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Episodes
Idhar Se Abr Uth Kar | Meer Taqi Meer 22.05.2026 1:58
इधर से अब्र उठ कर जो गया है । मीर तक़ी मीरइधर से अब्र उठ कर जो गया हैहमारी ख़ाक पर भी रो गया हैमसाइब और थे पर दिल का जानाअजब इक सानेहा सा हो गया हैमुक़ामिर-ख़ाना-ए-आफ़ाक़ वो हैकि जो आया है याँ कुछ खो गया हैकुछ आओ ज़ुल्फ़ के कूचे में दरपेशमिज़ाज अपना उधर अब तो गया हैसिरहाने 'मीर' के कोई न बोलोअभी टुक रोते रोते सो गया है
Wahi Baat | Pratibha Katiyar 21.05.2026 2:09
वही बात । प्रतिभा कटियारउनके पास थीं बंदूकेंउन्हें बस कंधों की तलाश थी,उन्हें बस सीने चाहिए थेउनके हाथों में तलवारें थीं,उनके पास चक्रव्यूह थे बहुत सारेवे तलाश रहे थे मासूम अभिमन्युउनके पास थे क्रूर ठहाकेऔर वीभत्स हँसीवे तलाश रहे थे द्रौपदी।उन्होंने हमें ही चुना हमें मारने के लिएहमारे सीने परहमसे ही चलवाई तलवारहमें ही खड़ा किया ख़ुदहमारे ही विरुद्धऔर उनकी विजय हुई हम पर।उन्होंने बस इतना कहाऔरतें ह...
Parvat Pradesh Mein Pavas | Sumitranandan Pant 20.05.2026 2:24
पर्वत प्रदेश में पावस । सुमित्रानंदन पंतपावस ऋतु थी, पर्वत प्रदेश,पल-पल परिवर्तित प्रकृति-वेश।मेखलाकार पर्वत अपारअपने सहस्र दृग-सुमन फाड़,अवलोक रहा है बार-बारनीचे जल में निज महाकार,- जिसके चरणों में पला तालदर्पण-सा फैला है विशाल!गिरी का गौरव गाकर झर-झरमद में नस-नस उत्तेजित करमोती की लड़ियों-से सुंदरझरते हैं झाग भरे निर्झर!गिरिवर के उर से उठ-उठ करउच्चाकांक्षाओं से तरुवरहै झाँक रहे नीरव नभ परअनिमेष, अ...
Adivasi Stree Ki Kavita | Sushma Kumari 19.05.2026 2:28
आदिवासी स्त्री की कविता । सुषमा कुमारी एक आदिवासी ख्त्रीजब लिखती है कविता,तो कविता के देवता कहते हैं -'उसकी कविता से 'भाषा' गायब है!जिनके हाथों में किताबें तकनहीं पहुँचतीकविता लिखते हुएभला वह स्री 'भाषा' तककैसे पहुँचती ?भाषा के 'भ' से पहलेआता है अस्मिता का 'अ''अ' को जाने बिनास्री 'भाषा' तक कैसे पहुँचती?'अ' से 'भ' तक की यात्रा मेंपहले वह लिखना चाहती है 'अ' से अभिव्यक्तिऔर 'आ' से आज़ादी!'अ' और 'आ' त...
Peeli Titli | Jyotsna Milan 18.05.2026 1:22
पीली तितली। ज्योत्स्ना मिलनउड़ रही थीछोटी-सीपीली तितलीउड़े जा रही थीजैसे बैठना भूल चुकी होया उड़ना ही उड़नाजानती होपौधे से पौधे तकउड़ती जातीफूल की उम्मीद मेंकि फूलों के बीचपहचानी न जाएतितली की तरहइस क़दर उड़ रही थीकि अपने उड़ने मेंफूल हुई जा रही थी तितली।
Chandroday Humne Kabse Nahi Dekha | Gyanendrapati 17.05.2026 2:30
चन्द्रोदय हमने कब से नहीं देखा । ज्ञानेन्द्रपति चन्द्रोदय!हमने कब से नहीं देखाप्रायः उस समयटी.वी. के किसी-न-किसी चैनल परकोई-न-कोई नैनसुख कार्यक्रम चलता रहता हैकोई-न-कोई चन्द्रमुखीउजागर कर रही होती हैहमारे जीवन का अँधेराऔर कभी जबदेर से घर लौटतेकिसी क्षितिजवान सड़क के माथ पर औचकदिखा कभी नवोदित चाँद, देखताअनदेखी की हमनेआँख मिलाने से डरेसड़क पकड़े चलते गए आदतनकि आँखें मिलने पर पूछना होगा हाल-चालअफसोस...
Abhinay | Manglesh Dabral 16.05.2026 3:04
अभिनय । मंगलेश डबरालएक गहन आत्मविश्वास से भरकरसुबह निकल पड़ता हूँ घर सेताकि सारा दिन आश्वस्त रह सकूँएक आदमी से मिलते हुए मुस्कराता हूँवह एकाएक देख लेता है मेरी उदासीएक से तपाक-से हाथ मिलाता हूँवह जान जाता है मैं भीतर से हूँ अशांतएक दोस्त के सामने ख़ामोश बैठ जाता हूँवह कहता है तुम दुबले बीमार क्यों दिखते होजिन्होंने मुझे कभी घर में नहीं देखावे कहते हैं अरे आप टी.वी. पर दिखे थे एक दिनबाज़ारों में घू...
Baat Yah Nahi Hai | Teji Grover 15.05.2026 1:48
बात यह नहीं है । तेजी ग्रोवरबात यह नहीं है कि कहीं भी मन नहीं लगता, कहीं भी जड़ महसूस नहीं होती, कहीं भी अकेलापन साथ नहीं छोड़ता।बात ठीक इससे उलट है। हर जगह मन लगता है। हर जगह जड़ महसूस होती है। हर जगह सान्निध्य है, स्नेह है, साथ है। आत्मीयता से भरे हुए नक्षत्र पर किससे कहूँ कि ऐसा है... कौन मेरी बात का विश्वास करेगा?
Haan Dost | Agyeya 14.05.2026 2:45
हाँ, दोस्त। अज्ञेयहाँ, दोस्त,तुम ने पहाड़ की पगडंडी चुनीऔर मैं ने सागर की लहर।पहाड़ की पगडंडी :सँकरी, पथरीली,ढाँटी,पर स्पष्ट लक्ष्य की ओर जाती हुई :मातबर और भरोसेदारपगडंडी जो एक दिन निश्चय तुम्हेंपड़ाव पर पहुँचा देगी।सागर की लहरविशाल, चिकनी,सपाटपर बिछलती फिसलती हमेशा अज्ञात अदृश्य को टेरती हुई,बेभरोस और आवारा...लहर जो न कभी कहीं पहुँचेगी न पहुँचाएगीन पहुँचने देगी, जो डुबोएगी नहीं तो वहींलौटा लाएगी...
Seedhi | Padmaja Sharma 13.05.2026 1:40
सीढ़ी । पद्मजा शर्माजो किसी कोसीढ़ी बनाकरऊपर चढ़ रहे हैंवह मुझसे कह रहे हैंतुम कमज़ोर होकब से खड़ी होबीच रास्तेहट जाओवे नहीं जानतेकि सीढ़ी के हटते हीवे गिरेंगेमैंफिर भीखड़ी रहूँगी
Lekar Seedha Naara | Shamsher Bahadur Singh 12.05.2026 1:35
लेकर सीधा नारा। शमशेर बहादुर सिंहलेकर सीधा नाराकौन पुकाराअंतिम आशाओं की संध्याओं से?पलकें डूबी ही-सी थीं -पर अभी नहीं;कोई सुनता-सा था मुझेकहीं;फिर किसने यह, सातों सागर के पारएकाकीपन से ही, मानो -हार,एकाकी उठ मुझे पुकाराकई बार?मैं समाज तो नहीं; न मैं कुलजीवन;कण-समूह में हूँ मैं केवलएक कण।- कौन सहारा!मेरा कौन सहारा!
Pasand Ki Jane Wali Stree | Savita Singh 11.05.2026 1:48
पसन्द की जाने वाली स्त्री । सविता सिंह प्रेम करती हुई स्त्री ही अब भी पसन्द की जाती हैछल में भी एक अजीब जादू हैजो झूठ में नहींकितना मिलता-जुलता है झूठ भी सच से आख़िरमृत्यु ज्यों प्रेम सेअन्त में सच ही बचाता है हर स्त्री कोलेकिन तब तक वह तब्दील हो चुका होता हैझूठ में कुछ इस तरहकि वह उस के किसी काम का नहीं रहताछल रहता है ज्यों का त्यों तब भीअपने काम करताप्रेम और मृत्यु का रथ हाँकता
Kis Jane Kis Ki Pyas Bujhane Kidhar Gayin | Kaifi Azmi 10.05.2026 2:00
क्या जाने किस की प्यास बुझाने किधर गईं । कैफ़ी आज़मीक्या जाने किस की प्यास बुझाने किधर गईंइस सर पे झूम के जो घटाएँ गुज़र गईंदीवाना पूछता है ये लहरों से बार बारकुछ बस्तियाँ यहाँ थीं बताओ किधर गईंअब जिस तरफ़ से चाहे गुज़र जाए कारवाँवीरानियाँ तो सब मिरे दिल में उतर गईंपैमाना टूटने का कोई ग़म नहीं मुझेग़म है तो ये कि चाँदनी रातें बिखर गईंपाया भी उन को खो भी दिया चुप भी हो रहेइक मुख़्तसर सी रात में सदिया...
Choolha | Tanwir Sheikh 'Ilham' 09.05.2026 3:03
चूल्हा । तनवीर शेख़ 'इल्हाम’ चूल्हे ने संभालापितृसत्ता कोऔर बनाएं रखा अपना वर्चस्वये चूल्हास्त्रियों के ऊपरऐसे स्थापित किया गयाजो पुरुषों के रौब कोआजीवन कायम रख सकेपितृसत्ता नेचूल्हे के सहारे सेस्त्रियों के सत्य को, उनके सपने को और उनके व्यक्तित्व कोहमेशा जलाए रखाकितनी ही स्त्रियों को ब्याहा गयासिर्फ चूल्हे में झोंकने कोमानो ये चूल्हापकवान बनाने के लिएआविष्कार नहीं बल्किपुरुषों के अधिकार कोउनके व...
Wo Ladke Kaun They | Gautam Kumar 08.05.2026 1:53
वो लड़के कौन थे | गौतम कुमारख़ामोशी तोड़ोक्यों देखते होअगली बारिश की राहक्यों कर रहे होअपनी मिट्टी से उठने वाली सौंधी ख़ुशबू का इंतज़ारअब कौन-सी फ़सल हैजिसकी फ़िक्र तुम्हें सता रही हैखेतों तुम किसका पेट भरना चाहते होकिसे भूखा रखना चाहते होखेतों तुम नहीं शरीक-ए-जुर्मपर सनद रहेतुम्हारी मिट्टीआबाद फ़सलों के पस-ए-मंज़र मेंबर्बाद नस्लों के ख़ून से सनी हैतुम बोलोतुम तो जानते होवो लड़की कौन थीवो लड़के कौन थे
Roop Naran Ke Tat Par | Rabindranath Tagore | Translation - Hans Kumar Tiwari 07.05.2026 1:28
रूप-नारान के तट पर । रवींद्रनाथ टैगोरअनुवाद : हंसकुमार तिवारीरूप-नारान के तट परजाग उठा मैं।जाना, यह जगत्सपना नहीं है।लहू के अक्षरों में लिखाअपना रूप देखा;प्रत्येक आघातप्रत्येक वेदना मेंअपने को पहचाना।सत्य कठिन हैकठिन को मैंने प्यार किया—वह कभी छलता नहीं।मरने तक के दुःख का तप है यह जीवन -सत्य के दारुण मूल्य को पाने के लिएमृत्यु में सारा ऋण चुका देना।
Dharti | Sharad Bilore 06.05.2026 1:36
धरती । शरद बिलौरेदो बरस की नीलूआसमान तकती हैपापा से कहती हैपापा मुझे आसमान चाहिए।पापा ने कभी आसमान जैसी चीज़अपने बाप से नहीं माँगीएक बार तारे ज़रूर माँगे थे।पापा डरे हुए हैं सोचते हैंमैं धरती पर खेल कर बड़ा हुआक्या नीलू आसमान ताक कर बड़ी होगीऔर यहकि मैंने अपने बाप से औरनीलू ने मुझसेधरती क्यों नहीं माँगी।क्या सचमुच धरतीबच्चों के खेलने की चीज़ नहीं!
Ahimsa | Kanhaiyalal Sethia 05.05.2026 1:15
अहिंसा । कन्हैयालाल सेठिया नहीं हैहिंसा कानकारात्मक बोधअहिंसाएक मौलिक शोधचिंत्य है जिसमेंदृष्टि से परेदर्शनजीवन से परेआत्माजिसकीमीमांसाअनेकांतभूमिकासर्वोदय!
Unghta Santri | Vishwanath Prasad Tiwari 04.05.2026 2:01
ऊँघता संतरी। विश्वनाथ प्रसाद तिवारीउसे मत जगाओवह सपने देख रहा हैबच्चे लौट रहे हैं उसके सपने मेंपक्षी चहचहा रहे हैं उसके सपने मेंबदल रहे हैं इंद्रधनुष के रंग उसके सपने मेंझर रहे हैं गुलमुहर के फूल उसके सपने मेंउसे मत जगाओउसकी नींद पर पाबंदी हैअभी एक झपकी में वह लूट लेगा ब्रहमांडअभी एक हलका-सा पदचापचकनाचूर कर देगा उसका शीशमहलदेवदूत की तरह सो रहा है वहउसे मत जगाओअभी वह उछलकर खड़ा हो जाएगासीधे तने वृ...
Daant Ki Khidki | Nilesh Raghuvanshi 03.05.2026 2:07
दाँत की खिड़की। नीलेश रघुवंशीबारिश से पहले बादलों की गड़गड़ाहटबिजली के चमकने-सा मुस्कराता चेहरा सहेली कातिस पर "पहचाना-पहचाना' भरी बारिश में छपाक-छपाक की आवाज़हा याद आया अपन एक बार..कहते सिर खुजलानापीठ पर पड़ती धौल तुम क्यों पहचानोगी भैयाझमाझम बारिश में बिना छतरी के भीग-भीग जानागलबहियाँ डाल सहेली करो याद करो याद की रट लगाएघूमते हैं आँखों के आगे हजारों हज़ार चेहरेअँटता नहीं जिनमें चेहरा सहेली काचमक...
Kavita Kavi Ke Dimaag Mein | Aishwarya Tiwari 02.05.2026 1:41
कविता कवि के दिमाग में । ऐश्वर्या तिवारीकविता कवि के दिमाग में पलती है और जन्म लेती है कलम की कोख सेबड़ी होती है भाषाओं के मेले में दोस्ती करती है, तेज़ तर्रार मन को पसीज और झंझोड़ देने वाले शब्दों सेकभी आईना देखती है तो कभी आईना दिखलाती और एक दिन पूर्ण होकर ब्याह रचा लेती है अपने प्रियतम कागज से जो था बरसों से उसकी ताक में कविता कवि के दिमाग में
Bachhe Kaam Par Ja Rahe Hain | Rajesh Joshi 01.05.2026 2:21
बच्चे काम पर जा रहे हैं। राजेश जोशी कुहरे से ढँकी सड़क पर बच्चे काम पर जा रहे हैंसुबह-सुबहबच्चे काम पर जा रहे हैंहमारे समय की सबसे भयानक पंक्ति है यहभयानक है इसे विवरण की तरह लिखा जानालिखा जाना चाहिए इसे सवाल की तरहकाम पर क्यों जा रहे हैं बच्चे?क्या अंतरिक्ष में गिर गई हैं सारी गेंदेंक्या दीमकों ने खा लिया हैसारी रंग-बिरंगी किताबों कोक्या काले पहाड़ के नीचे दब गए हैं सारे खिलौनेक्या किसी भूकंप में...
Baatein | Navin Sagar 30.04.2026 1:16
बातें । नवीन सागरबातें करते हुएबातों के परे हम एक-एक केहोते जाते हैंसोते जाते हैं जैसे सफ़र में बैठ-बैठ बातों में होते हैं हम जितनाउतने से कई गुना कहीं औरहोते हैंआख़िर को दिखते हैं ना होकरहोते हैं जहाँ वहाँदिखते ही नहीं हैं।
Jung | Balraj Komal 29.04.2026 1:47
जंग । बलराज कोमलतीरगी में भयानक सदाएँ उठींऔर धुआँ सा फ़ज़ाओं में लहरा गयामौत की सी सपेदी उफ़ुक़-ता-उफ़ुक़तिलमिलाने लगीऔर फिर एक दमसिसकियाँ चार-सू थरथरा कर उठींएक माँ सीना-कूबी से थक कर गिरीइक बहन अपनी आँखों में आँसू लिएराह तकती रहीएक नन्हा खिलौने की उम्मीद मेंसर को दहलीज़ पर रख के सोता रहाएक मा'सूम सूरत दरीचे से सर को लगाए हुएख़्वाब बुनती रहीमुंतज़िर थीं निगाहें बड़ी देर सेमुंतज़िर ही रहींमौत की...
Safar Ke Saathi | Natasha 28.04.2026 1:32
सफ़र के साथी । नताशावे मेरे कोई नहीं थेजिनका रह गया पानी उधार मुझ परउन कंधों की स्मृति शेष हैजिन पर मेरी नींद विदा हो गई हैउन पर रह गया उधारमेरे चुंबन का स्पर्शबीच रस्ते में जिनसेबिछड़ जाना पड़ा थाउन चेहरों को निहारना थाजिन्होंने लंबे सफ़र मेंमेरी भूख को बाँटाजिनके संबोधन के सूत्रध्वनि में घुल मेरे घर चले आएमैं कैसे चुकाऊँगी ये कर्ज़उन अजनबियों केजो मेरे कोई नहीं थे!
About the podcast
कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
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Nayi Dhara Radio
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1195
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2026. júl. 11.
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