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Pratidin Ek Kavita

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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

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14 ott 2026

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Episodi

Seedhi Si Baat | Pablo Neruda | Translation - Manglesh Dabral 25.08.2026

सीधी सी बात।  पाब्लो नेरुदा  (अनुवाद: मंगलेश डबराल)  शक्ति होती है मौन (पेड़ कहते हैं मुझसे) और गहराई भी (कहती हैं जड़ें) और पवित्रता भी (कहता है अन्न)   पेड़ ने कभी नहीं कहा: ‘मैं सबसे ऊंचा हूँ!’ जड़ ने कभी नहीं कहा: ‘मैं बेहद गहराई से आयी हूँ!’ और रोटी कभी नहीं बोली: 'दुनिया में क्या है मुझसे अच्छा'

Drishya Aur Bimb | Rajesh Joshi 24.08.2026

दृश्य और बिम्ब। राजेश जोशी  एक सिनेमा घर के सामने छूटी हुई जगह में एक नए मॉडल की चमचमाती कार एक विकलांग बच्चे को डरा रही है कार धीरे धीरे आगे सरक रही है और डरता, घबराता, गिरता पड़ता उल्टे पाँव दौड़ने की कोशिश कर रहा है बच्चा ड्राइवर मुस्कुरा रहा है और आसपास खड़े तमाशबीन अंदर ही अंदर डर रहे हैं तरस खा रहे हैं पर हँस रहे हैं। यह एक दृश्य है जो हमारे समय के बिम्ब में बदल रहा है ।

Gh Ra | Arun Kumar Singh 23.08.2026

घ र । अरुण कुमार सिंह   घर की याद में घर का स्पर्श है शब्दशः घ र घ र घ २ बुदबुदाते हुए शरीर का स्पर्श करता हूँ रेखाएं खोजती रहती हैं रास्ता घर का रेखाएं अंधी हैं घर नहीं दिखता आजकल बहुत चलता हूँ खड़ा रहता हूँ दूर तक देखता हूँ  घ र सबके सामने कपड़ों के भीतर घ र नहीं टटोल पाता कायर शब्द गले में मिलता है उबकी आते ही किराए के कमरे में भागता हूँ चुपके से ढूंढता हूँ  घ र  के बीच का हिस्सा

Dastak | Gulzar 22.08.2026

दस्तक । गुलज़ार सुब्ह सुब्ह इक ख़्वाब की दस्तक पर दरवाज़ा खोला'  देखा सरहद के उस पार से कुछ मेहमान आए हैं आँखों से मानूस थे सारे चेहरे सारे सुने सुनाए पाँव धोए, हाथ धुलाए आँगन में आसन लगवाए और तन्नूर पे मक्की के कुछ मोटे मोटे रोट पकाए पोटली में मेहमान मिरे पिछले सालों की फ़सलों का गुड़ लाए थे आँख खुली तो देखा घर में कोई नहीं था हाथ लगा कर देखा तो तन्नूर अभी तक बुझा नहीं था और होंटों पर मीठे गुड़ का...

Shraadh | Ashutosh Sharma 21.08.2026

श्राद्ध - आशुतोष शर्मा  किसी चींटी को बचपन में कुचला था केंचुए को बीच से काट दिया था मेरा जूता छत से मारे थे चप्पल किसी भिखारी को किसी को कुलटा तो किसी को कहा वेश्या झूलों पे बन बैठा कभी तानाशाह उपेक्षकों की सामूहिकता में रहा कभी शामिल बहनों के बस्तों में भर दी छिपकलियां मारे थे कंकड़ कभी मां के एड़ी पर पत्थर से उजाड़ दिया किसी बुलबुल का आशियाना अग्नि नहीं जला सकता मेरा अधर्म गंगाजल को सोख जाएगा म...

Ek Khwaish | Amrita Sinha 20.08.2026

एक ख्वाहिश । अमृता सिन्हा कभी कभी कुछ दूरियाँ अच्छी होती हैं, जैसे आँखों से काजल की दूरी कढ़ाही से करछी की दूरी लेखक की कलम से दूरी रचनाकार की रचनात्मकता से दूरी प्रेमी की प्रेम से दूरी अंतर्मन की गहराई में उतरने की ख़ातिर बाहरी दुनियाँ से दूरी, सोंशल मीडिया से अवकाश बाहरी कोलाहल से अलग-थलग बनायी जाये कुछ दिनों की दूरी रहा जाए एकदम ख़ामोश बनाया जाये चुप्पियों का पहाड़ बिताया जाये कुछ दिन, मन की चं...

Vismay Tarbooz Ki Tarah | Alok Dhanwa 19.08.2026

विस्मय तरबूज की तरह ।  आलोकधन्वा तब वह ज़्यादा बड़ा दिखाई देने लगा जब मैं उसके किनारों से वापस आया वे स्त्रियाँ अब अधिक दिखाई देती हैं जिन्होंने बचपन में मुझे चूमा वे जानवर जो सुदूर धूप में मेरे साथ खेलते थे और उन्हें इंतज़ार करना नहीं आता था और वे पहले छाते बादल जिनसे बहुत क़रीब थे समुद्र मुझे ले चला उस दुपहर में जब पुकारना भी नहीं आता था जब रोना ही पुकारना था जहाँ विस्मय तरबूज़ की तरह जितना हरा...

Indhan | Gulzar 18.08.2026

ईंधन ।  गुलज़ार छोटे थे, माँ उपले थापा करती थी हम उपलों पर शक्लें गूँधा करते थे आँख लगाकर - कान बनाकर नाक सजाकर - पगड़ी वाला, टोपी वाला मेरा उपला - तेरा उपला - अपने-अपने जाने-पहचाने नामों से उपले थापा करते थे हँसता-खेलता सूरज रोज़ सवेरे आकर गोबर के उपलों पे खेला करता था रात को आँगन में जब चूल्हा जलता था हम सारे चूल्हा घेर के बैठे रहते थे किस उपले की बारी आयी किसका उपला राख हुआ वो पंडित था - इक मुन...

Kitabein | Tanwir Sheikh Ilham 17.08.2026

 किताबें।  तनवीर शेख़ 'इल्हाम’  किताबें पढ़ा करों ये तार्किक बनाती हैं तुम्हें और बनाती हैं मार्मिक तुम्हारे विचारों को ताकि तुम अपने अधिकार को अपने कर्तव्य को समझ सको, परख सको किताबें पढ़ा करों क्योंकि ये तुम्हें साँचे में ढालकर तुम्हारे व्यक्तित्व को और अद्वितीय बनाती है ठीक उस कुम्हार की तरह जो खुरदुरी मिट्टी को साँचकर उसका मोल बढ़ाते हैं तो तुम पढ़ो किताबें जितनी हो सके पढ़ो  ताकि तुम ख़ुद को जा...

Upeksha | Subhadra Kumari Chauhan 16.08.2026

उपेक्षा ।  सुभद्राकुमारी चौहान इस तरह उपेक्षा मेरी, क्यों करते हो मतवाले! आशा के कितने अंकुर, मैंने हैं उर में पाले॥ विश्वास-वारि से उनको, मैंने है सींच बढ़ाए। निर्मल निकुंज में मन के, रहती हूँ सदा छिपाए॥ मेरी साँसों की लू से कुछ आँच न उनमें आए। मेरे अंतर की ज्वाला उनको न कभी झुलसाए॥ कितने प्रयत्न से उनको, मैं हृदय-नीड़ में अपने बढ़ते लख खुश होती थी, देखा करती थी सपने॥ इस भांति उपेक्षा मेरी करके म...

Mujhe Teen Do Shabd | Agyeya 15.08.2026

मुझे तीन दो शब्द । अज्ञेय मुझे तीन दो शब्द कि मैं कविता कह पाऊँ। एक शब्द वह जो न कभी जिह्वा पर लाऊँ, और दूसरा : जिसे कह सकूँ किंतु दर्द मेरे से जो ओछा पड़ता हो। और तीसरा : खरा धातु, पर जिसको पाकर पूछूँ— क्या न बिना इसके भी काम चलेगा? और मौन रह जाऊँ। मुझे तीन दो शब्द कि मैं कविता कह पाऊँ।

Gawahi | Adnan Kafeel Darwesh 14.08.2026

गवाही।  अदनान कफ़ील दरवेश  क़ब्र में मेरी बगल में ही लिटाना मेरी कविता को भी जो मेरी दोस्त रही मेरे उन यातना के क्षणों में भी इस तरह हम एक साथ उठेंगे महशर के रोज़ शुभ दिन बोलते हुए एक दूसरे को उसे लिटाना ज़रूर क्योंकि उसे सबसे बड़ी अदालत में उस दिन मेरे ख़िलाफ़ गवाही देनी है।

Kashi Mere Kashi | Aishwarya Tiwari 13.08.2026

काशी मेरे काशी । ऐश्वर्या तिवारी मैं निरे शुन्य मैं बैठी  वो जब आया था तो शुन्य हुए आया था हर बार कहता था - मैं कुछ नहीं, कोई नहीं मैं। हम मिलते बैठते कई घंटों फिर चले जाते, एक दिन मिलते हुए मैंने कहा - साड़ी और देखा उसे होते हुए बुनकर जोड़-तोड़ कर ताना-बाना बुनने लगा है साड़ी परखने आ गया है उसे धागों की बुनावट का सलीका। मैंने कहा सीपियों वाले झुमके उसे देखा समन्दर किनारे बढ़ गई है उसकी यात्रा थोड...

Parakhna Mat | Bashir Badr 12.08.2026

परखना मत । बशीर बद्र परखना मत परखने में कोई अपना नहीं रहता किसी भी आइने में देर तक चेहरा नहीं रहता बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना जहाँ दरिया समुंदर से मिला दरिया नहीं रहता हज़ारों शेर मेरे सो गए काग़ज़ की क़ब्रों में अजब माँ हूँ कोई बच्चा मिरा ज़िंदा नहीं रहता मोहब्बत एक ख़ुशबू है हमेशा साथ चलती है कोई इंसान तन्हाई में भी तन्हा नहीं रहता तुम्हारा शहर तो बिलकुल नए अंदाज़ वाला है हमारे शहर...

Kalam | Vishwanath Prasad Tiwari 11.08.2026

 कलम। विश्वनाथ प्रसाद तिवारी  कलम उठाओ इसे इसमें छिपा है देवताओं-अप्सराओं का गान अबोध शिशुओं की मुस्कान यह भर सकती है फूलों में रंग पानी में आग और आग में थोड़ी-सी रोशनी फेंको इसे तौलकर शिलाखंड से फूट पड़ेंगे निर्झर  बह जाएँगे ब्रह्मास्त्र यह दे सकती है अनाम को नाम अरूप को रूप सन्नाटे को शब्द मिटा सकती है जंगल और समुद्र की लिपि बना सकती है धरती का व्याकरण अगर तुम्हारी गफलत से यह पड़ी रह गई अँधेरे म...

Nayi Nayi Aankhein Hon To | Nida Fazli 10.08.2026

नई नई आँखें हों तो ।  निदा फ़ाज़ली नई नई आँखें हों तो हर मंज़र अच्छा लगता है कुछ दिन शहर में घूमे लेकिन अब घर अच्छा लगता है मिलने-जुलने वालों में तो सब ही अपने जैसे हैं जिस से अब तक मिले नहीं वो अक्सर अच्छा लगता है मेरे आँगन में आए या तेरे सर पर चोट लगे सन्नाटों में बोलने वाला पत्थर अच्छा लगता है चाहत हो या पूजा सब के अपने अपने साँचे हैं जो मूरत में ढल जाए वो पैकर अच्छा लगता है हम ने भी सो कर देखा ह...

Dushwari | Javed Akhtar 09.08.2026

दुश्वारी । जावेद अख़्तर मैं भूल जाऊँ तुम्हें अब यही मुनासिब है मगर भुलाना भी चाहूँ तो किस तरह भूलूँ कि तुम तो फिर भी हक़ीक़त हो कोई ख़्वाब नहीं यहाँ तो दिल का ये आलम है क्या कहूँ कम-बख़्त भुला न पाया वो सिलसिला जो था ही नहीं वो इक ख़याल जो आवाज़ तक गया ही नहीं वो एक बात जो मैं कह नहीं सका तुम से वो एक रब्त जो हम में कभी रहा ही नहीं मुझे है याद वो सब जो कभी हुआ ही नहीं

Hai Daiyya | Nilesh Raghuvanshi 08.08.2026

हाय दैया । नीलेश रघुवंशी  एक सुंदर ड्राइंगरूम के एक कोने में खड़ी है एक स्त्री मुस्कुराती-सी कजरारी आँखों के संग भौंह को टेढ़ा किए माथे पर लाल टीका उसके नीचे और ऊपर चार छोटी- छोटी बिंदी ओंठों पर लाली ठोड़ी पर सात टिकुली काली धोती के संग चटक हरे रंग का पोलका हाथ में गिलट के कड़े और बाजुबंद गले में हँसली बजट्टी माथे पर गिलट की बेड़ी लगाए कमर में करधौनी और पाँव में आयलें संग में आँवड़ा कड़ा भी स्त्री...

Prem Ka Sparsh | Rabindranath Tagore | Translation - Hazari Prasad Dwivedi 07.08.2026

प्रेम का स्पर्श । रवींद्रनाथ टैगोर अनुवाद : हजारीप्रसाद द्विवेदी हे भुवन, मैंने जब तक तुम्हें प्यार नहीं किया था तब तक तुम्हारा प्रकाश खोज-खोजकर (भी) अपना सारा धन नहीं पा सका था! उस समय तक समूचा आकाश हाथ में अपना दीप लिए हर सूनेपन में बाट जोह रहा था। मेरा प्रेम गान गाता हुआ आया, (फिर न जाने) क्या कानाफूसी हुई, उसने डाल दी तुम्हारे गले में अपने गले की माला! मुग्ध नयनों से हँसकर उसने तुम्हें चुपचाप...

Ameeri Rekha | Kumar Ambuj 06.08.2026

अमीरी रेखा -  कुमार अम्बुज मनुष्य होने की परंपरा है कि वह किसी कंधे पर सिर रख देता है और अपनी पीठ पर टिकने देता है कोई दूसरी पीठ ऐसा होता आया है, बावजूद इसके कि कई चीज़ें इस बात को हमेशा कठिन बनाती रही हैं और कई बार आदमी होने की शुरुआत एक आधी-अधूरी दीवार हो जाने से, पतंगा, ग्वारपाठा या एक पोखर बन जाने से भी होती है या जब सब रफ़्तार में हों तब पीछे छूट जाना भी एक शुरुआत है बशर्ते मनुष्यता में तुम्ह...

Hum Panchhi Unmukt Gagan Ke | Shivmangal Singh Suman 05.08.2026

हम पंछी उन्मुक्त गगन के ।  शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ हम पंछी उन्‍मुक्‍त गगन के पिंजरबद्ध न गा पाएँगे, कनक-तीलियों से टकराकर पुलकित पंख टूट जाऍंगे। हम बहता जल पीनेवाले मर जाएँगे भूखे-प्‍यासे, कहीं भली है कटुक निबोरी कनक-कटोरी की मैदा से, स्‍वर्ण-श्रृंखला के बंधन में अपनी गति, उड़ान सब भूले, बस सपनों में देख रहे हैं तरू की फुनगी पर के झूले। ऐसे थे अरमान कि उड़ते नील गगन की सीमा पाने, लाल किरण-सी चोंचखोल च...

Ma | Padma Sachdeva 04.08.2026

माँ । पद्मा सचदेव बुलाने के लिए कई नाम हैं जिसे पुकारो बोलता भी है पर एक नाम ऐसा है जिसे पुकारो तो सब चौकन्ने हो जाते हैं सभी सोचते हैं ये नाम मेरे लिए तो नहीं माँ... माँ... माँ... ओ लड़के ओ बेटा वह मेरी बेटी कहाँ मर गई हो माँ माँ माँ कहता जब कोई बच्चा गली में से निकलता है सड़क पार करता है या पहाड़ चढ़ता है पहाड़ उतरकर आँगन में आ खड़ा होता है तब माँ एकदम सुबह के गुलाब की तरह खिल उठती है दोनों दरवाज़...

Dono Oar Prem Palta Hai | Maithilisharan Gupt 03.08.2026

दोनों ओर प्रेम पलता है।  मैथिलीशरण गुप्त  दोनों ओर प्रेम पलता है। सखि, पतंग भी जलता है हां! दीपक भी जलता है। सीस हिलाकर दीपक कहता -  ’बन्धु वृथा ही तू क्यों दहता?’ पर पतंग पड़ कर ही रहता कितनी विह्वलता है दोनों ओर प्रेम पलता है। बचकर हाय! पतंग मरे क्या? प्रणय छोड़ कर प्राण धरे क्या? जले नहीं तो मरा करे क्या? क्या यह असफ़लता है?  दोनों ओर प्रेम पलता है। कहता है पतंग मन मारे-  ’तुम महान, मैं लघु, पर...

Lipi | Hemant Deolekar 02.08.2026

लिपि । हेमंत देवलेकर  उन्होंने कहा -" लिखो" मैं मोबाइल पर टाइप करने लगा यह देख वे भड़क उठे -"हमने कहा, लिखो" मेरी याददाश्त पर गहरी चोट पड़ी और मोबाइल हाथ से गिर गया वे पूर्वज थे खिन्न होकर लौट गए मैने गिरे हए मोबाइल को देखा : मेरे हाथ से समूची लिपि फिसल गई थी

Barsaat Mubarak Ho | Meena Kumari 'Naaz' 01.08.2026

बरसात मुबारक हो। मीना कुमारी नाज़ बरसात मुबारक हो ये साथ मुबारक हो हर दिन रहे सलोना हर रात मुबारक हो सँवलाई हुई शामों को हर सुब्ह मुबारक हो हिचकी हो या सिसकी हो हर नग़्मा मुबारक हो बरसात मुबारक हो बरसात मुबारक हो

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