Yatrigan kripya dhyan de!
Shri Bhagavad Gita Chapter 18 | श्री भगवद गीता अध्याय 18
"Welcome to Shri Bhagavad Gita: Chapter 18 Shlokas, where we explore the timeless wisdom of श्रीकृष्ण as revealed in the 18th chapter of the Bhagavad Gita. Chapter 18, also known as Moksha Sannyasa Yoga (मोक्ष संन्यास योग), is one of the most profound chapters, discussing the paths of renunciation (संन्यास) and duty (कर्मयोग).Each episode delves into the shlokas of this chapter, offering a detailed explanation of the original Sanskrit text followed by a meaningful Hindi translation. We explore Lord Krishna’s teachings on how to live a life of selfless action, detachment from the fruits of wo
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Yatrigan kripya dhyan de!
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Jan 31, 2025
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Episodes
Shri Bhagavad Gita Chapter 18 | श्री भगवद गीता अध्याय 18 | श्लोक 28 19.11.2024 0:53
इस वीडियो में श्रीमद्भगवद गीता के अध्याय 18 के श्लोक 28 का विवरण किया गया है। भगवान श्रीकृष्ण तामसिक स्वभाव वाले कर्ता के गुणों का वर्णन कर रहे हैं। ऐसा कर्ता आलसी, उदास, कपटी और नकारात्मक सोच से भरपूर होता है। यह श्लोक जीवन में सही दिशा और कर्म के महत्व को समझने के लिए प्रेरणा देता है। Hashtags: #BhagavadGita #GeetaChapter18 #Shlok28 #TamasikKarta #HinduPhilosophy #Spirituality #KarmYog #KrishnaU...
Shri Bhagavad Gita Chapter 18 | श्री भगवद गीता अध्याय 18 | श्लोक 27 16.11.2024 0:52
इस वीडियो में श्री भगवद गीता के अध्याय 18, श्लोक 26 का गहराई से वर्णन किया गया है। इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने सात्त्विक कर्ता की विशेषताओं को समझाया है। ऐसा व्यक्ति जो आसक्त न हो, अहंकार से मुक्त हो, धैर्य और उत्साह से भरा हो, और सफलता-असफलता में समान भाव रखता हो, उसे सात्त्विक कर्ता कहा गया है। जानिए इस श्लोक का आध्यात्मिक महत्व और इसे अपने जीवन में अपनाने के उपाय। Tags: #ShriBhagavadGita, #...
Shri Bhagavad Gita Chapter 18 | श्री भगवद गीता अध्याय 18 | श्लोक 26 16.11.2024 0:52
इस वीडियो में श्री भगवद गीता के अध्याय 18, श्लोक 26 का गहराई से वर्णन किया गया है। इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने सात्त्विक कर्ता की विशेषताओं को समझाया है। ऐसा व्यक्ति जो आसक्त न हो, अहंकार से मुक्त हो, धैर्य और उत्साह से भरा हो, और सफलता-असफलता में समान भाव रखता हो, उसे सात्त्विक कर्ता कहा गया है। जानिए इस श्लोक का आध्यात्मिक महत्व और इसे अपने जीवन में अपनाने के उपाय। Tags: #ShriBhagavadGita, #...
Shri Bhagavad Gita Chapter 18 | श्री भगवद गीता अध्याय 18 | श्लोक 25 16.11.2024 0:55
इस वीडियो में श्री भगवद गीता के अध्याय 18, श्लोक 25 का विवरण प्रस्तुत किया गया है। भगवान श्रीकृष्ण ने इस श्लोक में तामसिक कर्म की विशेषताओं का वर्णन किया है। ऐसा कर्म जो बिना परिणामों की परवाह किए, हानि, हिंसा, और अज्ञान के प्रभाव से किया जाता है, उसे तामसिक कर्म कहा गया है। यह कर्म न तो व्यक्ति के लिए और न ही समाज के लिए कल्याणकारी होता है। इस गूढ़ श्लोक को समझें और अपने जीवन में सही दिशा में कर्...
Shri Bhagavad Gita Chapter 18 | श्री भगवद गीता अध्याय 18 | श्लोक 24 16.11.2024 0:49
इस वीडियो में हम श्री भगवद गीता के अध्याय 18 के श्लोक 24 का विवरण प्रस्तुत कर रहे हैं। इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने राजसिक कर्म की विशेषताओं को स्पष्ट किया है। ऐसा कर्म जो इच्छाओं और अहंकार से प्रेरित हो, जिसमें अधिक प्रयास और तनाव हो, उसे राजसिक कर्म कहा गया है। जानिए इस गूढ़ संदेश का महत्व और इसे अपने जीवन में कैसे लागू करें। #ShriBhagavadGita, #Chapter18, #Slok24, #RajasicKarma, #BhagavadGit...
Shri Bhagavad Gita Chapter 18 | श्री भगवद गीता अध्याय 18 | श्लोक 23 08.11.2024 0:58
इस वीडियो में हम श्रीमद्भगवद गीता के अध्याय 18 के श्लोक 23 का अध्ययन करेंगे, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण सात्त्विक कर्म के लक्षणों का वर्णन करते हैं। सात्त्विक कर्म वह होता है जो निस्वार्थ भाव से, बिना किसी आसक्ति और राग-द्वेष के किया जाता है। इस प्रकार का कर्म फल की इच्छा से मुक्त होता है और इसे परम शांति और संतोष प्राप्ति का मार्ग माना गया है। जानें इस श्लोक के माध्यम से सात्त्विक कर्म के महत्व और इस...
Shri Bhagavad Gita Chapter 18 | श्री भगवद गीता अध्याय 18 | श्लोक 22 08.11.2024 0:58
इस वीडियो में हम श्रीमद्भगवद गीता के अध्याय 18 के श्लोक 22 का अध्ययन करेंगे, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण तामसिक ज्ञान की विशेषताओं का वर्णन करते हैं। तामसिक ज्ञान वह है जो किसी एक विषय या कार्य में अनावश्यक रूप से आसक्त रहता है, बिना कारण या सत्य की गहरी समझ के। यह ज्ञान सीमित और असत्य पर आधारित होता है, जिससे व्यक्ति वास्तविकता के गहन अर्थ को नहीं समझ पाता। जानें इस श्लोक के माध्यम से तामसिक ज्ञान के...
Shri Bhagavad Gita Chapter 18 | श्री भगवद गीता अध्याय 18 | श्लोक 21 08.11.2024 0:44
इस वीडियो में हम श्रीमद्भगवद गीता के अध्याय 18 के श्लोक 21 का गहन अध्ययन करेंगे, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण राजसिक ज्ञान की विशेषताओं का वर्णन करते हैं। राजसिक ज्ञान वह है जो सभी प्राणियों में अलग-अलग गुण, रूप और स्वभाव देखता है, और उसमें एकता का बोध नहीं होता। ऐसा ज्ञान व्यक्ति को भिन्नता में बांधता है और आत्मिक एकता से दूर रखता है। जानें इस श्लोक के माध्यम से, कैसे यह दृष्टिकोण व्यक्ति को सीमित दृष्...
Shri Bhagavad Gita Chapter 18 | श्री भगवद गीता अध्याय 18 | श्लोक 20 08.11.2024 0:58
इस वीडियो में हम श्रीमद्भगवद गीता के अध्याय 18 के श्लोक 20 का अध्ययन करेंगे, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण सात्त्विक ज्ञान का स्वरूप बताते हैं। सात्त्विक ज्ञान वह है जो सभी प्राणियों में एक ही अटूट और अविनाशी आत्मा को देखता है। इस ज्ञान में विविधता के बीच एकता का दर्शन होता है। जानें कैसे यह दृष्टिकोण व्यक्ति को परम सत्य के निकट ले जाता है और सभी जीवों में एकता का अनुभव कराता है। BhagavadGita #Chapter18...
Shri Bhagavad Gita Chapter 18 | श्री भगवद गीता अध्याय 18 | श्लोक 19 08.11.2024 0:44
इस वीडियो में श्रीमद भगवद गीता के अध्याय 18 के श्लोक 19 का संस्कृत पाठ, हिंदी अनुवाद और उसकी व्याख्या दी गई है। भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक में बताते हैं कि ज्ञान, कर्म, और कर्ता को तीन गुणों—सत्त्व, रजस और तमस—के अनुसार वर्गीकृत किया गया है। वह अर्जुन से कहते हैं कि इन गुणों के भेद को ध्यान से समझे, क्योंकि ये गुण हमारे कर्मों और जीवन के दृष्टिकोण को प्रभावित करते हैं। In this video, we present the...
Shri Bhagavad Gita Chapter 18 | श्री भगवद गीता अध्याय 18 | श्लोक 18 07.11.2024 0:39
श्री भगवद गीता के अध्याय 18 के श्लोक 18 में भगवान श्रीकृष्ण कर्म के प्रेरक तत्वों और उसकी प्रक्रिया को समझाते हैं। वे बताते हैं कि ज्ञान, ज्ञेय (जिसे जाना जाना है), और परिज्ञाता (जानने वाला) ये तीन कर्म की प्रेरणा के आधार हैं। इसके साथ ही, कर्म का संपूर्ण संघटन तीन घटकों पर आधारित है—करण (साधन), कर्म (कार्य), और कर्ता (कर्म करने वाला)। यह श्लोक कर्म के पीछे के कारणों और प्रक्रियाओं को जानने का मार...
Shri Bhagavad Gita Chapter 18 | श्री भगवद गीता अध्याय 18 | श्लोक 17 27.10.2024 0:52
श्री भगवद गीता, अध्याय 18, श्लोक 17" में भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि जो व्यक्ति अहंकार से मुक्त है और जिसकी बुद्धि कर्मों के फल में नहीं उलझती, वह सही ज्ञान के साथ कार्य करता है। ऐसा व्यक्ति, भले ही कर्म करता है, परन्तु वह न तो किसी को हानि पहुंचाता है और न ही किसी बंधन में बंधता है। इस श्लोक में श्रीकृष्ण सिखाते हैं कि अहंकार रहित और शुद्ध बुद्धि से किए गए कर्म व्यक्ति को किसी भी प्रकार के बंधन...
Shri Bhagavad Gita Chapter 18 | श्री भगवद गीता अध्याय 18 | श्लोक 16 27.10.2024 0:44
"श्री भगवद गीता, अध्याय 18, श्लोक 16" में भगवान श्रीकृष्ण यह समझाते हैं कि जो व्यक्ति अपने कर्मों का कर्ता केवल स्वयं को मानता है और अपने अहंकार के कारण अपने कर्मों में अन्य कारकों की भूमिका को नहीं देखता, वह सही दृष्टिकोण से वंचित रहता है। श्रीकृष्ण बताते हैं कि ऐसा व्यक्ति सीमित बुद्धि के कारण कर्म के वास्तविक स्वरूप को नहीं समझ पाता। यह श्लोक हमें अहंकार को छोड़कर समस्त कर्मों में ईश्वर और प्रक...
Shri Bhagavad Gita Chapter 18 | श्री भगवद गीता अध्याय 18 | श्लोक 15 27.10.2024 0:52
"श्री भगवद गीता, अध्याय 18, श्लोक 15" में भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति जो कर्म करता है, वह शरीर, वाणी और मन के माध्यम से कार्य करता है। यह कर्म चाहे न्यायपूर्ण हो या विपरीत, इसके पाँच कारण होते हैं। इस श्लोक में कर्म के सिद्धांतों को समझाते हुए श्रीकृष्ण बताते हैं कि हमारे सभी कार्य इन पाँच तत्वों (अधिष्ठान, कर्ता, करण, चेष्टा, और दैव) के आधार पर होते हैं। यह श्लोक हमें कर्म के आध...
Shri Bhagavad Gita Chapter 18 | श्री भगवद गीता अध्याय 18 | श्लोक 14 27.10.2024 0:47
"श्री भगवद गीता, अध्याय 18, श्लोक 14" में भगवान श्रीकृष्ण कर्म के पाँच प्रमुख कारणों का वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि किसी भी कर्म को संपन्न करने के लिए पाँच कारक आवश्यक होते हैं: अधिष्ठान (स्थान), कर्ता, करण (इंद्रियाँ), चेष्टा (प्रयास), और दैव (ईश्वर की इच्छा)। इन पाँच तत्वों का योगदान प्रत्येक कार्य की सिद्धि में होता है। यह ज्ञान व्यक्ति को अहंकार से मुक्त करते हुए उसे यह समझने में सहायक होत...
Shri Bhagavad Gita Chapter 18 | श्री भगवद गीता अध्याय 18 | श्लोक 13 27.10.2024 0:37
"श्री भगवद गीता, अध्याय 18, श्लोक 14" में भगवान श्रीकृष्ण कर्म के पाँच प्रमुख कारणों का वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि किसी भी कर्म को संपन्न करने के लिए पाँच कारक आवश्यक होते हैं: अधिष्ठान (स्थान), कर्ता, करण (इंद्रियाँ), चेष्टा (प्रयास), और दैव (ईश्वर की इच्छा)। इन पाँच तत्वों का योगदान प्रत्येक कार्य की सिद्धि में होता है। यह ज्ञान व्यक्ति को अहंकार से मुक्त करते हुए उसे यह समझने में सहायक होत...
Shri Bhagavad Gita Chapter 18 | श्री भगवद गीता अध्याय 18 | श्लोक 12 27.10.2024 0:39
"श्री भगवद गीता, अध्याय 18, श्लोक 12" में भगवान श्रीकृष्ण त्याग की महिमा का वर्णन करते हैं। वह कहते हैं कि जो व्यक्ति अपने शरीर में रहते हुए सभी कर्मों के फलों का त्याग करता है, वह सच्चा त्यागी है। ऐसा व्यक्ति न तो किसी कर्म के अच्छे परिणामों से बंधता है और न ही बुरे परिणामों से प्रभावित होता है। इस प्रकार का त्याग मनुष्य को आध्यात्मिक स्वतंत्रता की ओर ले जाता है और उसे सच्चे अर्थों में मुक्त करता...
Shri Bhagavad Gita Chapter 18 | श्री भगवद गीता अध्याय 18 | श्लोक 11 23.10.2024 0:45
इस वीडियो में श्रीमद भगवद गीता के अध्याय 18 के श्लोक 11 का संस्कृत पाठ, हिंदी अनुवाद और उसकी व्याख्या दी गई है। भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि कोई भी व्यक्ति क्षण भर भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता क्योंकि सभी प्रकृति के गुणों द्वारा प्रेरित होकर कर्म करने के लिए बाध्य होते हैं। In this video, we explore the Sanskrit verse, Hindi translation, and detailed explanation of Shloka 11 from Chapter 18 of th...
Shri Bhagavad Gita Chapter 18 | श्री भगवद गीता अध्याय 18 | श्लोक 10 23.10.2024 0:52
In this verse from the Bhagavad Gita, Chapter 18, Shloka 10, Lord Krishna emphasizes that it is impossible for anyone to completely abandon all actions while living in a physical body. However, the one who renounces attachment to the fruits of their actions is called a true renunciant (tyagi). This profound teaching highlights the importance of performing one’s duties selflessly, without being att...
Shri Bhagavad Gita Chapter 18 | श्री भगवद गीता अध्याय 18 | श्लोक 9 23.10.2024 0:48
In this voice-over, we explore Shloka 9 of Chapter 18 from the Bhagavad Gita , where Lord Krishna explains the characteristics of a true renouncer. A person who neither hates inaction nor is attached to successful action is filled with the mode of goodness (Sattva), and such a person is intelligent and free from doubts. This is a profound teaching on the nature of detachment and selfless action.
Shri Bhagavad Gita Chapter 18 | श्री भगवद गीता अध्याय 18 | श्लोक 8 23.10.2024 0:51
इस वीडियो में हम श्री भगवद गीता के अध्याय 18, श्लोक 8 का गहन विश्लेषण करेंगे। इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि जो व्यक्ति अपने कर्तव्यों को बिना आसक्ति और फल की कामना के करता है, उसका त्याग सात्त्विक (सात्विक गुण से युक्त) कहलाता है। जानिए कैसे निस्वार्थ कर्म करने से वास्तविक शांति और मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है, और क्यों यह त्याग सबसे श्रेष्ठ माना गया है। Shloka: "कार्यमित्येव...
Shri Bhagavad Gita Chapter 18 | श्री भगवद गीता अध्याय 18 | श्लोक 7 23.10.2024 0:52
इस वीडियो में हम श्री भगवद गीता के अध्याय 18, श्लोक 7 का विस्तार से अध्ययन करेंगे। इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि जो व्यक्ति केवल कष्ट या दुख के भय से कार्य का त्याग करता है, उसका त्याग राजसिक (रजोगुण से युक्त) कहलाता है और ऐसे व्यक्ति को त्याग का वास्तविक फल प्राप्त नहीं होता। जानिए कर्तव्यों को निस्वार्थ भाव से निभाने का महत्व और क्यों राजसिक त्याग से वास्तविक शांति और मोक्ष की प्राप्...
Shri Bhagavad Gita Chapter 18 | श्री भगवद गीता अध्याय 18 | श्लोक 6 21.10.2024 0:53
श्री भगवद गीता, अध्याय 18, श्लोक 6 श्री भगवान ने कहा: एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च। कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्॥ "Welcome to Shri Bhagavad Gita: Chapter 18 Shlokas , where we explore the timeless wisdom of श्रीकृष्ण as revealed in the 18th chapter of the Bhagavad Gita. Chapter 18, also known as Moksha Sannyasa Yoga (मोक्ष संन्यास योग) , is one of the most profound chap...
Shri Bhagavad Gita Chapter 18 | श्री भगवद गीता अध्याय 18 | श्लोक 5 21.10.2024 0:57
यज्ञदानतप:कर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्। यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्॥ "Welcome to Shri Bhagavad Gita: Chapter 18 Shlokas , where we explore the timeless wisdom of श्रीकृष्ण as revealed in the 18th chapter of the Bhagavad Gita. Chapter 18, also known as Moksha Sannyasa Yoga (मोक्ष संन्यास योग) , is one of the most profound chapters, discussing the paths of renunciation (संन्यास) and duty (क...
Shri Bhagavad Gita Chapter 18 | श्री भगवद गीता अध्याय 18 | श्लोक 4 21.10.2024 1:03
श्री भगवद गीता, अध्याय 18, श्लोक 4 श्री भगवान ने कहा: धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्रे साक्षात् धर्मसंवेदनम्। संन्यासस्य फलं प्रेक्ष्य समन्तात् सदा तत्त्वतः॥ "Welcome to Shri Bhagavad Gita: Chapter 18 Shlokas , where we explore the timeless wisdom of श्रीकृष्ण as revealed in the 18th chapter of the Bhagavad Gita. Chapter 18, also known as Moksha Sannyasa Yoga (मोक्ष संन्यास योग) , is one of the most profo...
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