2022

रुपया-पैसा, होश-हवास खोकर उसे पगली की पदवी मिली और अब वह सचमुच पगली थी। अकेली बैठी अपने-आप घण्टों बातें किया करती जिसमें रामसेवक के मांस, हड्डी, चमड़े, आँखें, कलेजा आदि को खाने, मसलने, नोचने, खसोटने की बड़ी उत्कट इच्छा प्रकट की जाती थी और जब उसकी यह इच्छा सीमा तक पहुंच जाती, तो वह रामसेवक के घर की ओर मुँह करके खूब चिल्लाकर और डरावने शब्दों में हाँक लगाती, तेरा लोहू पीऊँगी। प्रायः रात के सन्नाटे मे...

मुंशी प्रेमचंद की कहानी : अभिलाषा 13.04.2022

क्यों, रोने का कोई कारण है, या यों ही रोना चाहती हो?' 'क्या मेरे रोने का कारण तुम नहीं जानते ?' 'मैं तुम्हारे दिल की बात कैसे जान सकता हूँ ?' 'तुमने जानने की चेष्टा कभी की है ?' 'मुझे इसका सान-गुमान भी न था कि तुम्हारे रोने का कोई कारण हो सकता है।' 'तुमने तो बहुत कुछ पढ़ा है, क्या तुम भी ऐसी बात कह सकते हो ?' स्वामी ने विस्मय में पड़कर कहा, 'तुम तो पहेलियाँ बुझवाती हो ?' 'क्यों, क्या तुम कभी नहीं...

दारोगाजी : मुंशी प्रेमचंद Munshi Premchand: Darogaji 03.04.2022

दारोगाजी ने उन्हें देखते ही झुककर सलाम किया और शायद मिज़ाज शरीफ़ पूछना चाहते थे कि उस भले आदमी ने सलाम का जवाब गालियों से देना शुरू किया। जब तांगा कई क़दम आगे निकल आया, तो वह एक पत्थर लेकर तांगे के पीछे दौड़ा। तांगेवाले ने घोड़े को तेज किया। उस भलेमानुस ने भी क़दम तेज किये और पत्थर फेंका। मेरा सिर बाल-बाल बच गया। उसने दूसरा पत्थर उठाया, वह हमारे सामने आकर गिरा। तीसरा पत्थर इतनी ज़ोर से आया कि दारो...

आखिरी मंजिल : मुंशी प्रेमचंद 29.03.2022

मोहिनी में वह अदायें न थीं जिन पर रंगीली तबीयतें फिदा हो जाया करती हैं। तिरछी चितवन, रूप-गर्व की मस्ती भरी हुई आंखें, दिल को मोह लेने वाली मुस्कराहट, चंचल वाणी, उनमें से कोई चीज यहॉँ न थी! मगर जिस तरह चॉँद की मद्धिम सुहानी रोशनी में कभी-कभी फुहारें पड़ने लगती हैं, उसी तरह निश्छल प्रेम में उसके चेहरे पर एक मुस्कराहट कौंध जाती और आंखें नम हो जातीं। यह अदा न थी, सच्चे भावों की तस्वीर थी जो मेरे हृदय...

बाज और सांप : निर्मल वर्मा 25.03.2022

किंतु उसके टूटे हुए पंखों में इतनी शक्ति नहीं थी कि वो उसके घायल शरीर का बोझ सँभाल सकें इसीलिए वह सीधे समुद्र में जा गिरा और थोड़ी देर बहता हुआ समुद्र की लहरों में गायब हो गया। साँप , बाज का ऐसा हाल देखकर हैरान हो गया और उसने मन ही मन सोचा कि आसमान में उड़ने में ऐसा क्या आनंद आता है कि बाज ने अपने प्राण तक गँवा दिए।

नेकी : मुंशी प्रेमचंद की कहानी। Munshi Premchand story : Neki 22.03.2022

सावन का महीना था। रेवती रानी ने पांव में मेहंदी रचायी, मांग-चोटी संवारी और तब अपनी बूढ़ी सास ने जाकर बोली—अम्मां जी, आज भी मेला देखने जाऊँगी। रेवती पण्डित चिन्तामणि की पत्नी थी। पण्डित जी ने सरस्वती की पूजा में ज्यादा लाभ न देखकर लक्ष्मी देवी की पूजा करनी शुरू की थी। लेन-देन का कार-बार करते थे मगर और महाजनों के विपरीत खास-खास हालतों के सिवा पच्चीस फीसदी से ज्यादा सूद लेना उचित न समझते थे। रेवती की...

अग्नि समाधि : मुंशी प्रेमचन्द की कहानी Munshi Premchand story : Agni samadhi 18.03.2022

जब पड़ोसियों की भीड़ छँट गयी तो रुक्मिन ने पयाग से पूछा—इसे कहाँ से लाये ? पयाग ने हँस कर कहा —घर से भागी जाती थी, मुझे रास्ते में मिल गयी। घर का काम-धांधा करेगी, पड़ी रहेगी। 'मालूम होता है, मुझसे तुम्हारा जी भर गया।' पयाग ने तिरछी चितवनों से देख कर कहा —दुत् पगली ! इसे तेरी सेवा-टहल करने को लाया हूँ। 'नयी के आगे पुरानी को कौन पूछता है ?' 'चल, मन जिससे मिले वही नयी है, मन जिससे न मिले वही पुरानी है।...

कजाकि : मुंशी प्रेमचंद की कहानी 16.03.2022

कजाकी' एक न मिटने वाला व्यक्ति है। आज चालीस साल गुजर गये; कजाकी की मूर्ति अभी तक आँखों के सामने नाच रही है। मैं उन दिनों अपने पिता के साथ आजमगढ़ की एक तहसील में था। कजाकी जाति का पासी था, बड़ा ही हँसमुख, बड़ा ही साहसी, बड़ा ही जिंदादिल। वह रोज शाम को डाक का थैला लेकर आता, रात-भर रहता और सबेरे डाक लेकर चला जाता। शाम को फिर उधर से डाक लेकर आ जाता। सुनिए, ये बहुत ही अद्भुत रचना!!!!!

मुंशी प्रेमचंद की कहानी : अमावस्या की रात्रि 14.03.2022

आज भोर से ही गिरिजा की अवस्था शोचनीय थी। विषम ज्वर उसे एक-एक क्षण में मूर्च्छित कर रहा था। एकाएक उसने चौंक कर आँखें खोलीं और अत्यंत क्षीण स्वर में कहा-आज तो दीवाली है। देवदत्त ऐसा निराश हो रहा था कि गिरिजा को चैतन्य देख कर भी उसे आनंद नहीं हुआ। बोला-हाँ आज दीवाली है। गिरिजा ने आँसू-भरी दृष्टि से इधर-उधर देख कर कहा-हमारे घर में क्या दीपक न जलेंगे देवदत्त फूट-फूट कर रोने लगा। गिरिजा ने फिर उसी स्वर...

अमृता प्रीतम : जंगली बूटी 08.03.2022

पत्नी के मरने के बाद प्रभाती, दूसरी शादी कर आता है. उसकी नई बीवी अंगूरी उससे उम्र में काफ़ी छोटी है. कहानी शुरू होती है अंगूरी के शहर आने से. अल्हड़ अंगूरी ख़ूब सजती संवरती है. वह लेखिका को अपने गांव के कई रस्मों-रिवाज़ों के बारे में बताया करती है....... सुनिए ये कहानी!!!!

आत्माराम : मुंशी प्रेमचंद 06.03.2022

एक दिन संयोगवश किसी लड़के ने पिंजड़े का द्वार खोल दिया। तोता उड़ गया। महादेव ने सिर उठाकर जो पिंजड़े की ओर देखा, तो उसका कलेजा सन्न-से हो गया। तोता कहाँ गया। उसने फिर पिंजड़े को देखा, तोता गायब था ! महादेव घबड़ा कर उठा और इधर-उधर खपरैलों पर निगाह दौड़ाने लगा। उसे संसार में कोई वस्तु अगर प्यारी थी, तो वह यही तोता।  तो सुनिए, तोते और उसके मालिक की कहानी!!!!!

नाग पूजा : मुंशी प्रेमचंद जी की कहानी 02.03.2022

तिलोत्तमा अभी कुछ जवाब न देने पायी थी कि अचानक बारात की ओर से रोने के शब्द सुनायी दिये, एक क्षण में हाहाकर मच गया। भंयकर शोक-घटना हो गयी। वर को सौंप ने काट लिया। वह बहू को बिदा कराने आ रहा था। पालकी में मसनद के नीचे एक काला साँप छिपा हुआ था। वर ज्यों ही पालकी में बैठा, साँप ने काट लिया। चारों ओर कुहराम मच गया। सुनिए आगे की कहानी में क्या हुआ !!!!!

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