Nayi Dhara Radio
Pratidin Ek Kavita
कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
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Episodes
Dopahar Ka Bhojan | Kumar Vikal 15.10.2023 1:45
दोपहर का भोजन | कुमार विकल दुःख दुःख को सहना कुछ मत कहना— बहुत पुरानी बात है। दुःख सहना, पर सब कुछ कहना यही समय की बात है। दुःख को बना के एक कबूतर बिल्ली को अर्पित कर देना जीवन का अपमान है। दुःख को आँख घूरकर देखो अपने हथियारों को परखो और समय आते ही उस पर पूरी ताक़त संचय करके ऐसा झड़पो भीगी बिल्ली-सा वह भागे तुम पीछे, वह आगे-आगे। दुःख को कविता में रो देना ‘यह कविता की रात है’ दुःख से लड़कर कविता लि...
Chidiyon Ko Pata Nahin | Bhagwat Rawat 14.10.2023 2:24
चिड़ियों को पता नहीं | भगवत रावत चिड़ियों को पता नहीं कि वे कितनी तेज़ी से प्रवेश कर रही हैं कविताओं में। इन अपने दिनों में खासकर उन्हें चहचहाना था उड़ानें भरनी थीं और घंटों गरदन में चोंच डाले गुमसुम बैठकर अपने अंडे सेने थे। मैं देखता हूँ कि वे अक्सर आती हैं बेदर डरी हुईं पंख फड़फड़ाती आहत या अक्सर मरी हुईं। उन्हें नहीं पता था कि कविताओं तक आते-आते वे चिड़ियाँ नहीं रह जातीं, वे नहीं जानतीं कि उनके...
Tumne Mujhe | Shamsher Bahadur Singh 13.10.2023 1:56
तुमने मुझे | शमशेर बहादुर सिंह तुमने मुझे और गूँगा बना दिया एक ही सुनहरी आभा-सी सब चीज़ों पर छा गई मै और भी अकेला हो गया तुम्हारे साथ गहरे उतरने के बाद मैं एक ग़ार से निकला अकेला, खोया हुआ और गूँगा अपनी भाषा तो भूल ही गया जैसे चारों तरफ़ की भाषा ऐसी हो गई जैसे पेड़-पौधों की होती है नदियों में लहरों की होती है हज़रत आदम के यौवन का बचपना हज़रत हौवा की युवा मासूमियत कैसी भी! कैसी भी! ऐस...
Gaon | Anju Ranjan 12.10.2023 3:36
गाँव | अंजु रंजन जब पिछली बार गाँव छोड़ती थी उस पोखर वाले मोड़ से मुड़ती थी बरबस ही बाँध लेता था मेरे क़दमों को मेरा गाँव! पिता की तरह वेदना विदुर दृष्टि और आँसू भरे नयनों को पिता की तरह मजबूत दिखावा बनकर मौन खड़ा था मेरा गाँव! माँ की ममता की तरह रूखे हाथों से वे रूखी हवाएँ सूखा जाती थी मेरे आँसू विपरीत दिशा से बह कर वो लिपटा लेती थी ख़ुद से मेरी माँ बनकर तब नि:शब्द रोता था मेरा गाँव!...
Desh Kagaz Par Bana Naksha Nahi Hota | Sarveshwar Dayal Saxena 11.10.2023 3:25
देश कागज़ पर बना नक्शा नहीं होता | सर्वेश्वरदयाल सक्सेना यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में आग लगी हो तो क्या तुम दूसरे कमरे में सो सकते हो? यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में लाशें सड़ रहीं हों तो क्या तुम दूसरे कमरे में प्रार्थना कर सकते हो? यदि हाँ तो मुझे तुम से कुछ नहीं कहना है। देश कागज़ पर बना नक़्शा नहीं होता कि एक हिस्से के फट जाने पर बाकी हिस्से उसी तरह साबुत बने रहें और नदियां, पर्वत, शहर, गांव व...
Sweekaar | Vishnu Khare 10.10.2023 2:07
स्वीकार | विष्णु खरे आप जो सोच रहे हैं वही सही है मैं जो सोचना चाहता हूँ वह ग़लत है सामने से आपका सर्वसम्मत व्यवस्थाएँ देना सही है पिछली क़तारों में जो मेरी छिछोरी 'क्यों' है वह ग़लत है मेरी वजह से आपको असुविधा है यह सही है हर खेल बिगाड़ने की मेरी ग़ैरज़िम्मेदार हरकत ग़लत है अँधियारी गोल मेज़ के सामने मुझे पेश किया जाना सही है रोशनी में चेहरे देखने की मेरी दरख़्वास्त ग़लत है आपने जो सज़ा तज़वीज़ की है...
Beej | Kumar Ambuj 09.10.2023 1:59
बीज | कुमार अंबुज जो पराजित है वह धन है संसार का यह हवा बहेगी एक हारे हुए का जीवन सँभालने के लिए ही जो जानती है कि पराजित होना ज़िंदगी से बाहर होना नहीं दाख़िल होना है एक विशाल दुनिया में ज़िंदगी में दाख़िल हो गए इस व्यक्ति को ईर्ष्या और प्रशंसा और अचरज से देखता है जीवन से बाहर खड़ा आदमी वह समझ ही नहीं पाता है कि वह तो फ्रेम से बाहर खड़ा हुआ प्रेक्षक है एक जो पराजित है और टूट नहीं गया है वह नए संसार क...
Darshan | Ajanta Dev 08.10.2023 2:05
दर्शन | अजंता देव मुझे कभी नहीं दीखता अपना असली चेहरा वह चेहरा जो दूसरे देखते हैं। मुझे हर बार सहारा लेना पड़ता है आईने का और जब आईने के सामने होती हूँ तब मेरा चेहरा होता है तनावरहित ख़ुशमिज़ाज प्रसाधनों से दमकता मुझे कभी पता नहीं चलेगा ग़ुस्से और नफ़रत से जलती आँखों का नींद में ढलके होठों का खाते समय फूलते-पिचकते गालों का प्रियजनों के बीच छलकते अनुराग का बहुत पहले मेरे जन्म पर लोगों ने देखा था मे...
Char Kauwe | Bhawani Prasad Mishra 07.10.2023 2:44
चार कौए | भवानी प्रसाद मिश्र बहुत नहीं थे सिर्फ चार कौए थे काले उन्होंने यह तय किया कि सारे उड़ने वाले उनके ढंग से उड़ें, रुकें, खायें और गायें वे जिसको त्योहार कहें सब उसे मनायें। कभी-कभी जादू हो जाता है दुनिया में दुनिया भर के गुण दिखते हैं औगुनिया में ये औगुनिए चार बड़े सरताज हो गये इनके नौकर चील, गरूड़ और बाज़ हो गये। हंस मोर चातक गौरैयें किस गिनती में हाथ बांधकर खडे़ हो गए सब विनती में हुक्म ह...
Rai Ka Daana | Monika Kumar 06.10.2023 2:14
राई का दाना | मोनिका कुमार उपेक्षा अस्तित्व के किसी अमूर्त हिस्से पर नहीं सीधा दिल पर आघात करती है। हर बार की दुत्कार से हमारा दिल थोड़ा सिकुड़ जाता है। एक दिन यह सिकुड़ कर इतना छोटा हो जाता है जैसे राई का दाना, राई का दाना इतना छोटा होता है जैसे है ही नहीं, लिहाज़ा चम्मच भर डालने की सलाह देती हैं चाचियाँ जिन्होंने सदियों पहले समझ लिया था उपेक्षा से मिले दुःख अपनी जगह और अरहर की दाल का स्व...
Pinjre | Samriddhi Manchanda 05.10.2023 1:29
पिंजरे | समृद्धि मनचंदा ओ पगली लड़की! तुम पिंजरे की नहीं जंगलों की हो स्थिरता नहीं उत्पात चुनो अपनी माँओं को जन्म दो बेटियों को रीढ़ कोई पर्यावरणविद् कभी नहीं बताएगा कि एक ज़िद्दी लड़की दुनिया का सबसे लुप्तप्राय जीव है।
Gussa | Mamta Kalia 04.10.2023 1:14
गुस्सा | ममता कालिया उसने हैरानी से मुझे देखा 'मैं तो मज़ाक कर रहा था तुम इतनी नाराज़ क्यों हो गयीं ?' मैं उसे कैसे बताती यह गुस्सा आज और अभी का नहीं इसमें बहुत सा पुराना गुस्सा भी शामिल है एक सन तिरासी का एक तिरानवे का एक दो हज़ार दो का और एक यह आज का
Phagun | Anju Ranjan 03.10.2023 2:04
फाल्गुन | अंजु रंजन एक अलस दुपहरी में उस दुपहरी को खोजती हूँ कच्ची अमिया और सितुवाँ को पत्थर पर घिसती हूँ मलमल के दुपट्टे से रिसते-पिघलते कच्चे चटपटे कचूमर को चखती हूँ कभी चटखारे लेकर आँखें मींचकर अमचूर चुराती हूँ उसी दुपहरी में पीले सरसों में छिपकर कच्चे, कोमल चने और मटर खाना चाहती हूँ सरसराती हवाओं में पकते गुड़ की भीली की मीठी सुगंध को साँस खींचकर ढूँढ़ती हूँ। बसंत तो आ गया पर वे सौगातें क...
Kaisa Sant Humara | Sagar Nizami 02.10.2023 1:49
कैसा संत हमारा | साग़र निज़ामी कैसा संत हमारा गांधी कैसा संत हमारा दुनिया गो थी दुश्मन उसकी दुश्मन था जग सारा आख़िर में जब देखा साधो वह जीता जग हारा कैसा संत हमारा गांधी कैसा संत हमारा! सच्चाई के नूर से उस के मन में था उजियारा बातिन में शक्ती ही शक्ती ज़ाहर में बेचारा कैसा संत हमारा गांधी कैसा संत हमारा! बूढ़ा था या नए जनम में बंसी का मतवारा मोहन नाम सही था पर साधो रूप वही था सारा कैसा संत ह...
Todti Pathar | Suryakant Tripathi 'Nirala' 01.10.2023 2:27
तोड़ती पत्थर | सूर्यकांत त्रिपाठी निराला वह तोड़ती पत्थर; देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर- वह तोड़ती पत्थर। कोई न छायादार पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार; श्याम तन, भर बँधा यौवन, नत नयन प्रिय, कर्म-रत मन, गुरु हथौड़ा हाथ, करती बार-बार प्रहार :- सामने तरु-मालिका अट्टालिका, प्राकार। चढ़ रही थी धूप; गर्मियों के दिन दिवा का तमतमाता रूप; उठी झुलसाती हुई लू, रुई ज्यों जलती हुई भू, गर्द...
Kothari Aur Duniya | Vishwanath Prasad Tiwari 30.09.2023 2:03
कोठरी और दुनिया | विश्वनाथ प्रसाद तिवारी वे अपने ताले को देख कर ख़ुश हैं ख़ुश हैं क्योंकि उसके भीतर मैं हूँ जिसकी तलाश थी उन्हें मगर मैं वहाँ नहीं हूँ जहाँ वे देख रहे हैं मुझे मैं उस हरे मैदान में हूँ जहाँ रंग-बिरंगे बच्चे खेल रहे हैं मैं उस समुद्र किनारे हूँ जहाँ प्रेमी-प्रेमिकाएँ टहल रहे हैं मैं उस आकाश के नीचे हूँ जहाँ पक्षी उड़ानें भर रहे हैं बाहर पराजित, भीतर मैं अजेय हूँ वे अपने त...
Jugnu | Geet Chaturvedi 29.09.2023 1:42
जुगनू | गीत चतुर्वेदी साल में एक रात ऐसी आती है जब एक कविता किताब के पन्नों से निकलती है और जुगनू बनकर जंगल चली जाती है जब सूरज को एक लंबा ग्रहण लगेगा चाँद रूठकर कहीं चला जाएगा जंगल से लौटकर आएँगे ये सारे जुगनू और अँधेरे से डरने वालों को रोशनी देंगे
Ujle Din Zaroor | Viren Dangwal 28.09.2023 2:58
उजले दिन ज़रूर - वीरेन डंगवाल निराला को आएँगे, उजले दिन ज़रूर आएँगे आतंक सरीखी बिछी हुई हर ओर बर्फ़ है हवा कठिन, हड्डी-हड्डी को ठिठुराती आकाश उगलता अंधकार फिर एक बार संशय-विदीर्ण आत्मा राम की अकुलाती होगा वह समर, अभी होगा कुछ और बार तब कहीं मेघ ये छिन्न-भिन्न हो पाएँगे। तहख़ानों से निकले मोटे-मोटे चूहे जो लाशों की बदबू फैलाते घूम रहे हैं कुतर रहे पुरखों की सारी तस्वीरें चीं-चीं, चिक्-चिक् की धूम म...
Aabhaar | Shivmangal Singh Suman 27.09.2023 2:32
आभार - शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला उस उस राही को धन्यवाद। जीवन अस्थिर अनजाने ही हो जाता पथ पर मेल कहीं सीमित पग-डग, लम्बी मंज़िल तय कर लेना कुछ खेल नहीं दाएँ-बाएँ सुख-दुख चलते सम्मुख चलता पथ का प्रमाद जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला उस उस राही को धन्यवाद। साँसों पर अवलम्बित काया जब चलते-चलते चूर हुई दो स्नेह-शब्द मिल गए, मिली नव स्फूर्ति थकावट दूर हुई पथ के पहचाने छूट गए पर साथ-साथ च...
Andhere Ka Musafir | Sarveshwar Dayal Saxena 26.09.2023 2:25
अँधेरे का मुसाफ़िर - सर्वेश्वरदयाल सक्सेना यह सिमटती साँझ, यह वीरान जंगल का सिरा, यह बिखरती रात, यह चारों तरफ सहमी धरा; उस पहाड़ी पर पहुँचकर रोशनी पथरा गयी, आख़िरी आवाज़ पंखों की किसी के आ गयी, रुक गयी अब तो अचानक लहर की अँगड़ाइयाँ, ताल के ख़ामोश जल पर सो गई परछाइयाँ। दूर पेड़ों की कतारें एक ही में मिल गयीं, एक धब्बा रह गया, जैसे ज़मीनें हिल गयीं, आसमाँ तक टूटकर जैसे धरा पर गिर गया, बस धुँए के बादल...
Kaling | Srikant Verma 25.09.2023 1:24
कलिंग - श्रीकांत वर्मा केवल अशोक लौट रहा है और सब कलिंग का पता पूछ रहे हैं केवल अशोक सिर झुकाए हुए है और सब विजेता की तरह चल रहे हैं केवल अशोक के कानों में चीख़ गूँज रही है और सब हँसते-हँसते दोहरे हो रहे हैं केवल अशोक ने शस्त्र रख दिये हैं केवल अशोक लड़ रहा था ।
Main Jungle Se Guzarta Hun To Lagta Hai | Gulzar 24.09.2023 2:21
मैं जंगल से गुज़रता हूँ तो लगता है मेरे पुरखे खड़े हैं! | गुलज़ार मैं जंगल से गुज़रता हूँ तो लगता है मेरे पुरखे खड़े हैं मैं इक नौ ज़ाइदा बच्चा ये पेड़ों के क़बीले उठा के हाथ में मुझ को झुलाते हैं कोई इक झुनझुना फूलों का हाथों से बजाता है कोई आँखों पे पुचकाता है खुशबुओं की पिचकारी बहुत बूढ़ा-सा दढ़ियल एक बरगद गोद में लेकर मुझे हैरान होता है, सुनाता है तुम अब चलने लगे हो! हमारे जैसे थे तुम भी, जड़ें...
Chalne Ke Liye | Vinod Kumar Shukla 23.09.2023 1:48
चलने के लिए | विनोद कुमार शुक्ल चलने के लिए जब खड़े हुए तो जूतों की जगह पैरों में सड़कें पहन ली एक नहीं दो नहीं बदल बदलकर हजारों सड़कें तंग ऊबड़ खाबड़ बहुत चौड़ी सड़कें। खूब चलें कि ज़िन्दगी के नजदीक आने को बहुत मन होता है वाकई ! ज़िन्दगी से होती हुई कोई सड़क जरूर जाती होगी- मैं कोई ऐसा जूता बनवाना चाहता हूँ जो मेरे पैरों में ठीक-ठाक आए।
Benaam Sa Ye Dard | Nida Fazli 22.09.2023 2:18
बे-नाम सा ये दर्द | निदा फ़ाज़ली बे-नाम सा ये दर्द ठहर क्यूँ नहीं जाता जो बीत गया है वो गुज़र क्यूँ नहीं जाता सब कुछ तो है क्या ढूँढती रहती हैं निगाहें क्या बात है मैं वक़्त पे घर क्यूँ नहीं जाता वो एक ही चेहरा तो नहीं सारे जहाँ में जो दूर है वो दिल से उतर क्यूँ नहीं जाता मैं अपनी ही उलझी हुई राहों का तमाशा जाते हैं जिधर सब मैं उधर क्यूँ नहीं जाता वो ख़्वाब जो बरसों से न चेहरा न बदन है वो ख़्वाब ह...
Kaise Log They Hum | Vishwanath Prasad Tiwari 21.09.2023 1:52
कैसे लोग थे हम - विश्वनाथ प्रसाद तिवारी गेहूँ की बालियों में लगते रहे कीड़े हम खामोश रहे सफेद कपड़ों से काँपते रहे गाँव हम खामोश रहे समुद्र में तूफान आया हम खामोश रहे ज्वालामुखी विस्फोट हुए हम खामोश रहे बादलों से आग की वर्षा हुई हम खामोश रहे उसने खींच ली म्यान से तलवार हम खामोश रहे कैसे लोग थे हम हमें बोलने की छूट दी गई हम खामोश रहे।
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