Yatrigan kripya dhyan de!
Shri Bhagavad Gita Chapter 18 | श्री भगवद गीता अध्याय 18
"Welcome to Shri Bhagavad Gita: Chapter 18 Shlokas, where we explore the timeless wisdom of श्रीकृष्ण as revealed in the 18th chapter of the Bhagavad Gita. Chapter 18, also known as Moksha Sannyasa Yoga (मोक्ष संन्यास योग), is one of the most profound chapters, discussing the paths of renunciation (संन्यास) and duty (कर्मयोग).Each episode delves into the shlokas of this chapter, offering a detailed explanation of the original Sanskrit text followed by a meaningful Hindi translation. We explore Lord Krishna’s teachings on how to live a life of selfless action, detachment from the fruits of wo
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Yatrigan kripya dhyan de!
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Jan 31, 2025
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Episodes
Shri Bhagavad Gita Chapter 18 | श्री भगवद गीता अध्याय 18 | श्लोक 53 17.12.2024 0:47
अहंकार और क्रोध का त्याग | श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 53 Description: श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 18 के श्लोक 53 में भगवान श्रीकृष्ण समझाते हैं कि जो व्यक्ति अहंकार, बल, घमंड, इच्छा, क्रोध और आसक्ति का त्याग कर देता है, वह शांति और निर्मलता को प्राप्त करता है। ऐसा व्यक्ति 'ब्रह्मभूत' अर्थात् आध्यात्मिक चेतना की स्थिति में पहुंच जाता है, जो मोक्ष की ओर ले जाती है। Tags: श्रीमद्भगवद्गीता, अहंका...
Shri Bhagavad Gita Chapter 18 | श्री भगवद गीता अध्याय 18 | श्लोक 52 16.12.2024 0:46
ध्यान योग और वैराग्य का महत्व | श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 52 Description: भगवान श्रीकृष्ण श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 18 के श्लोक 52 में ध्यान योग और वैराग्य की महत्ता को समझाते हैं। जो व्यक्ति एकांत में रहना पसंद करता है, हल्का आहार लेता है, अपने विचार, वाणी और शरीर को संयमित करता है, वह सदा ध्यान योग में लगा रहता है। ऐसा साधक संसार के मोह को त्याग कर आत्मज्ञान की ओर बढ़ता है। Tags: श्रीमद्...
Shri Bhagavad Gita Chapter 18 | श्री भगवद गीता अध्याय 18 | श्लोक 51 15.12.2024 0:56
आत्मसंयम और शुद्ध बुद्धि | श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 51 Description: भगवान श्रीकृष्ण श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 18 के श्लोक 51 में समझाते हैं कि शुद्ध बुद्धि और आत्मसंयम के साथ कैसे आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त की जा सकती है। इच्छाओं और द्वेष को त्यागकर, आत्मा को नियंत्रित कर और इंद्रियों से दूर रहते हुए मनुष्य परम ज्ञान की ओर बढ़ता है। यह श्लोक आध्यात्मिक साधना और आत्मानुशासन का महत्व दर्शाता...
Shri Bhagavad Gita Chapter 18 | श्री भगवद गीता अध्याय 18 | श्लोक 50 14.12.2024 0:44
ज्ञान की परम निष्ठा | श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 50 Description: श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 18 के श्लोक 50 में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि आत्मा की सिद्धि प्राप्त करने वाला व्यक्ति ब्रह्म को कैसे प्राप्त करता है। वे संक्षेप में बताते हैं कि ज्ञान की परम निष्ठा क्या है और आत्म-साक्षात्कार से मोक्ष की ओर कैसे बढ़ा जा सकता है। यह श्लोक आध्यात्मिक उन्नति और आत्मा की मुक्ति के मार्ग क...
Shri Bhagavad Gita Chapter 18 | श्री भगवद गीता अध्याय 18 | श्लोक 49 13.12.2024 0:51
असक्त बुद्धि से नैष्कर्म्य सिद्धि | श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 49 Description: श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 18 के श्लोक 49 में भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि जो व्यक्ति आसक्ति रहित होकर आत्म-नियंत्रण के साथ हर जगह शांत रहता है और इच्छाओं से मुक्त होता है, वह संन्यास के मार्ग से परम नैष्कर्म्य सिद्धि (कर्मों के फल से मुक्ति) प्राप्त करता है। यह आत्मिक शांति और मोक्ष प्राप्ति का उच्चतम स्तर है। Ta...
Shri Bhagavad Gita Chapter 18 | श्री भगवद गीता अध्याय 18 | श्लोक 48 12.12.2024 0:45
सहजं कर्म त्याग न करें | श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 48 Description: श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 18 के श्लोक 48 में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि जन्मजात कर्तव्यों को कभी नहीं छोड़ना चाहिए, भले ही वे दोषयुक्त क्यों न हों। जैसे धुएं से आग ढकी रहती है, वैसे ही सभी कर्म कुछ न कुछ दोषों से ग्रस्त होते हैं। इसलिए, अपने स्वभाव के अनुसार निर्धारित कर्तव्यों का पालन करते रहना ही उचित है। Tag...
Shri Bhagavad Gita Chapter 18 | श्री भगवद गीता अध्याय 18 | श्लोक 47 27.11.2024 0:42
भगवद गीता के अध्याय 18, श्लोक 47 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि अपने स्वभाव के अनुसार निर्धारित धर्म और कर्म करना ही सर्वोत्तम है, भले ही वह दोषपूर्ण क्यों न हो। दूसरे के धर्म का पालन, चाहे वह कितना भी उत्तम हो, अनिष्टकारी हो सकता है। अपने स्वधर्म का पालन करने से मनुष्य पाप में नहीं फंसता। यह श्लोक व्यक्ति को अपनी प्रकृति के अनुसार कर्म करते हुए जीवन जीने की प्रेरणा देता है। Hashtags: #BhagavadGita #Sh...
Shri Bhagavad Gita Chapter 18 | श्री भगवद गीता अध्याय 18 | श्लोक 46 27.11.2024 0:44
भगवद गीता के अध्याय 18, श्लोक 46 में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि जिस परमात्मा से सभी प्राणियों की उत्पत्ति होती है और जो संपूर्ण सृष्टि में व्याप्त है, मनुष्य अपने स्वकर्म के माध्यम से उसकी आराधना करते हुए सिद्धि प्राप्त कर सकता है। यह श्लोक कर्म, भक्ति और आत्मसिद्धि का गहरा संदेश देता है। Hashtags: #BhagavadGita #Shloka18_46 #KarmaYoga #DivineWorship #SelfRealization #HinduPhilosophy #SpiritualWi...
Shri Bhagavad Gita Chapter 18 | श्री भगवद गीता अध्याय 18 | श्लोक 45 27.11.2024 0:44
भगवद गीता के अध्याय 18, श्लोक 45 में भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि मनुष्य अपने स्वभाव के अनुसार किए गए कर्मों में रत रहकर आत्मसिद्धि प्राप्त कर सकता है। प्रत्येक व्यक्ति का स्वकर्म उसके गुणों और स्वभाव से निर्धारित होता है। यह श्लोक जीवन में स्वधर्म और कर्म की महत्ता को उजागर करता है। Hashtags: #BhagavadGita #Shloka18_45 #KarmaYoga #SelfRealization #HinduPhilosophy #GeetaWisdom #DutiesAndResponsibi...
Shri Bhagavad Gita Chapter 18 | श्री भगवद गीता अध्याय 18 | श्लोक 44 27.11.2024 0:34
भगवद गीता के अध्याय 18, श्लोक 44 में भगवान श्रीकृष्ण वैश्य और शूद्र के स्वभावजन्य कर्मों का वर्णन करते हैं। वैश्य का स्वाभाविक कर्म कृषि, गोरक्षा और वाणिज्य है, जबकि शूद्र का कर्म सेवा और परोपकार करना है। यह श्लोक समाज में सभी वर्गों के कार्यों और जिम्मेदारियों की महत्ता को दर्शाता है। Hashtags: #BhagavadGita #Shloka18_44 #VaisyaDuties #SudraDuties #KarmaYoga #HinduPhilosophy #GeetaTeachings #Duti...
Shri Bhagavad Gita Chapter 18 | श्री भगवद गीता अध्याय 18 | श्लोक 43 27.11.2024 0:37
भगवद गीता के अध्याय 18, श्लोक 43 में भगवान श्रीकृष्ण क्षत्रिय के स्वभावजन्य कर्मों का वर्णन करते हैं। इसमें शौर्य (वीरता), तेज (तेजस्विता), धृति (धैर्य), दक्षता (कुशलता), युद्ध में न पलायन करना, दान देना और नेतृत्व गुण शामिल हैं। यह श्लोक क्षत्रिय के धर्म और समाज में उनकी भूमिका को स्पष्ट करता है। Hashtags: #BhagavadGita #Shloka18_43 #KshatriyaDuties #CourageAndValor #HinduPhilosophy #KarmaYoga #G...
Shri Bhagavad Gita Chapter 18 | श्री भगवद गीता अध्याय 18 | श्लोक 42 27.11.2024 0:34
भगवद गीता के अध्याय 18, श्लोक 42 में भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म क्या होते हैं। इनमें शम (मन की शांति), दम (इंद्रियों पर नियंत्रण), तप (साधना), शौच (पवित्रता), क्षमा (दया), आर्जव (सत्यनिष्ठा), ज्ञान (आध्यात्मिक ज्ञान), विज्ञान (प्रायोगिक ज्ञान), और आस्तिकता (आध्यात्मिक विश्वास) शामिल हैं। यह श्लोक आत्मा की शुद्धि और समाज के कल्याण हेतु ब्राह्मण के धर्म का वर्णन करता है।...
Shri Bhagavad Gita Chapter 18 | श्री भगवद गीता अध्याय 18 | श्लोक 41 27.11.2024 0:36
भगवद गीता के अध्याय 18 के श्लोक 41 में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, और शूद्र के कर्म उनके स्वभाव और प्रकृति से उत्पन्न गुणों के अनुसार विभाजित हैं। यह श्लोक समाज में विभिन्न भूमिकाओं की प्राकृतिक व्यवस्था और उनके महत्व को उजागर करता है। Hashtags: #BhagavadGita #Shloka18_41 #Dharma #VarnaSystem #HinduPhilosophy #KarmaAndDharma #SpiritualKnowledge #GeetaTeachings...
Shri Bhagavad Gita Chapter 18 | श्री भगवद गीता अध्याय 18 | श्लोक 40 27.11.2024 0:51
भगवद गीता के अध्याय 18 के श्लोक 40 में भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि पृथ्वी, आकाश, या देवताओं में ऐसा कोई सत्त्व नहीं है जो प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रजस, और तमस) से मुक्त हो। यह श्लोक जीवन के सार्वभौमिक नियमों को समझने का एक अनमोल संदेश देता है, जो हर जीव के अस्तित्व में निहित है। Hashtags: #BhagavadGita #Shloka18_40 #SpiritualWisdom #Trigunas #LifeLessons #HinduPhilosophy #GeetaTeachings #Kar...
Shri Bhagavad Gita Chapter 18 | श्री भगवद गीता अध्याय 18 | श्लोक 39 23.11.2024 0:42
श्री भगवद गीता के अध्याय 18, श्लोक 39 में भगवान श्रीकृष्ण तामस सुख का वर्णन करते हैं। यह सुख आरंभ और परिणाम दोनों में आत्मा को मोह में डालने वाला होता है। यह आलस्य, प्रमाद और अज्ञान से उत्पन्न होता है और व्यक्ति को निष्क्रिय और भ्रमित करता है। जानें तामस सुख के प्रभाव और इससे बचने के उपाय। Tags: श्री भगवद गीता, अध्याय 18, श्लोक 39, तामस सुख, आलस्य, प्रमाद, अज्ञान, भगवद गीता ज्ञान, जीवन का सत्य, श्...
Shri Bhagavad Gita Chapter 18 | श्री भगवद गीता अध्याय 18 | श्लोक 38 23.11.2024 0:42
श्री भगवद गीता के अध्याय 18, श्लोक 38 में भगवान श्रीकृष्ण राजस सुख का वर्णन करते हैं। यह सुख इंद्रियों और विषयों के संयोग से उत्पन्न होता है, जो प्रारंभ में अमृत जैसा प्रतीत होता है, लेकिन अंततः विष समान कष्टदायक हो जाता है। इस श्लोक में बताया गया है कि ऐसा सुख क्षणिक और अस्थायी होता है। जानें राजस सुख की वास्तविकता और इसके प्रभाव। Tags: श्री भगवद गीता, अध्याय 18, श्लोक 38, राजस सुख, इंद्रिय सुख,...
Shri Bhagavad Gita Chapter 18 | श्री भगवद गीता अध्याय 18 | श्लोक 37 23.11.2024 0:44
श्री भगवद गीता के अध्याय 18, श्लोक 37 में भगवान श्रीकृष्ण सात्त्विक सुख का वर्णन करते हैं। यह सुख प्रारंभ में कठिनाई भरा होता है, जैसे विष, लेकिन परिणामस्वरूप अमृत के समान मधुर होता है। यह सुख आत्मा और बुद्धि की प्रसन्नता से उत्पन्न होता है। इस श्लोक के माध्यम से जानें, सच्चे और स्थायी सुख की पहचान। Tags: श्री भगवद गीता, अध्याय 18, श्लोक 37, सात्त्विक सुख, आत्मिक प्रसन्नता, भगवद गीता ज्ञान, जीवन म...
Shri Bhagavad Gita Chapter 18 | श्री भगवद गीता अध्याय 18 | श्लोक 36 23.11.2024 0:45
श्री भगवद गीता के अध्याय 18, श्लोक 36 में भगवान श्रीकृष्ण सुख के तीन प्रकारों का वर्णन करते हैं। वे अर्जुन से कहते हैं कि जो सुख अभ्यास से प्राप्त होता है और जिससे अंततः सभी दुख समाप्त हो जाते हैं, उसे समझने का प्रयास करो। इस श्लोक के माध्यम से जानें, जीवन में स्थायी सुख की प्राप्ति का मार्ग। #भगवदगीता #गीता_श्लोक #सात्त्विकसुख #कृष्ण_उपदेश #आध्यात्मिकजीवन #दुःख_का_अंत #आत्मिकशांति #गीता_ज्ञान #जी...
Shri Bhagavad Gita Chapter 18 | श्री भगवद गीता अध्याय 18 | श्लोक 35 23.11.2024 0:38
श्री भगवद गीता के अध्याय 18, श्लोक 35 में भगवान श्रीकृष्ण तामसी धृति का वर्णन करते हैं। यह धृति व्यक्ति को स्वप्न, भय, शोक, विषाद, और मद के प्रभाव में रखती है। ऐसी धृति आलस्य और प्रमाद से प्रेरित होती है, जो जीवन में उन्नति के मार्ग में बाधक बनती है। जानें, तामसी धृति के लक्षण और इसे दूर करने के उपाय इस श्लोक के माध्यम से। #भगवदगीता #गीता_श्लोक #तामसीधृति #आलस्य #विषाद #कृष्ण_उपदेश #गीता_ज्ञान #आध...
Shri Bhagavad Gita Chapter 18 | श्री भगवद गीता अध्याय 18 | श्लोक 34 23.11.2024 0:37
श्री भगवद गीता के अध्याय 18, श्लोक 34 में भगवान श्रीकृष्ण ने राजसी धृति का वर्णन किया है। यह धृति धर्म, काम, और अर्थ के प्रति लगाव और फल की आकांक्षा से प्रेरित होती है। इसमें व्यक्ति अपने कार्यों में दृढ़ता तो रखता है, लेकिन उसका लक्ष्य सांसारिक उपलब्धियां और इच्छाओं की पूर्ति होता है। जानें, राजसी धृति के लक्षण और इसके प्रभाव इस श्लोक के माध्यम से। #भगवदगीता #गीता_श्लोक #राजसीधृति #कर्म #जीवन_लक्...
Shri Bhagavad Gita Chapter 18 | श्री भगवद गीता अध्याय 18 | श्लोक 33 23.11.2024 0:41
श्री भगवद गीता के अध्याय 18, श्लोक 33 में सात्त्विक धृति का वर्णन किया गया है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि जो धृति (दृढ़ता) योग और अनुशासन के माध्यम से मन, प्राण, और इंद्रियों की गतिविधियों को स्थिर और अविचलित बनाए रखती है, उसे सात्त्विकी धृति कहा जाता है। यह धृति व्यक्ति को आत्मज्ञान और परम शांति के मार्ग पर अग्रसर करती है। इस श्लोक के माध्यम से जानें सात्त्विक धृति के महत्व और गुण। #भ...
Shri Bhagavad Gita Chapter 18 | श्री भगवद गीता अध्याय 18 | श्लोक 32 23.11.2024 0:45
श्री भगवद गीता के अध्याय 18, श्लोक 32 में भगवान श्रीकृष्ण तामसी बुद्धि की व्याख्या करते हैं। इस श्लोक में बताया गया है कि जो बुद्धि अधर्म को धर्म और धर्म को अधर्म समझती है, और जो सभी चीजों को विपरीत रूप से देखती है, वह तामसिक बुद्धि कहलाती है। यह अज्ञान और मोह से ग्रसित होती है। जानें तामसी बुद्धि के लक्षण और इसे समझने का गूढ़ रहस्य। #भगवदगीता #गीता_श्लोक #तामसीबुद्धि #अधर्म_धर्म #हिंदूधर्म #कृष्ण...
Shri Bhagavad Gita Chapter 18 | श्री भगवद गीता अध्याय 18 | श्लोक 31 19.11.2024 0:46
भगवद गीता के अध्याय 18 के श्लोक 31 में भगवान श्रीकृष्ण राजसी बुद्धि की विशेषताओं का वर्णन करते हैं। राजसी बुद्धि वह है जो धर्म और अधर्म, कार्य और अकार्य को सही तरीके से नहीं पहचान पाती। यह बुद्धि भ्रमित होती है और अधूरी जानकारी के आधार पर निर्णय लेती है। ऐसे व्यक्तियों का जीवन अक्सर मोह, अहंकार और लालच से प्रभावित होता है। #BhagavadGita #GeetaChapter18 #Shlok31 #RajasikBuddhi #KrishnaUpdesh #Spiri...
Shri Bhagavad Gita Chapter 18 | श्री भगवद गीता अध्याय 18 | श्लोक 30 19.11.2024 0:54
श्रीमद्भगवद गीता के अध्याय 18 के श्लोक 30 में भगवान श्रीकृष्ण सात्त्विक बुद्धि की विशेषताओं का वर्णन करते हैं। यह बुद्धि हमें प्रवृत्ति (सक्रियता) और निवृत्ति (त्याग), सही और गलत, भय और अभय, तथा बंधन और मोक्ष के सही स्वरूप को समझने में सक्षम बनाती है। इस ज्ञान से हम अपने जीवन में सही निर्णय लेने और आत्मा की उन्नति का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं। #BhagavadGita #GeetaChapter18 #Shlok30 #SattvikBuddhi...
Shri Bhagavad Gita Chapter 18 | श्री भगवद गीता अध्याय 18 | श्लोक 29 19.11.2024 0:42
श्रीमद्भगवद गीता के अध्याय 18 के श्लोक 29 में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को तीन प्रकार की बुद्धि और धृति (स्थिरता) का विस्तार से वर्णन करने वाले हैं। यह श्लोक जीवन में सही निर्णय और धैर्य की भूमिका को समझाने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस ज्ञान के माध्यम से हम सत्व, रजस और तमस गुणों के आधार पर अपने मन और विचारों को नियंत्रित करना सीख सकते हैं। #BhagavadGita #GeetaChapter18 #Shlok29 #Buddhi #Dhriti #K...
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