Nayi Dhara Radio
Pratidin Ek Kavita
कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
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14 okt. 2026
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Afleveringen
Auratein Kaam Karti Hain | Shubha 06.07.2026 1:51
औरतें काम करती हैं । शुभा चित्रकारों, राजनीतिज्ञों, दार्शनिकों की दुनिया के बाहर मालिकों की दुनिया के बाहर पिताओं की दुनिया के बाहर औरतें बहुत से काम करती हैं वे बच्चे को बैल जैसा बलिष्ठ नौजवान बना देती हैं आटे को रोटी में कपड़े को पोशाक में और धागे को कपड़े में बदल देती हैं वे खंडहरों को घरों में बदल देती हैं और घरों को कुएँ में वे काले चूल्हे मिट्टी से चमका देती हैं और तमाम चीज़ें सँवार देती हैं...
Laut Te Nahi Pita | Kumar Divyanshu Shekhar 05.07.2026 2:00
लौटते नहीं पिता । कुमार दिव्यनशु शेखर नीम-अँधेरे घर से निकले पिता अँधेरे से पहले लौट आने की बात दोहरा के। लौटी एक ख़बर लौटा एक एम्बुलेस। नीम-अँधेरे निकले पिता फिर नहीं लौटे। स्मृतियाँ लौट आती हैं बार-बार लौट आती हैं हिदायतें लौटता है चेहरा आँखों को बाँह ढाँपे लौट आता है सावन लौटती है गंगा की धारा गाय के नाँद में चारा बारिश की नालियाँ-भुट्टों में बालियाँ तुलसी का पत्ता-बया का जत्था भोर की ओस बेठोस...
Hulchal | Anurag Tiwari 04.07.2026 2:47
हलचल। अनुराग तिवारी तेज़ कुछ भी हो सकता है किंतु सबसे तेज़ क्या है चीते की चाल बाज़ की नज़र नहीं। सबसे तेज़ हलचल होती है जैसे आज एक हलचल हुई, मेरी आहट से दीवार पर चिपकी छिपकली कोने में घुस गई। सबसे तेज़ हलचल शेयर बाज़ार में नहीं होती! एक्ज़िट पोल में भी हलचल तेज़ नहीं होती! भारत पाक मैच में दिन भर हलचल रहती है लेकिन सबसे तेज़ नहीं। सबसे तेज़ हलचल उस चेतना में होती है जिसे भ्रम था सदैव स्वतंत्र...
Bacha Rahe Humare Beech Ka Ishwar | Arun Kumar Singh 03.07.2026 3:01
बचा रहे हमारे बीच का ईश्वर । अरुण कुमार सिंह तुम जागती करवटों से लिखते हो कोई नाम सुबह चादर बूँद-बूँद निचोड़ती है अपनी पीड़ा बहेलिए ने मारा फिर कैद की एक चिड़िया जिसके पेट में मिली थी प्रेम कविता उसे क्रांति की कविता भी कहा गया। जिस रात ठंड को याद कर चादर ओढ़ी थी, गर्मी बहुत थी और हम पसीने से तरबतर। ये कैसी त्रासदी जी रहे हैं हम, पास बने रहने के लिए दूर जाना ज़रूरी जिन रातों में कुछ नहीं लिखा तु...
Chaton Par Ladkiyan | Alok Dhanwa 02.07.2026 1:53
छतों पर लड़कियाँ । आलोक धन्वा अब भी छतों पर आती हैं लड़कियाँ मेरी ज़िंदगी पर पड़ती हैं उनकी परछाइयाँ। गो कि लड़कियाँ आयी हैं उन लड़कों के लिए जो नीचे गलियों में ताश खेल रहे हैं नाले के ऊपर बनी सीढ़ियों पर और फ़ुटपाथ के खुले चायख़ानों की बेंचों पर चाय पी रहे हैं उस लड़के को घेर कर जो बहुत मीठा बजा रहा है माउथ ऑर्गन पर आवारा और श्री 420 की अमर धुनें। पत्रिकाओं की एक ज़मीन पर बिछी दुकान सामने खड़े-खड...
Hoke Mayoos Na Yun Sham Se Dhalte Rahiye | Kunwar Bechain 01.07.2026 2:00
हो के मायूस न यूँ शाम से ढलते रहिए। कुंवर बेचैन हो के मायूस न यूँ शाम से ढलते रहिए ज़िंदगी भोर है सूरज से निकलते रहिए एक ही ठाँव पे ठहरेंगे तो थक जाएँगे धीरे धीरे ही सही राह पे चलते रहिए आप को ऊँचे जो उठना है तो आँसू की तरह दिल से आँखों की तरफ़ हँस के उछलते रहिए शाम को गिरता है तो सुब्ह सँभल जाता है आप सूरज की तरह गिर के सँभलते रहिए प्यार से अच्छा नहीं कोई भी साँचा ऐ 'कुँवर' मोम बन के इसी साँचे म...
Stree Ki Neend | Nilesh Raghuvanshi 30.06.2026 1:33
स्त्री की नींद। नीलेश रघुवंशी एक छोटे से डाकखाने में वो स्त्री अपनी सीट पर इतनी उदास इतनी अकेली समय उसके आसपास नहीं होता ऊँघते और झपकियाँ लेते एक ही गलती को दोहराती है बार-बार कंप्यूटर पर काउंटर पर ठक-ठक की आवाज़ नींद और आलस से बाहर लाती है उसे वह लिफाफे की इबारत और भेजने वाले के हाथों के कंपन से होती है कोसों दूर नींद से भरी हुई इस स्त्री को देख दफ्तर के लोग पीटते हैं सिर कोसते हैं अपने बीच उसक...
Parantu | Kumar Ambuj 29.06.2026 2:33
परंतु । कुमार अम्बुज बुद्धिजीवी भी सड़क पर आ सकते हैं परंतु क्या करें यह सरकार ठीक नहीं है माना कि यह लोकतंत्र है और हम सुधारना चाहते हैं यह समाज परंतु इधर ठाकुरों के वोट बहुत हैं बेचारा ज़िला दंडाधिकारी भी करना तो चाहता है कुछ हस्तक्षेप परंतु उसके अधिकारों में भी निर्बल को ही दंडित कर सकना सीमित है कहते हैं कि इस देश में कई लोग हैं दयालु परंतु उनकी संपन्नता से ज़ाहिर हो जाती है उनकी क्रूरता यों त...
Kitab Ke Phool | Tanwir Sheikh 'Ilham' 28.06.2026 1:44
किताब के फूल । तनवीर शेख़ 'इल्हाम’ जब भी अपने प्रेमिका को देना गुलाब देना संग किताबें भी ताकी उन किताबों में उस गुलाब को संजो सके तुम्हारे दिए खतों को उस किताब के पन्नों में छुपा सके और आजीवन के लिए इस पल को अपने स्मृति में सहेज सके वो जब-जब उस किताब को पढ़े तो उस गुलाब की ख़ुश्बू तुम्हारे होने का साक्षी बनेंगी और उसे यादों में ले जाएंगी जो उसे पुलकित करेंगें ये किताबें तुम्हारे प्रेम को जीवित रखने...
Swaron Ka Samarpan | Shrikant Verma 27.06.2026 2:11
स्वरों का समर्पण । श्रीकांत वर्मा डबडब अँधेरे में, समय की नदी में अपने-अपने दिये सिरा दो; शायद कोई दिया क्षितिज तक जा, सूरज बन जाए!! हरसिंगार जैसे यदि चुए कहीं तारे, अगर कहीं शीश झुका बैठे हों मेड़ों पर पंथी पथहारे, अगर किसी घाटी भटकी हों छायाएँ, अगर किसी मस्तक पर जर्जर हों जीवन की त्रिपथगा ऋचाएँ; पीड़ा की यात्रा के ओ पूरब-यात्री! अपनी यह नन्हीं-सी आस्था तिरा दो शायद यह आस्था किसी प्रिय को तट तक ल...
Deewar | Saqi Farooqui 26.06.2026 1:18
दीवार । साक़ी फ़ारुक़ी रगों में नाच रहा है इक आतिशीं ज़हराब आतिशीं: अग्निमय ज़हराब: ज़हरीला पानी तिरी तलाश फ़क़त जिस्म का तक़ाज़ा है तिरी तलब के जहन्नम में जल रहा है बदन तलब: तलाश लहू पुकारता है क्या सुना नहीं तू ने कि मैं ने रूह की दीवार ही गिरा दी है
Ichhayein | Asteek Vajpeyi 25.06.2026 1:14
इच्छाएँ । आस्तीक वाजपेयी लकड़ी की अलमारी पर धूल, उनसे चिपकी दीवार पर टँगी इच्छाएँ। जैसे मैं अलमारी को, वैसे पूरी न हुई इच्छाएँ मुझे, झाड़ने आती हैं।
Zindagi Jab Bhi Teri Bazm Mein | Shahryar 24.06.2026 2:00
ज़िंदगी जब भी तिरी बज़्म में लाती है हमें । शहरयार ज़िंदगी जब भी तिरी बज़्म में लाती है हमें ये ज़मीं चाँद से बेहतर नज़र आती है हमें सुर्ख़ फूलों से महक उठती हैं दिल की राहें दिन ढले यूँ तिरी आवाज़ बुलाती है हमें याद तेरी कभी दस्तक कभी सरगोशी से रात के पिछले-पहर रोज़ जगाती है हमें हर मुलाक़ात का अंजाम जुदाई क्यूँ है अब तो हर वक़्त यही बात सताती है हमें
Milan | Bharat Bhushan Aggarwal 23.06.2026 1:33
मिलन । भारतभूषण अग्रवाल छलक कर आई न पलकों पर विगत पहचान, मुस्कुरा पाया न ओठों पर प्रणय का गान; ज्यों जुड़ीं आँखें, मुड़ीं तुम, चल पड़ा मैं मूक - इस मिलन से और भी पीड़ित हुए ये प्राण।
Diya | Om Prakash Valmiki 22.06.2026 1:55
दिया । ओमप्रकाश वाल्मीकि कच्चे घर में जलते दीए की रोशनी पर क़ब्ज़ा करके बैठ गए हो तुम। लौ के ठीक ऊपर काला धुआँ है। जो पर्त दर-पर्त कालिख पोत रहा है दीवार पर, नीचे गहरा अँधेरा है जिसमें दीपदान को पकड़े रहा हूँ मैं हज़ार-हज़ार वर्षों से अनवरत। मेरी पिंडलियों और भुजाओं के माँस से बनी हैं बाती हड्डियों को निचोड़कर निकाला गया है तेल। अँधेरे में, कालिख पुता मेरा जिस्म जिसे तुमने अपवित्र घोषित कर दिया त...
Mobile | Manglesh Dabral 21.06.2026 2:52
मोबाइल । मंगलेश डबराल वे गले में सोने की मोटी जंज़ीर पहनते हैं कमर में चौड़ी बेल्ट लगाते हैं और मोबाइलों पर बात करते हैं वे एक आधे अँधेरे और आधे उजले रेस्तराँ में घुसते हैं और खाने और पीने का ऑर्डर देते हैं वे आपस में जाम टकराते हैं और मोबाइलों पर बात करते हैं उनके मोबाइलों का रंग काला है या आबनूसी चाँदी जैसा या रहस्यमय नीला उनके आकार पतले छरहरे या सुडौल आकर्षक वे अपने नए मोबाइलों को अपनी नई प्रेम...
Ve Kaise Din The | Kirti Chowdhary 20.06.2026 2:21
वे कैसे दिन थे। कीर्ति चौधरी वे कैसे दिन थे जब चीज़ें भागती थीं और हम स्थिर थे जैसे ट्रेन के एक डिब्बे में बंद झाँकते हुए ओझल होते थे दृश्य पल के पल में— ...कौन थी यह तार पर बैठी हुई बुलबुल, गौरय्या या नीलकंठ? आसमान को छूता हुआ सवन का जोड़ा था? दूरी पर झिलमिल-झिलमिल करती नदिया थी? या रेती का भ्रम? कभी कम कभी ज़्यादा प्रश्न ही प्रश्न उठते थे हम विमूढ़ ठगे-से सुलझाते ही रहते और चीज़ें हो जाती थीं ओझल व...
Hey Meri Uttara | Ashutosh Sharma 19.06.2026 3:48
हे मेरी उत्तरा! । आशुतोष शर्मा मेरे शस्त्र की धारमयी रति को तुम्हारी भाषा के वैराग्य ने छीन लिया था हे मेरी उत्तरा! मेरे रण में जाने से पूर्व तुम्हारे ऑँचल का सतीत्व मुझे आगाह कर रहा था एक भयंकर सामूहिक पाप के प्रति मेरे मातुल की वंशी से एक मौन भाप की ध्वनि आ रही थी गांडीव अपने चरण मुझसे दूर हटा रहा था आधा सा लग रहा था पिता भीम का आश्वासन है मेरी उत्तरा! तुम्हारे बाल वैधव्यता से कुरुक्षेत्र के मं...
Ladna | Pawan Karan 18.06.2026 1:51
लड़ना। पवन करण मुझे उन सबकी ख़ूब याद आती है जिन्होंने मुझसे कई बार कहा कि मुझे लड़ना चाहिए मैं उन सबको कभी भूल नहीं पाता जो मुझसे हमेशा कहते रहे कि मुझे लड़ने से डरना नहीं चाहिए मैं उनसे माफ़ी माँगना चाहता हूँ जिन्होंने मुझसे कहा कि मैं ही नहीं लड़ूँगा तो फिर कौन लड़ेगा मैंने उनकी मानी होती तो मैं भी लड़कर हारा होता
Pahadi Baccha | Nirmala Putul 17.06.2026 1:53
पहाड़ी बच्चा । निर्मला पुतुल पहाड़ की गोद में पहाड़ के छोटे-छोटे टुकड़ों सा खेलता है पहाड़ी बच्चा लड़खड़ाते कदमों से पहाड़ चढ़ते रोपता है पहाड़ी धरती पर पाँव पहाड़ी माहौल में पहाड़ की तरह पूरी ताकत से होने के लिए पहाड़ी बच्चों के भीतर होता है पूरा का पूरा पहाड़, और पहाड़ों की गोद में होता है दौड़ता, भागता पहाड़ी बच्चा, पहाड़ी बच्चा देखता है पहाड़ के ऊपर से गुज़रता जहाज़ और पूछता है पिता से उस न...
Chupke Se Idhar Aa Jao | Shahryar 16.06.2026 1:27
चुपके से इधर आ जाओ । शहरयार दरवाज़ा-ए-जाँ से हो कर चुपके से इधर आ जाओ इस बर्फ़ भरी बोरी को पीछे की तरफ़ सरकाओ हर घाव पे बोसे छिड़को हर ज़ख़्म को तुम सहलाओ मैं तारों की इस शब को तक़्सीम करूँ यूँ सब को जागीर हो जैसे मेरी ये अर्ज़ न तुम ठुकराओ चुपके से इधर आ जाओ
Ibn-e-Insha | Swanand Kirkire 15.06.2026 2:24
इब्ने इंशा । स्वानंद किरकिरे हम इंशा जी के चेले हैं हम जोगी हैं बैरागी हैं हम प्रीत प्रेम के प्यासे हैं हम फ़ितरत से अनुरागी हैं इंशा की लय पर लिखते हैं कुछ उनकी तरह ही दिखते हैं इंशा की तरह हम प्रेमी हैं इंशा की तरह हम बाग़ी हैं है चाँद से अपना याराना है मन उसका आना-जाना जिस शै से हमारा दिल है लगा वो चाँद-चाँद कहलाती है हज़ारों रातें चाँद हज़ार हर शब है मोहब्बत का बाज़ार हम जीते हैं अजी ऐसे ही ह...
Shareef Log | Abdul Bismillah 14.06.2026 1:53
शरीफ़ लोग । अब्दुल बिस्मिल्लाह पत्थर के कोयले से जो धुआँ उठता है उसमें एक शहर महकता है सुना है उस शहर में शरीफ़ लोग रहते हैं लेकिन शराफ़त का धुएँ से क्या नाता है यह समझ में नहीं आता जैसे यह कि हर बार जंगल का राजा शेर ही क्यों हो जाता है या यह कि बच्चों की फ़सल मुरझाने क्यों लगी है कि बिना किसी बीमारी के मेरा जिस्म तलवार क्यों हो रहा है क्या यह बात शरीफ़ों के कर्त्तव्य से बाहर है कि वे धुएँ को ख़त्म...
Hatheli Ki Lakeerein | Madhav Kaushik 13.06.2026 2:01
हथेली की लकीरें । माधव कौशिक चले तो साथ थे लेकिन न जाने कैसे हुआ तुम्हारा हाथ किसी पिछले जन्म में शायद हमारे हाथ से छूटा तो छूटता ही गया हज़ारों साल से बिछड़ी हुई हैं दो आँखें हज़ारों साल में जाकर कभी मिलें तो मिलें कोई सुराग़ नहीं है इसीलिए शायद हथेलियों की लकीरों में ढूंँढता हूँ तुझे
Usne Kaha | Shiv Kumar Gandhi 12.06.2026 2:34
उसने कहा । शिव कुमार गांधी उसने कहा मुझसे ले चलो अपने शहर जो कहोगे वही करूँगा फिर पकड़ाई चाय जो गैस के चूल्हे पर बनी थी मैंने कहा मज़ाक़ में - जगह बदल लेते हैं हम और फिर वैसे भी शहर ख़ुद ही तो आ रहा है तुम तक उसने कहा वहाँ छत पर बैठना शाम में अच्छा लगता है रोशनियों बीच और फिर हवा तो आती ही है एक कारख़ाने में काम करता था उसका भतीजा जिसके साथ किसी छत पर बैठा था वह एक दिन इस शहर में रोशनियों बीच और उस...
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