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Pratidin Ek Kavita

Arts HI ↓ 1195 episodes

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

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Jul 11, 2026

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Episodes

Samay Nahin Lagta Hain | Ajay Jugran 29.09.2024

समय नहीं लगता है | अजेय जुगरान आज के कल हो जाने में कल के कभी नहीं होने में समय नहीं लगता है। अक्सर इस छोटे से जीवन में अवसर को पाकर खोने में समय नहीं लगता है। अनुकूल की प्रतीक्षा में प्रतिकूल के आ जाने में समय नहीं लगता है। शुभ मुहूर्त का मंतव्य बनाते दृश्य गंतव्य अमूर्त होने में समय नहीं लगता है। इस पल में ही सब बीज हैं इस पल में ही सब हल हैं आज में ही सब तीज हैं शुभमय यही समय है सोकर इसे गवाँ द...

Hum Hain Tana Huma Hain Bana | Uday Prakash 28.09.2024

हम हैं ताना, हम हैं बाना |  उदय प्रकाश  हम हैं ताना, हम हैं बाना। हमीं चदरिया, हमीं जुलाहा, हमीं गजी, हम थाना॥ हम हैं ताना''॥ नाद हमीं, अनुनाद हमीं, निःशब्द हमीं गंभीरा, अंधकार हम, चाँद-सूरज हम, हम कान्हा, हम मीरा। हमीं अकेले, हमीं दु्केले, हम चुग्गा, हम दाना॥ हम हैं ताना'''॥ मंदिर-महजिद, हम. गुरुद्वारा, हम मठ, हम बैरागी हमीं पुजारी, हमीं देवता, हम कीर्तन, हम रागी। आखत-रोली, अलख-भभूती, रूप धरें हम...

Charitra | Tasleema Nasrin 27.09.2024

चरित्र | तस्लीमा नसरीन  तुम लड़की हो,  यह अच्छी तरह याद रखना  तुम जब घर की चौखट लाँघोगी  लोग तुम्हें टेढ़ी नज़रों से देखेंगे  तुम जब गली से होकर चलती रहोगी  लोग तुम्हारा पीछा करेंगे, सीटी बजाएँगे  तुम जब गली पार कर मुख्य सड़क पर पहुँचोगी  लोग तुम्हें बदचलन कहकर गालियाँ देंगे  तुम हो जाओगी बेमानी  अगर पीछे लौटोगी  वरना जैसे जा रही हो  जाओ। 

Padhna Mere Pair | Jyoti Pandey 26.09.2024

पढ़ना मेरे पैर | ज्योति पांडेय मैं गई  जबकि मुझे नहीं जाना था।  बार-बार, कई बार गई।  कई एक मुहानों तक  न चाहते हुए भी…  मेरे पैर मुझसे असहमत हैं,  नाराज़ भी।  कल्पनाओं की इतनी यात्राएँ की हैं  कि अगर कभी तुम देखो  तो पाओगे कि कितने थके हैं ये पाँव!  जंगल की मिट्टी, पहाड़ों की घास और समंदर की रेत से भरी हैं बिवाइयाँ।  नाख़ूनों पर पुत गया है- हरा-नीला मटमैला सब रंग;  कोई भी नेलकलर लगाऊँ  दो दिन से ज़्या...

Tinka Tinka Kaante Tode Sari Raat Kataai Ki | Gulzar 25.09.2024

तिनका तिनका काँटे तोड़े सारी रात कटाई की | गुलज़ार तिनका तिनका काँटे तोड़े सारी रात कटाई की क्यूँ इतनी लम्बी होती है चाँदनी रात जुदाई की नींद में कोई अपने-आप से बातें करता रहता है काल-कुएँ में गूँजती है आवाज़ किसी सौदाई की सीने में दिल की आहट जैसे कोई जासूस चले हर साए का पीछा करना आदत है हरजाई की आँखों और कानों में कुछ सन्नाटे से भर जाते हैं क्या तुम ने उड़ती देखी है रेत कभी तन्हाई की तारों की रौशन...

Kare Jo Parvarish Vo Hi Khuda Hai | Ajay Agyat 24.09.2024

करे जो परवरिश वो ही ख़ुदा है | अजय अज्ञात करे जो परवरिश वो ही ख़ुदा है  उसी का मर्तबा सब से बड़ा है बुरे हालात में जो काम आए उसे पूजो वो सचमुच देवता है धुआं फैला है हर सू नफरतों का मुहब्बत का परिंदा लापता है न जाने हश्र क्या हो मंज़िलों का यहाँ अंधों की ज़द पे रास्ता है अगर हो साधना निष्काम अपनी जहाँ ढूढ़ो वहीं मिलता ख़ुदा है वहीं होती सदा सच्ची कमाई जहाँ भी नेकियों का क़ाफ़िला है

Rath Daudte Hain Rangeen Phoolon Ke 23.09.2024

रथ दौड़ते हैं रंगीन फूलों के | केदारनाथ अग्रवाल   रंग नहीं रथ दौड़ते हैं रंगीन फूलों के सांध्य गगन में। देखो-बस-देखो। रंग नहीं ध्वज फहरते हैं रंगीन स्वप्नों के सांध्य गगन में। झूमो-बस-झूमो! रंग नहीं नट नाचते हैं रंगीन छंदों के सांध्य गगन में! नाचो-बस-नाचो!

Jo Hawa Me Hai | Umashankar Tiwari 22.09.2024

जो हवा में है | उमाशंकर तिवारी जो हवा में है, लहर में है क्यों नहीं वह बात, मुझमें है? शाम कन्धों पर लिए अपने ज़िन्दगी के रू-ब-रू चलना रोशनी का हमसफ़र होना उम्र की कन्दील का जलना आग जो जलते सफ़र में है क्यों नहीं वह बात मुझमें है? रोज़ सूरज की तरह उगना शिखर पर चढ़ना, उतर जाना घाटियों में रंग भर जाना फिर सुरंगों से गुज़र जाना जो हँसी कच्ची उमर में है क्यों नहीं वह बात मुझमें है? एक नन्हीं जान चिडि़...

Maine Kaha Baarish | Shahanshah Alam 21.09.2024

मैंने कहा बारिश | शहंशाह आलम  मैंने कहा बारिश उसने कहा प्रेम मैंने कहा प्रेम उसने कहा पेड़ मैंने कहा पेड़ उसने कहा चिड़ियाँ मैंने कहा चिड़ियाँ उसने कहा जलकुंड मैंने कहा जलकुंड उसने कहा चंद्रमा मैंने कहा चंद्रमा उसने कहा उदासी फिर मैंने कुछ नहीं कहा देखा बादल उसकी उदासी को अपने पानी से धो रहा था।

Dukh | Achal Vajpeyi 20.09.2024

दुख / अचल वाजपेयी उसे जब पहली बार देखा लगा जैसे भोर की धूप का गुनगुना टुकड़ा कमरे में प्रवेश कर गया है अंधेरे बंद कमरे का कोना-कोना उजास से भर गया है एक बच्चा है जो किलकारियाँ मारता मेरी गोद में आ गया है एकांत में सैकड़ों गुलाब चिटख गए हैं काँटों से गुँथे हुए गुलाब एक धुन है जो अंतहीन निविड़ में दूर तक गहरे उतरती है मेरे चारों ओर उसने एक रक्षा-कवच बुन दिया है अब मैं तमाम हादसों के बीच सुरक्षित गुज...

Khali Ghar | Chandrakanta 19.09.2024

खाली घर | चंद्रकांता  सब कुछ वही था सांगोपांग घर ,कमरे,कमरे की नक्काशीदार छत नदी पर मल्लाहों की इसरार भरी पुकार   सडक पर हंगामों के बीच  दौड़ते- भागते बेतरतीब हुजूम के हुजूम !  और आवाज़ों के कोलाज में खड़ा खाली घर! बोधिसत्व सा,निरुद्वेग,निर्पेक्ष समय सुन रहा था उसका बेआवाज़ झुनझुने की तरह बजना! देख रहा था गोद में चिपटाए दादू के झाड़फ़ानूस  पापा की कद्दावार चिथड़ा तस्वीर, इधर उल्टे -सीधे खिलौनों के...

Naye Din Ke Saath | Kedarnath Singh 18.09.2024

नए दिन के साथ | केदारनाथ सिंह   नए दिन के साथ एक पन्ना खुल गया कोरा हमारे प्यार का सुबह, इस पर कहीं अपना नाम तो लिख दो बहुत से मनहूस पन्नों में इसे भी कहीं रख दूंगा। और जब-जब हवा आकर उड़ा जाएगी अचानक बन्द पन्नों को कहीं भीतर मोरपंखी की तरह रक्खे हुए उस नाम को हर बार पढ़ लूगा।

Registan Ki Raat Hai | Deepti Naval 17.09.2024

रेगिस्तान की रात है / दीप्ति नवल रेगिस्तान की रात है और आँधियाँ सी बनते जाते हैं निशां मिटते जाते हैं निशां दो अकेले से क़दम ना कोई रहनुमां ना कोई हमसफ़र रेत के सीने में दफ़्न हैं ख़्वाबों की नर्म साँसें यह घुटी-घुटी सी नर्म साँसें ख़्वाबों की थके-थके दो क़दमों का सहारा लिए ढूँढ़ती फिरती हैं सूखे हुए बयाबानों में शायद कहीं कोई साहिल मिल जाए रात के आख़री पहर से लिपटे इन ख़्वाबों से इन भटकते क़दमों...

Ped Aur Patte | Adarsh Kumar Mishra 16.09.2024

पैड़ और पत्ते | आदर्श कुमार मिश्र  पेड़ से पत्ते टूट रहे हैं पेड़ अकेला रहता है, उड़ - उड़कर पते दूर गए हैं पेड़ अकेला रहता है, कुछ पत्तों के नाम बड़े हैं, पहचान है छोटे कुछ पत्तों के काम बड़े पर बिकते खोटे कुछ पत्तों  पर कोई शिल्पी  अपने मन का चित्र बनाकर बेच रहा है कुछ पत्तों को लाला साहू अपने जूते पोंछ - पोंछकर फेक रहा है कुछ पत्ते बेनाम पड़े हैं, सूख रहें हैं, गल जायेंगे कुछ पत्तों के किस्मत में...

Main Isliye Likh Raha Hun | Achyutanand Mishra 15.09.2024

मैं इसलिए लिख रहा हूं | अच्युतानंद मिश्र मैं इसलिए लिख रहा हूं कि मेरे हाथ काट दिए जाएं मैं इसलिए लिख रहा हूं कि मेरे हाथ तुम्हारे हाथों से मिलकर उन हाथों को रोकें जो इन्हें काटना चाहते हैं

Lok Malhar | Dr Sheoraj Singh 'Bechain' 14.09.2024

लोक मल्हार | डॉ श्योराज सिंह 'बेचैन' सुन बहिना! मेरे जियरबा की बात उदासी मेरे मन बसी। सैंया तलाशें री बहना नौकरी देवर स्वप्न में फिल्‍मी छोकरी। मेरी बहिना, ननदी तलाशे भरतार, ससुर ढूँढे लखपति........मेरी बहिना!   मैं ना पढ़ी , न मेरे बालका शोषण करे हैं मेरे मालिका मोइ न मिल्यौ री स्वराज । मेरी बहना गुलामों जैसी जिन्दगी । सुन बहना मेरे जियरबा की बात उदासी मेरे मन बसी कड़वी, दुखीली, बैरिन रात है। रोटी...

Khushi Kaisa Durbhagya | Manglesh Dabral 13.09.2024

खुशी कैसा दुर्भाग्य | मगलेश डबराल  जिसने कुछ रचा नहीं समाज में उसी का हो चला समाज वही है नियन्ता जो कहता है तोडँगा अभी और भी कुछ जो है खूँखार हँसी है उसके पास जो नष्ट कर सकता है उसी का है सम्मान झूठ फ़िलहाल जाना जाता है सच की तरह प्रेम की जगह सिंहासन पर विराजती घृणा बुराई गले मिलती अच्छाई से मूर्खता तुम सन्तुष्ट हो तुम्हारे चेहरे पर उत्साह है। घूर्तता तुम मज़े में हो अपने विशाल परिवार के साथ प्रसन...

Chupchap Ullas | Bhawani Prasad Mishra 12.09.2024

चुपचाप उल्लास | भवानीप्रसाद मिश्र हम रात देर तक बात करते रहे जैसे दोस्त बहुत दिनों के बाद मिलने पर करते हैं और झरते हैं जैसे उनके आस पास उनके पुराने गाँव के स्वर और स्पर्श और गंध और अंधियारे फिर बैठे रहे देर तक चुप और चुप्पी में कितने पास आए कितने सुख कितने दुख कितने उल्लास आए और लहराए हम दोनों के बीच चुपचाप !

Seene Me Kya Hai Tumhare | Akshay Upadhyay 11.09.2024

सीने में क्या है तुम्हारे / अक्षय उपाध्याय कितने सूरज हैं तुम्हारे सीने में कितनी नदियाँ हैं कितने झरने हैं कितने पहाड़ हैं तुम्हारी देह में कितनी गुफ़ाएँ हैं कितने वृक्ष हैं कितने फल हैं तुम्हारी गोद में कितने पत्ते हैं कितने घोंसले हैं तुम्हारी आत्मा में कितनी चिड़ियाँ हैं कितने बच्चे हैं तुम्हारी कोख में कितने सपने हैं कितनी कथाएँ हैं तुम्हारे स्वप्नों में कितने युद्ध हैं कितने प्रेम हैं केवल न...

Bhookh | Achyutanand Mishra 10.09.2024

भूख / अच्युतानंद मिश्र मेरी माँ अभी मरी नहीं उसकी सूखी झुलसी हुई छाती और अपनी फटी हुई जेब अक्सर मेरे सपनों में आती हैं मेरी नींद उचट जाती है मैं सोचने लगता हूँ मुझे किसका ख्याल करना चाहिए किसके बारे में लिखनी चाहिए कविता

Khejadi Se Ugi Ho | Nandkishore Acharya 09.09.2024

खेजड़ी-सी उगी हो | नंदकिशोर आचार्य  खेजड़ी-सी उगी हो मुझ में हरियल खेजड़ी सी तुम सूने, रेतीले विस्तार में : तुम्हीं में से फूट आया हूँ ताज़ी, घनी पत्तियों-सा। कभी पतझड़ की हवाएँ झरा देंगी मुझे जला देंगी कभी ये सुखे की आहें! तब भी तुम रहोगी मुझे भजती हुई अपने में सींचता रहूँगा मैं तुम्हें अपने गहनतम जल से। जब तलक तुम हो मेरे खिलते रहने की सभी सम्भावनाएँ हैं।

Raat Yun Kehne Laga Mujhse Gagan Ka Chand | Ramdhari Singh 'Dinkar' 08.09.2024

रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद / रामधारी सिंह "दिनकर" रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद, आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है! उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता, और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है। जानता है तू कि मैं कितना पुराना हूँ? मैं चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरते; और लाखों बार तुझ-से पागलों को भी चाँदनी में बैठ स्वप्नों पर सही करते। आदमी का स्वप्न? है वह बुलबुला जल का; आज उठता और कल फिर फूट जाता है;...

Pita Ke Ghar Me | Rupam Mishra 07.09.2024

पिता के घर में | रूपम मिश्रा पिता क्या मैं तुम्हें याद हूँ! मुझे तो तुम याद रहते हो क्योंकि ये हमेशा मुझे याद कराया गया फासीवाद मुझे कभी किताब से नहीं समझना पड़ा पिता के लिए बेटियाँ शरद में देवभूमि से आई प्रवासी चिड़िया थीं या बँसवारी वाले खेत में उग आई रंग-बिरंगी मौसमी घास पिता क्या मैं तुम्हें याद हूँ! शुकुल की बेटी हो! ये आखर मेरे साथ चलता रहा जब सबको याद रहा कि मैं तुम्हारी बेटी हूँ तो तुम्हें...

Paas | Ashok Vajpeyi 06.09.2024

पास | अशोक वाजपेयी  पत्थर के पास था वृक्ष वृक्ष के पास थी झाड़ी झाड़ी के पास थी घास घास के पास थी धरती धरती के पास थी ऊँची चट्टान चट्टान के पास था क़िले का बुर्ज बुर्ज के पास था आकाश आकाश के पास था शुन्य शुन्य के पास था अनहद नाद नाद के पास था शब्द शब्द के पास था पत्थर सब एक-दूसरे के पास थे पर किसी के पास समय नहीं था।

Padhakku Ka Soojh | Ramdhari Singh 'Dinkar' 05.09.2024

पढ़क्‍कू की सूझ | रामधारी सिंह "दिनकर" एक पढ़क्कू बड़े तेज थे, तर्कशास्त्र पढ़ते थे, जहाँ न कोई बात, वहाँ भी नए बात गढ़ते थे। एक रोज़ वे पड़े फिक्र में समझ नहीं कुछ न पाए, "बैल घुमता है कोल्हू में कैसे बिना चलाए?" कई दिनों तक रहे सोचते, मालिक बड़ा गज़ब है? सिखा बैल को रक्खा इसने, निश्चय कोई ढब है। आखिर, एक रोज़ मालिक से पूछा उसने ऐसे, "अजी, बिना देखे, लेते तुम जान भेद यह कैसे? कोल्हू का यह बैल तुम...

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