Dvijamani Gaura Das
Bhagavad Gita (Hindi)
Bhagavad Gita
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Dvijamani Gaura Das
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Mar 15, 2024
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Episodes
Krishna Ka Aashvaasan 15.03.2024 35:10
Assurance from Krishna
Bhagavad Gita 6.37-39 13.03.2024 59:19
Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 37 to 39 अध्याय 6 : ध्यानयोग श्लोक 6 . 37 अर्जुन उवाच अयतिः श्रद्धयोपेतो योगच्चलितमानसः | अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां कृष्ण गच्छति || ३७ || अर्जुनः उवाच – अर्जुन ने कहा; अयतिः – असफल योगी; श्रद्धया – श्रद्धा से; उपेतः – लगा हुआ, संलग्न; योगात् – योग से; चलित – विचलित; मानसः – मन वाला; अप्राप्य – प्राप्त न करके; योग-संसिद्धिम् – योग की सर्वोच्च सिद्ध...
Bhagavad Gita 6.4 22.07.2023 1:10:45
Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 4 अध्याय 6 : ध्यानयोग श्लोक 6 . 3 आरूरूक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते | योगारुढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते || ३ || आरुरुक्षोः – जिसने अभी योग प्रारम्भ किया है; मुनेः – मुनि की; योगम् – अष्टांगयोग पद्धति; कर्म – कर्म; कारणम् – साधन; उच्यते – कहलाता है; योग – अष्टांगयोग; आरुढस्य – प्राप्त होने वाले का; तस्य – उसका; एव – निश्चय हि; शमः – सम्पूर्ण भौतिक कार्यकलापों का त...
Bhagavad Gita 6.3 17.07.2023 1:10:23
Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 3 अध्याय 6 : ध्यानयोग श्लोक 6 . 3 आरूरूक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते | योगारुढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते || ३ || आरुरुक्षोः – जिसने अभी योग प्रारम्भ किया है; मुनेः – मुनि की; योगम् – अष्टांगयोग पद्धति; कर्म – कर्म; कारणम् – साधन; उच्यते – कहलाता है; योग – अष्टांगयोग; आरुढस्य – प्राप्त होने वाले का; तस्य – उसका; एव – निश्चय हि; शमः – सम्पूर्ण भौतिक कार्यकलापों का त...
Bhagavad Gita 6.2 17.07.2023 1:23:53
Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 2 अध्याय 6 : ध्यानयोग श्लोक 6 . 2 यं सन्न्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव | न ह्यसन्न्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्र्चन || २ || यम् –जिसको; संन्यासम् – संन्यास; इति – इस प्रकार; प्राहुः – कहते हैं; योगम् – परब्रह्म के साथ युक्त होना; तम् – उसे; विद्धि – जानो; पाण्डव – हे पाण्डुपुत्र; न – कभी नहीं; हि – निश्चय हि; असंन्यस्त – बिना त्यागे; सङ्कल्पः – आत्मतृप्ति की इच...
Bhagavad Gita 6.1 17.07.2023 1:15:15
Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 1 अध्याय 6 : ध्यानयोग श्लोक 6 . 1 श्रीभगवानुवाच अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः | स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः || १ || श्रीभगवान् उवाच – भगवान् ने कहा; अनाश्रितः – शरण ग्रहण किये बिना; कर्म-फलम् – कर्मफल की; कार्यम् – कर्तव्य; कर्म- कर्म; करोति – करता है; यः – जो; सः – वह; संन्यासी – संन्यासी; च – भी; योगी – योगी; च – भी; न – नहीं; निः – रहित; अग्न...
Bhagavad Gita 5.29 19.06.2023 1:03:14
Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 29 अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म श्लोक 5 . 29 भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्र्वरम् | सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति || २९ || भोक्तारम् – भोगने वाला, भोक्ता; यज्ञ – यज्ञ; तपसाम् – तपस्या का; सर्वलोक – सम्पूर्ण लोकों तथा उनके देवताओं का; महा-ईश्र्वरम् – परमेश्र्वर; सुहृदम् – उपकारी; सर्व – समस्त; भूतानाम् – जीवों का; ज्ञात्वा – इस प्रकार जानक...
Bhagavad Gita 5 .27-28 10.06.2023 1:03:18
Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 27-28 अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म श्लोक 5. 27-28 स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्र्चक्षुश्र्चैवान्तरे भ्रुवो: | प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ || २७ || यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः | विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः || २८ || स्पर्शान् – इन्द्रियविषयों यथा ध्वनि को; कृत्वा – करके; बहिः – बाहरी; बाह्यान् – अनावश्यक; चक्षुः – आँखें; च –...
Bhagavad Gita 5.26 03.06.2023 1:09:48
Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 26 अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म श्लोक 5 . 26 कामक्रोधविमुक्तानां यतीनां यतचेतसाम् | अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम् || २६ || काम – इच्छाओं; क्रोध – तथा क्रोध से; विमुक्तानाम् – मुक्त पुरुषों की; यतीनाम् – साधु पुरुषों की; यत-चेतसाम् – मन के ऊपर संयम रखने वालों की; अभितः – निकट भविष्य में आश्र्वस्त; ब्रह्म-निर्वाणम् – ब्रह्म में मुक्ति; वर्तते –...
Bhagavad Gita 5.25 30.05.2023 1:06:57
Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 25 अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म श्लोक 5.25 लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः | छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः || २५ || लभन्ते – प्राप्त करते हैं; ब्रह्म-निर्वाणम् – मुक्ति; ऋषयः – अन्तर से क्रियाशील रहने वाले; क्षीण-कल्मषाः – समस्त पापों से रहित; छिन्न – निवृत्त होकर; द्वैधाः – द्वैत से; यत-आत्मानः – आत्म-साक्षात्कार में निरत; सर्वभूत – समस्त...
Bhagavad Gita 5.24 22.05.2023 1:18:52
Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 24 अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म श्लोक 5 . 24 योSन्तःसुखोSन्तरारामस्तथान्तज्योर्तिरेव यः | स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोSधिगच्छति || २४ || यः – जो; अन्तः-सुखः – अन्तर में सुखी; अन्तः-आरामः – अन्तर में रमण करने वाला अन्तर्मुखी; तथा – और; अन्तः-ज्योतिः – भीतर-भीतर लक्ष्य करते हुए; एव – निश्चय हि; यः – जो कोई; सः – वह; योगी – योगी; ब्रह...
Bhagavad Gita 5.23 22.05.2023 1:13:14
Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 23 अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म श्लोक 5 . 23 शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् | कामक्रोधद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः || २३ || शक्नोति – समर्थ है; इह एव – इसी शरीर में; यः – जो; सोढुम् – सहन करने के लिए; प्राक् – पूर्व; शरीर – शरीर; विमोक्षनात् – त्याग करने से; काम – इच्छा; क्रोध – तथा क्रोध से; उद्भवम् – उत्पन्न; वेगम् – वेग को; सः – वह; युक्त...
Bhagavad Gita 5.22 22.05.2023 1:10:43
Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 22 अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म श्लोक 5 . 22 ये हि संस्पर्शजा भोगा दु:खयोनय एव ते | आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः || २२ || ये – जो; हि – निश्चय हि; संस्पर्श-जा – भौतिक इन्द्रियों के स्पर्श से उत्पन्न; भोगाः – भोग; दुःख – दुःख; योनयः – स्त्रोत, कारण; एव – निश्चय हि; ते – वे; आदि – प्रारम्भ; अन्तवन्त – अन्तकाले; कौन्तेय – हे कुन्तीपुत्र; न – कभी नही...
Bhagavad Gita 5.21 22.05.2023 1:14:33
Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 21 अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म श्लोक 5 . 21 बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् | स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्र्नुते || २१ || बाह्य-स्पर्शेषु – बाह्य इन्द्रिय सुख में; असक्त-आत्मा – अनासक्त पुरुष; विन्दति – भोग करता है; आत्मनि – आत्मा में; यत् – जो; सुखम् – सुख; सः – वह; ब्रह्म-योग – ब्रह्म में एकाग्रता द्वारा; युक्त-आत्मा – आत्म युक्त...
Bhagavad Gita 5.20 22.05.2023 53:55
Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 20 अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म श्लोक 5 . 20 न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् | स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः || २० || न – कभी नहीं; प्रह्रष्ये – हर्षित होता है; प्रियम् – प्रिय को; प्राप्य – प्राप्त करके; न – नहीं; उद्विजेत् – विचलित होता है; प्राप्य – प्राप्त करके; च – भी; अप्रियम् – अप्रिय को; स्थिर-बुद्धिः – आत्म...
Bhagavad Gita 5.12 17.01.2023 1:03:35
Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 12 अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म श्लोक 5 . 12 युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् | अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते || १२ || युक्तः – भक्ति में लगा हुआ; कर्म-फलम् – समस्त कर्मों के फल; त्यक्त्वा – त्यागकर; शान्तिम् – पूर्ण शान्ति को; आप्नोति – प्राप्त करता है; नैष्ठिकीम् – अचल; अयुक्तः – कृष्णभावना से रहित; काम-कारेण – कर्मफल को भोगने के...
Bhagavad Gita 5.11 12.01.2023 1:14:44
Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 11 अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म श्लोक 5 . 11 कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि | योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मश्रुद्धये || ११ || कायेन – शरीर से; मनसा – मन से; बद्धया – बुद्धि से; केवलैः – शुद्ध; इन्द्रियैः – इन्द्रियों से; अपि – भी; योगिनः – कृष्णभावनाभावित व्यक्ति; कर्म – कर्म; कुर्वन्ति – करते हैं; सङ्गं – आसक्ति; त्यक्त्वा – त्याग कर;...
Bhagavad Gita 5.8-9 27.12.2022 1:10:44
Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 8-9 अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म श्लोक 5 . 8-9 नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् | पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्र्नन्गच्छन्स्वपन्श्र्वसन् || ८ || प्रलपन्विसृजन्गृह्रन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि | इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् || ९ || न – नहीं; एव – निश्चय ही; किञ्चित् – कुछ भी; करोमि – करता हूँ; इति – इस प्रकार; युक्तः – दैवी चेतना में...
Bhagavad Gita 5.7 19.12.2022 1:13:02
Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 7 अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म श्लोक 5 . 7 योगयुक्तो विश्रुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः | सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते || ७ || योग-युक्तः – भक्ति में लगे हुए; विशुद्ध-आत्मा – शुद्ध आत्मा; विजित-आत्मा – आत्म-संयमी; जित-इन्द्रियः – इन्द्रियों को जितने वाला; सर्व-भूत – समस्त जीवों के प्रति; आत्म-भूत-आत्मा – दयालु; कुर्वन् अपि – कर्म में लगे र...
Bhagavad Gita 5.6 10.12.2022 1:05:59
Bhagavad Gita 5.6 in Hindi अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म श्लोक 5 . 6 संन्यासस्तु महाबाहो दु:खमाप्तुमयोगतः | योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति || ६ || संन्यासः – संन्यास आश्रम; तु – लेकिन; महाबाहो – हे बलिष्ठ भुजाओं वाले; दुःखम् – दुख; आप्तुम् – से प्रभावित; अयोगतः – भक्ति के बिना; योग-युक्तः – भक्ति में लगा हुआ; मुनिः – चिन्तक; ब्रह्म – परमेश्र्वर को; न चिरेण – शीघ्र ही; अधिगच्छति...
Bhagavad Gita 5.4-5 09.12.2022 58:57
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