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Pratidin Ek Kavita

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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

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Jul 11, 2026

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Episodes

Kai Aankhon Ki Hairat They Nahi Hain | Aks Samastipuri 09.10.2025

कई आँखों की हैरत थे नहीं हैं | अक्स समस्तीपुरी  कई आँखों की हैरत थे नहीं हैं नये मंज़र की सूरत थे नहीं हैं बिछड़ने पर तमाशा क्यों बनाएँ तुम्हारी हम ज़रूरत थे नहीं हैं

Awara Ke Daag Chahiye | Devi Prasad Mishra 08.10.2025

आवारा के दाग़ चाहिए | देवी प्रसाद मिश्र दो वक़्तों का कम से कम तो भात चाहिए गात चाहिए जो न काँपे सत्ता के सम्मुख जो कह दूँ बात चाहिए कि छिप जाने को रात चाहिए पूरी उम्र लगें कितने ही दाग़ चाहिए मात चाहिए बहुत इश्क़ में फ़ाग चाहिए राग चाहिए साथ चाहिए उठा हुआ वह हाथ चाहिए नाथ चाहिए नहीं कि अपना माथ चाहिए झुके नहीं जो राख चाहिए इच्छाओं की भूख लगी है साग चाहिए बाग़ चाहिए सोना है अब लाग चाहिए बहुत विफल का भ...

Lagaav | Ramdarash Mishra 07.10.2025

लगाव | रामदरश मिश्र  उसने कविता में लिखा 'फूल' तुमने उसे काटकर 'कीचड़' लिख दिया उसने कविता में लिखा 'चिड़िया' तुमने उसे काटकर 'गुरिल्ला' लिख दिया और आपस में जूझने लगे दरअसल तुम दोनों का न फूल से कोई लगाव-अलगाव था न चिड़िया से तुम दोनों को अपने-अपने अस्तित्व की चिन्ता सताती रही और तुम्हारी बहसों से बेख़बर मस्ती से फूल खिलता रहा चिड़िया गाती रही।

Main Ud Jaunga | Rajesh Joshi 06.10.2025

मैं उड़ जाऊँगा | राजेश जोशी  सबको चकमा देकर एक रात मैं किसी स्वप्न की पीठ पर बैठकर उड़ जाऊँगा हैरत में डाल दूँगा सारी दुनिया को सब पूछते बैठेंगे कैसे उड़ गया ? क्यों उड़ गया ? तंग आ गया हूँ मैं हर पल नष्ट हो जाने की आशंका से भरी इस दुनिया से और भी ढेर तमाम जगह हैं इस ब्रह्मांड में मैं किसी भी दुसरे ग्रह पर जाकर बस जाऊँगा मैं तो कभी का उड़ गया होता चाय की गुमटियों और ढाबों में गरम होते तन्दूर पर सि...

Dekho Socho Samjho | Bhagwati Charan Verma 05.10.2025

देखो-सोचो-समझो | भगवतीचरण वर्मा देखो, सोचो, समझो, सुनो, गुनो औ' जानो इसको, उसको, सम्भव हो निज को पहचानो लेकिन अपना चेहरा जैसा है रहने दो, जीवन की धारा में अपने को बहने दो तुम जो कुछ हो वही रहोगे, मेरी मानो । वैसे तुम चेतन हो, तुम प्रबुद्ध ज्ञानी हो तुम समर्थ, तुम कर्ता, अतिशय अभिमानी हो लेकिन अचरज इतना, तुम कितने भोले हो ऊपर से ठोस दिखो, अन्दर से पोले हो बन कर मिट जाने की एक तुम कहानी हो । पल में...

Isiliye | Gagan Gill 04.10.2025

इसीलिए | गगन गिल वह नहीं होगा कभी भी  फाँसी पर झूलता हुआ आदमी वारदात की ख़बरें पढ़ते हुए  सोचता था वह  गर्दन के पीछे हो रही सुरसुरी को वह  मुल्तवी करता रहता था  तमाम ख़बरों के बावजूद  सोचता था  अपने लिए एक बिलकुल अलग अंत इसीलिए जब अंत आया  तो अलग तरह से नहीं आया

Ve Sab Meri Hi Jaati Se Thin | Rupam Mishra 03.10.2025

वे सब मेरी ही जाति से थीं | रूपम मिश्र  मुझे तुम ने समझाओ अपनी जाति को चीन्हना श्रीमान बात हमारी है हमें भी कहने दो ये जो कूद-कूद कर अपनी सहुलियत से मर्दवाद का बहकाऊ नारा लगाते हो उसे अपने पास ही रखो तुम बात सत्ता की करो जिसने अपने गर्वीले और कटहे पैर से हमेशा मनुष्यता को कुचला है जिसकी जरासन्धी भुजा कभी कटती भी है तो फिर से जुड़ जाती है रामचरितमानस में शबरी-केवट-प्रसंग सुनती आजी सुबक उठतीं और घुर...

Smriti Pita | Viren Dangwal 02.10.2025

स्मृति पिता | वीरेन डंगवाल एक शून्य की परछाईं के भीतर  घूमता है एक और शून्य  पहिये की तरह मगर कहीं न जाता हुआ  फिरकी के भीतर घूमती एक और फिरकी शैशव के किसी मेले की

Ve Din Aur Ye Din | Ramdarash Mishra 01.10.2025

वे दिन और ये दिन | रामदरश मिश्र तब वे दिन आते थे उड़ते हुए इत्र-भीगे अज्ञात प्रेम-पत्र की तरह और महमहाते हुए निकल जाते थे उनकी महमहाहट भी मेरे लिए एक उपलब्धि थी। अब ये दिन आते हैं सरकते हुए सामने जमकर बैठ जाते हैं। परीक्षा के प्रश्न-पत्र की तरह आँखों को अपने में उलझाकर आह! हटते ही नहीं ये दिन जिनका परिणाम पता नहीं कब निकलेगा।

Walid Ki Wafaat Par | Nida Fazli 30.09.2025

वालिद की वफ़ात पर | निदा फ़ाज़ली तुम्हारी क़ब्र पर मैं फ़ातिहा पढ़ने नहीं आया मुझे मालूम था तुम मर नहीं सकते तुम्हारी मौत की सच्ची ख़बर जिस ने उड़ाई थी वो झूटा था वो तुम कब थे कोई सूखा हुआ पत्ता हवा से मिल के टूटा था मिरी आँखें तुम्हारे मंज़रों में क़ैद हैं अब तक मैं जो भी देखता हूँ सोचता हूँ वो वही है जो तुम्हारी नेक-नामी और बद-नामी की दुनिया थी कहीं कुछ भी नहीं बदला तुम्हारे हाथ मेरी उँगलियों में...

Devi Banne Ki Raah Mein | Priya Johri 'Muktipriya' 29.09.2025

देवी बनने की राह में  | प्रिया जोहरी 'मुक्ति प्रिया' देवी बनने की राह में लंबा सफ़र तय किया हमने कई भूमिकाऐँ बदली आंसू की बूंदो का स्वाद चखा खून बहाया कटा चीरा ख़ुद को अपमान के साथ झेली कई यातनाएँ हमने छोड़ा अपना घर पुराने खिलौंने अपनी प्रिय सखी अपना शहर हमने छोड़ दिया अपने सपनों को और छोटी-छोटी आशाओं को नहीं देखा कभी खुल कर शहर को नहीं जान पाए हम खुद की मर्ज़ी से जीना कैसा होता है रात में सड़कों प...

Main Sabse Choti Hun | Sumitranandan Pant 28.09.2025

मैं सबसे छोटी हूँ | सुमित्रानंदन पन्त मैं सबसे छोटी होऊँ, तेरा अंचल पकड़-पकड़कर फिरूँ सदा माँ! तेरे साथ, कभी न छोड़ूँ तेरा हाथ! बड़ा बनाकर पहले हमको तू पीछे छलती है मात! हाथ पकड़ फिर सदा हमारे साथ नहीं फिरती दिन-रात! अपने कर से खिला, धुला मुख, धूल पोंछ, सज्जित कर गात, थमा खिलौने, नहीं सुनाती हमें सुखद परियों की बात! ऐसी बड़ी न होऊँ मैं तेरा स्नेह न खोऊँ मैं, तेरे अंचल की छाया में छिपी रहूँ निस्पृह...

Aapki Yaad Aati Rahi Raat Bhar | Makdoom Mohiuddin 27.09.2025

आप की याद आती रही रात भर | मख़दूम मुहिउद्दीन आप की याद आती रही रात भर चश्म-ए-नम मुस्कुराती रही रात भर रात भर दर्द की शम्अ जलती रही ग़म की लौ थरथराती रही रात भर बाँसुरी की सुरीली सुहानी सदा याद बन बन के आती रही रात भर याद के चाँद दिल में उतरते रहे चाँदनी जगमगाती रही रात भर कोई दीवाना गलियों में फिरता रहा कोई आवाज़ आती रही रात भर

Khidki Par Subah | TS Eliot | Translation - Dharmvir Bharti 26.09.2025

खिड़की पर सुबह | टी. एस. एलियट अनुवाद : धर्मवीर भारती नीचे के बावर्चीख़ाने में खड़क रही हैं नाश्ते की तश्तरियाँ और सड़क के कुचले किनारों के बग़ल-बग़ल— मुझे जान पड़ता है—कि गृहदासियों की आर्द्र आत्माएँ अहातों के फाटकों पर अंकुरित हो रही हैं, विषाद भरी कुहरे की भूरी लहरें ऊपर मुझ तक उछाल रही हैं। सड़क के तल्ले से तुड़े मुड़े हुए चेहरे और मैले कपड़ों में एक गुज़रने वाली का आँसू और एक निरुद्देश्य मुस्कान...

Yahan Sab Theek Hai | Dheeraj 25.09.2025

यहाँ सब ठीक है | धीरज शहर जाने वालों के पास हमेशा नहीं होते होंगे वापस लौटने के पैसे ऐसे में वो ढूंढते होंगे कुछ, और उसी कुछ का सब कुछ कि जैसे सब कुछ का चाय-पानी सब कुछ का नून- तेल सब कुछ का दाल-चावल और ऐसे में, और जब कोई नया आता होगा शहर तो उससे पूछते होंगे बरसात मेला, कजरी चैत करते होंगे ढेरों फ़ोन पर बात और दोहराते होंगे बस यह बात  कि यहाँ सब ठीक है आशा करता हूँ, वहाँ भी।

Yah Main Samajh Nahi Pati | Adiba Khanum 24.09.2025

 यह मैं समझ नहीं पाती| अदीबा ख़ानम यह मैं समझ नहीं पाती हम आख़िर  किस संकोच से घिर-घिर के पछ्छाड़े खाते हैं। बार-बार भागते हैं अंदर की ओर अंदर जहां सुरक्षा है अपनी ही बनाई दीवारों की अंदर जहां अंधेरा है. एक सुखद शान्त अंधेरा। वह कौन सी हड़डी है जो गले में अटकी है और जिसे जब चाहे निकालकर फेंका जा सकता है। लेकिन क्यों इस हड़डी का चुभते रहना हमें आनंद देता है? और आख़िर यही संकोच जिससे मैं जूझती हूं लगा...

Bhagwan Ke Dakiye | Ramdhari Singh Dinkar 23.09.2025

भगवान के डाकिए | रामधारी सिंह दिनकर पक्षी और बादल, ये भगवान के डाकिए हैं, जो एक महादेश से दूसरे महादेश को जाते हैं। हम तो समझ नहीं पाते हैं मगर उनकी लाई चिट्ठियाँ पेड़, पौधे, पानी और पहाड़ बाँचते हैं। हम तो केवल यह आँकते हैं कि एक देश की धरती दूसरे देश को सुगंध भेजती है। और वह सौरभ हवा में तैरते हुए पक्षियों की पाँखों पर तिरता है। और एक देश का भाप दूसरे देश में पानी बनकर गिरता है।

Maika | Anwesha Rai 'Mandakini' 22.09.2025

 मायका  | अन्वेषा राय 'मंदाकिनी' हिंदी के शब्दकोश में प्रत्येक शब्द का एक अर्थ लिखा है, मगर एक शब्द है जिसका अर्थ ना मुंशी जी को पता है, ना महादेवी को और ना ही मुझे.. “मायका" पढ़ने - पढाने के लिए हमें मायके का मतलब “मा का घर" रटवा दिया गया है ।! पर हर स्त्री, जब भी लांघती है ससुराल की दहलीज़, मायके जाने के लिए, तो आगे बढने से पूर्व उसके मन में एक सवाल खूब उधम करता है !! "माँ का घर कहाँ है!" हिंदी न...

Pita Ka Hatyara | Madan Kashyap 21.09.2025

पिता का हत्यारा | मदन कश्यप  उसके हाथ में एक फूल होता है जो मुझे चाकू की तरह दिखता है सच तो यह है कि वह चाकू ही होता है जो कैमरों में फूल जैसा दिखता है और उन तमाम लोगों को भी फूल ही दिखता है जो अपनी आँखों से नहीं देखते वह मेरे पिता का हत्यारा है रोज़ ही मिलता है टेलेविज़न चैनलों और अख़बारों में ही नहीं कभी-कभार सड़कों पर आमने-सामने भी मैं इतना डर जाता हूँ कि डरा हुआ नहीं होने का नाटक भी नहीं कर पाता...

Janhit Ka Kaam | Kedarnath Singh 20.09.2025

जनहित का काम | केदारनाथ सिंह मेह बरसकर खुल चुका था खेत जुतने को तैयार थे एक टूटा हुआ हल मेड़ पर पड़ा था और एक चिड़िया बार-बार बार-बार उसे अपनी चोंच से उठाने की कोशिश कर रही थी मैंने देखा और मैं लौट आया क्योंकि मुझे लगा मेरा वहाँ होना जनहित के उस काम में दखल देना होगा।

Ek Ajeeb Si Mushkil | Kunwar Narayan 19.09.2025

एक अजीब-सी मुश्किल | कुँवर नारायण एक अजीब-सी मुश्किल में हूँ इन दिनों— मेरी भरपूर नफ़रत कर सकने की ताक़त दिनोंदिन क्षीण पड़ती जा रही अंग्रेज़ों से नफ़रत करना चाहता जिन्होंने दो सदी हम पर राज किया तो शेक्सपीयर आड़े आ जाते जिनके मुझ पर न जाने कितने एहसान हैं मुसलमानों से नफ़रत करने चलता तो सामने ग़ालिब आकर खड़े हो जाते अब आप ही बताइए किसी की कुछ चलती है उनके सामने? सिखों से नफ़रत करना चाहता तो गुरु न...

Prem | Krishna Mohan Jha 18.09.2025

 प्रेम | कृष्णमोहन झा एक माहिर चीते की तरह अपने पंजों को दबा कर आता है प्रेम और जबड़े में उठाकर तुम्हें ले जाता है अगले दिन या अगले के अगले दिन पंजों के निशान देखती है दुनिया लेकिन उसे तुम्हारे टपकते रक्त का पता नहीं चलता तुम्हें भी कहाँ पता चलता है कि जिस जबड़े में तुम फँस गए हो अचानक उसका नाम मृत्यु है या है प्रेम

Koshish Karne Walon Ki Haar Nahi Hoti | Sohanlal Dwivedi 17.09.2025

कोशिश करने वालों की हार नहीं होती | सोहनलाल द्विवेदी लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती कोशिश करने वालों की हार नहीं होती नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है मन का विश्वास रगों में साहस भरता है चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती कोशिश करने वालों की हार नहीं होती डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है जा जाकर खाली हाथ लौटकर आता है मिलते...

Vijayi Vishwa Tiranga Pyara | Shyamlal Gupt 'Paarshad' 16.09.2025

विजयी विश्व तिरंगा प्यारा | श्यामलाल गुप्त 'पार्षद' विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा। सदा शक्ति बरसाने वाला, प्रेम सुधा सरसाने वाला, वीरों को हरषाने वाला, मातृभूमि का तन-मन सारा। झंडा...। स्वतंत्रता के भीषण रण में, लखकर बढ़े जोश क्षण-क्षण में, कांपे शत्रु देखकर मन में, मिट जाए भय संकट सारा। झंडा...। इस झंडे के नीचे निर्भय, लें स्वराज्य यह अविचल निश्चय, बोलें भारत माता की जय, स्वतंत्र...

Sab Kuch Keh Lene Ke Baad | Sarveshwar Dayal Saxena 15.09.2025

सब कुछ कह लेने के बाद | सर्वेश्वरदयाल सक्सेना सब कुछ कह लेने के बाद कुछ ऐसा है जो रह जाता है, तुम उसको मत वाणी देना। वह छाया है मेरे पावन विश्वासों की, वह पूँजी है मेरे गूँगे अभ्यासों की, वह सारी रचना का क्रम है, वह जीवन का संचित श्रम है, बस उतना ही मैं हूँ, बस उतना ही मेरा आश्रय है, तुम उसको मत वाणी देना। वह पीड़ा है जो हमको, तुमको, सबको अपनाती है, सच्चाई है—अनजानों का भी हाथ पकड़ चलना सिखलाती है...

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