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8 okt 2026
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9 अक्तूबर : प्रतिज्ञा के साथ शपथ 08.10.2026 4:31
“इसलिए जब परमेश्वर ने प्रतिज्ञा के वारिसों पर और भी साफ रीति से प्रगट करना चाहा कि उसका उद्देश्य बदल नहीं सकता, तो शपथ को बीच में लाया। ताकि दो बे-बदल बातों के द्वारा, जिनके विषय में परमेश्वर का झूठा ठहरना अनहोना है, दृढ़ता से हमारा ढाढ़स बंध जाए, जो शरण लेने को इसलिए दौड़े हैं कि उस आशा को जो सामने रखी हुई है प्राप्त... Read More
8 अक्तूबर : घर्षण पर विजयी होना 07.10.2026 4:47
“जिस बुलाहट से तुम बुलाए गए थे, उसके योग्य चाल चलो, अर्थात् सारी दीनता और नम्रता सहित, और धीरज धरकर प्रेम से एक दूसरे की सह लो; और मेल के बन्धन में आत्मा की एकता रखने का यत्न करो।” इफिसियों 4:1-3 घर्षण का एक उपोत्पाद गर्मी है: जब दो या दो से अधिक वस्तुएँ एक-दूसरे से रगड़ती हैं, तो तापमान बढ़ता है। इसी प्रकार, जब आप पापी... Read More
7 अक्तूबर : एक प्रतिष्ठित जीवन 06.10.2026 4:29
“जब यह देखा गया कि दानिय्येल में उत्तम आत्मा रहती है, तब उसको उन अध्यक्षों और अधिपतियों से अधिक प्रतिष्ठा मिली; वरन् राजा यह भी सोचता था कि उसको सारे राज्य के ऊपर ठहराए। तब अध्यक्ष और अधिपति राजकार्य के विषय में दानिय्येल के विरुद्ध दोष ढूँढ़ने लगे; परन्तु वह विश्वासयोग्य था, और उसके काम में कोई भूल या दोष न निकला, और वे ऐसा कोई... Read More
30 सितम्बर : पवित्रता का मार्ग 29.09.2026 5:13
“क्योंकि यदि तुम शरीर के अनुसार दिन काटोगे तो मरोगे, यदि आत्मा से देह की क्रियाओं को मारोगे तो जीवित रहोगे।” रोमियों 8:13 आपकी पवित्रता महत्त्वपूर्ण है। पुराने नियम में “पवित्र” शब्द सदा नैतिक अवस्था को ही नहीं दर्शाता; प्रायः वह एक सम्बन्ध को दर्शाता है। नगरों को पवित्र नगर कहा गया है, पात्रों को पवित्र पात्र, और भवनों को पवित्र स्थान कहा गया है।... Read More
29 सितम्बर : विश्वास और भय के बीच 28.09.2026 4:14
“‘मेरे हाथ और मेरे पाँव को देखो कि मैं वही हूँ। मुझे छूकर देखो, क्योंकि आत्मा के हड्डी माँस नहीं होता जैसा मुझ में देखते हो।’ यह कहकर उसने उन्हें अपने हाथ पाँव दिखाए। जब आनन्द के मारे उनको प्रतीति न हुई, और वे आश्चर्य करते थे, तो उसने उनसे पूछा, ‘क्या यहाँ तुम्हारे पास कुछ भोजन है?’” लूका 24:39-41 चेले वास्तविक लोग थे—और उनके... Read More
28 सितम्बर : परमेश्वर की बुद्धि 27.09.2026 3:45
“देखो, मैंने केवल यह बात पाई है कि परमेश्वर ने मनुष्य को सीधा बनाया, परन्तु उन्होंने बहुत सी युक्तियाँ निकाली हैं।” सभोपदेशक 7:29 एक बार मुझे एक युवक का पत्र मिला, जिसने अमेरिका और ब्रिटेन दोनों के विश्वविद्यालयों में सर्वोच्च शिक्षा प्राप्त की थी। उस पत्र में उसने लिखा, “मुझे कहना होगा कि संसार की सारी शिक्षा ने मुझे सबसे मूर्ख और अज्ञान मनुष्य बना... Read More
27 सितम्बर : रहस्यमय प्रावधान 26.09.2026 4:00
“दूसरे दिन हम ने सैदा में लंगर डाला, और यूलियुस ने पौलुस पर कृपा करके उसे मित्रों के यहाँ जाने दिया कि उसका सत्कार किया जाए।” प्रेरितों 27:3 प्रेरितों 7:58 में लिखा है कि तरसुस का शाऊल उन लोगों के वस्त्रों की रखवाली कर रहा था जो सर्वप्रथम शहीद स्तिफनुस का पथराव कर रहे थे। इसके तुरन्त बाद, शाऊल (जो बाद में पौलुस कहलाया) उस... Read More
26 सितम्बर : जीवन का मुकुट 25.09.2026 4:22
“धन्य है वह मनुष्य जो परीक्षा में स्थिर रहता है, क्योंकि वह खरा निकलकर जीवन का वह मुकुट पाएगा जिसकी प्रतिज्ञा प्रभु ने अपने प्रेम करने वालों से की है।” याकूब 1:12 आवश्यक कक्षाएँ लिए बिना स्नातक होने की चाहत रखना आसान है। परन्तु कक्षाएँ लिए बिना परीक्षा के लिए तैयार होना सम्भव नहीं, और परीक्षा के बिना स्नातक होना सम्भव नहीं। जो बात शिक्षा... Read More
25 सितम्बर : धन्य त्रिएकता 24.09.2026 4:52
“उस समय जो कोई यहोवा से प्रार्थना करेगा, वह छुटकारा पाएगा।” योएल 2:32 कुछ ऐसे “बाइबल-आधारित” शब्द हैं जो वास्तव में बाइबल में शब्दशः नहीं मिलते। उदाहरण के लिए, आपको अपनी बाइबल में प्रतिस्थापन शब्द नहीं मिलेगा, फिर भी यह शब्द उस सौन्दर्य को व्यक्त करता है जो तब हुआ जब परमेश्वर के पुत्र ने पापियों के स्थान पर मृत्यु सही। इसी प्रकार, त्रिएकता शब्द... Read More
24 सितम्बर : समीप आना 23.09.2026 4:34
“तो आओ, हम सच्चे मन और पूरे विश्वास के साथ, और विवेक का दोष दूर करने के लिए हृदय पर छिड़काव लेकर, और देह को शुद्ध जल से धुलवाकर परमेश्वर के समीप जाएँ।” इब्रानियों 10:22 पुरानी वाचा के अधीन रहने वाली परमेश्वर की विशाल प्रजा के लिए परमेश्वर तक पहुँच केवल महायाजक के द्वारा ही सम्भव थी। केवल वही किसी भी प्रकार की निकटता के... Read More
23 सितम्बर : ईर्ष्या पर कैसे विजय पाएँ 22.09.2026 5:11
“क्रोध तो क्रूर, और प्रकोप धारा के समान होता है, परन्तु जब कोई जल उठता है, तब कौन ठहर सकता है।” नीतिवचन 27:4 ईर्ष्या मानवजाति के आरम्भ से ही हमारे पतन का कारण रही है। उत्पत्ति 4 में कैन ने अपने भाई हाबिल से ईर्ष्या के फलस्वरूप उसकी हत्या कर दी। यद्यपि यह सोचना आसान है कि यह कथा हम पर लागू नहीं होती, क्योंकि... Read More
22 सितम्बर : यीशु, आपका मित्र 21.09.2026 4:21
“मेरी आज्ञा यह है, कि जैसा मैं ने तुम से प्रेम रखा, वैसा ही तुम भी एक दूसरे से प्रेम रखो। इससे बड़ा प्रेम किसी का नहीं कि कोई अपने मित्रों के लिए अपना प्राण दे। जो आज्ञा मैं तुम्हें देता हूँ, यदि उसे मानो तो तुम मेरे मित्र हो। अब से मैं तुम्हें दास न कहूँगा, क्योंकि दास नहीं जानता कि उसका स्वामी क्या... Read More
21 सितम्बर : उसके वचन का विशेषाधिकार 20.09.2026 4:13
“क्योंकि उसकी ईश्वरीय सामर्थ्य ने सब कुछ जो जीवन और भक्ति से सम्बन्ध रखता है, हमें उसी की पहचान के द्वारा दिया है, जिसने हमें अपनी ही महिमा और सद्गुण के अनुसार बुलाया है।” 2 पतरस 1:3 आखरी बार कब आपने ठहरकर इस बात पर विचार किया कि परमेश्वर के वचन तक लगभग असीमित पहुँच होना कितना बड़ा विशेषाधिकार है? आज के दिनों में हम... Read More
30 जून : बुराई को पराजित करना 29.06.2026 4:09
“बुराई से न हारो, परन्तु भलाई से बुराई को जीत लो।” रोमियों 12:21 1940 के दशक में केम्ब्रिज विश्वविद्यालय में पढ़ाई करते हुए एक युवती कम्युनिस्ट पार्टी की सचिव बन गई। 1946-47 की सर्दी इतनी कठोर थी कि पानी की पाइपें आंशिक रूप से जम गईं और पानी की कमी हो गई। महिला छात्रों को सप्ताह में केवल एक ही स्नान का अवसर मिलता था,... Read More
29 जून : क्रियाशील प्रेम 28.06.2026 4:46
“हे प्रियो, बदला न लेना, परन्तु परमेश्वर के क्रोध को अवसर दो, क्योंकि लिखा है, ‘बदला लेना मेरा काम है, प्रभु कहता है मैं ही बदला दूँगा।’ परन्तु ‘यदि तेरा बैरी भूखा हो तो उसे खाना खिला, यदि प्यासा हो तो उसे पानी पिला; क्योंकि ऐसा करने से तू उसके सिर पर आग के अंगारों का ढेर लगाएगा।’” रोमियों 12:19-20 इन पदों में “आग के... Read More
28 जून : शान्ति जो सम्भव है 27.06.2026 4:20
“जहाँ तक हो सके, तुम भरसक सब मनुष्यों के साथ मेल मिलाप रखो।” रोमियों 12:18-19 बाइबल अद्भुत रूप से एक व्यावहारिक पुस्तक है। इसकी बुद्धि न केवल समृद्ध है, बल्कि वास्तविक भी है, और जैसे-जैसे हम इसके अनुसार जीते हैं, यह हर परिस्थिति में गहरे अर्थ के साथ हमसे बात करती है। जैसे-जैसे हम बड़े होते जाते हैं, हममें से कई लोग महसूस करते हैं... Read More
27 जून: मसीह में निवास 26.06.2026 3:56
“अभिमानी न हो, परन्तु दीनों के साथ संगति रखो।” रोमियों 12:16 घर एक अद्भुत स्थान हो सकता है। हममें से बहुतों के लिए घर वह स्थान है, जहाँ हम ईमानदार हो सकते हैं, जहाँ हम अपने परिवार के साथ होते हैं, और जहाँ सारी बातें—यहाँ तक कि हमारी कमियाँ भी—परिचित होती हैं। लेकिन शायद सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि असली घर वह है, जहाँ... Read More
26 जून : मेलजोल से रहो 25.06.2026 4:01
“आपस में एक सा मन रखो।” रोमियों 12:16 शालीनतापूर्वक असहमत होने के लिए कौशल और परमेश्वर-निष्ठा की आवश्यकता होती है। जिन लोगों के साथ हमारी हर बात में सहमति होती है, उनके साथ मेलजोल से रहना आसान होता है, क्योंकि वहाँ किसी प्रकार की असहमति का कोई डर नहीं होता। लेकिन जिन लोगों से हम अलग दिखते हैं और अलग तरीके से जीते हैं—उनके साथ... Read More
25 जून : दूसरों के साथ आनन्द मनाना 24.06.2026 4:40
“आनन्द करने वालों के साथ आनन्द करो, और रोने वालों के साथ रोओ।” रोमियों 12:15 साझी खुशी सहानुभूति का एक महान अभिव्यक्ति है। हम आमतौर पर सहानुभूति शब्द का उपयोग साझा दुख को व्यक्त करने के लिए करते हैं—लेकिन यह खुशी पर भी लागू होता है। हम सहानुभूति को तब समझ पाते हैं जब हम इसे वाक्य में उपयोग करते हैं, लेकिन स्वयं इस शब्द... Read More
24 जून : आत्मिक उन्माद 23.06.2026 3:44
“प्रयत्न करने में आलसी न हो; आत्मिक उन्माद में भरे रहो; प्रभु की सेवा करते रहो।” रोमियों 12:11 कल्पना कीजिए एक पुराने ब्रिटिश फार्म हाउस के रसोईघर की, जिसमें चूल्हे पर एक बर्तन रखा है, जिसमें पानी उबाल रहा है। यहाँ पर हमें आत्मिक प्रतिबद्धता के बारे में बताते हुए पौलुस इसी चित्र को प्रस्तुत करता है। वह हमें यह बताता है कि मसीह में... Read More
23 जून : भाईचारे का प्रेम 22.06.2026 3:57
“भाईचारे के प्रेम से एक दूसरे से स्नेह रखो; परस्पर आदर करने में एक दूसरे से बढ़ चलो।” रोमियों 12:10 युवा भाई-बहन अक्सर एक-दूसरे को धक्का देते हैं और एक-दूसरे की शिकायत करते हैं। यदि हम ईमानदार हों, तो कभी-कभी कलीसिया में हमारा “भाईचारे का स्नेह” इस तरह की सोच और व्यवहार से अधिक प्रभावित होता है, बजाय इसके कि यह प्रेम और आभार से... Read More
22 जून : उदासीनता के लिए कोई स्थान नहीं है 21.06.2026 4:42
“बुराई से घृणा करो; भलाई में लगे रहो।” रोमियों 12:9 जिस मरीज ने हड्डियों के गुदे का ट्राँसप्लाण्ट कराया है, वह जानता है कि संक्रमण के किसी भी सम्भावित खतरे से खुद को अलग रखना कितना महत्त्वपूर्ण है। चूंकि उनका प्रतिरक्षा तन्त्र इतना कमजोर हो जाता है, इसलिए वे औसत व्यक्ति से कहीं अधिक बीमारियों के प्रति संवेदनशील हो जाते हैं। यदि कोई आगंतुक खाँसते... Read More
21 जून : सच्चा मसीही प्रेम 20.06.2026 4:10
“प्रेम निष्कपट हो।” रोमियों 12:9 फिल्म शानदार तरीके से यह दिखा सकती है कि एक पात्र जो कहता है और उसके दिमाग में जो सच में चल रहा होता है, उसके बीच कितना विरोधाभास हो सकता है। यह आमतौर पर उनकी आँखों के करीब से लिए गए शॉट में देखा जा सकता है: उसका मुँह कहता है, “वाह, मिस्टर जेनकिंस, आपको फिर से देखकर बहुत... Read More
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