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Nayi Dhara Radio

Pratidin Ek Kavita

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

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Arts

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14 oct. 2026

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Épisodes

Kuch Sacchaiyaan Kuch Jhooth | Wazda Khan 31.07.2026

कुछ सच्चाईयां, कुछ झूठ ।  वाज़दा खान    केवल मिसाइलें ही गहरे मारक असर नहीं करतीं जीवन में और भी बहुत कुछ है  गहरा और असरदार कभी उतरो जो उन गहराइयों में जहां बेहद अन्धेरा है कहीं है चिड़िया की एक आवाज़ कहीं चट्टानों के बीच दबा कोई रंग कहीं दरारों में बिंधा रुदन निश्चित रूप से हर असर गहरा अन्धेरा नहीं होता मगर जो गहरा और असरदार है उनमें से कुछ सितारों के साथ, तो कुछ दूसरे ग्रह के सूर्य के साथ छप जाते...

Mustanda Aur Bachcha | Shubha 30.07.2026

मुस्टंडा और बच्चा।  शुभा भाषा के अंदर बहुत सी बातें सबने मिलकर बनाई होती हैं इसलिए भाषा बहुत समय एक विश्वास की तरह चलती है जैसे हम अगर कहें बच्चा तो सभी समझते हैं, हाँ बच्चा लेकिन बच्चे की जगह बैठा होता है एक परजीवी एक तानाशाह फिर भी हम कहते रहते हैं— बच्चा! ओहो बच्चा! और पूरा देश मुस्टंडों से भर जाता है किसी उजड़े हुए बूढ़े में किसी ठगी गई औरत में किसी गूँगे में जैसे किसी स्मृति में छिपकर जान बचा...

Pukare Ja Rahe Ho Ajnabee Se | Zafar Gorakhpuri 29.07.2026

पुकारे जा रहे हो अजनबी से ।  ज़फ़र गोरखपुरी पुकारे जा रहे हो अजनबी से चाहते क्या हो ख़ुद अपने शोर में गुम आदमी से चाहते क्या हो ये आँखों में जो कुछ हैरत है क्या वो भी तुम्हें दे दें बना कर बुत हमें अब ख़ामुशी से चाहते क्या हो न इत्मिनान से बैठो न गहरी नींद सो पाओ मियाँ इस मुख़्तसर सी ज़िंदगी से चाहते क्या हो उसे ठहरा सको इतनी भी तो वुसअत नहीं घर में ये सब कुछ जान कर आवारगी से चाहते क्या हो किनारों प...

Bin Gharni Ghar Bhoot ka Dhera | Abha Bodhisattva 28.07.2026

बिन घरनी घर भूत का डेरा । आभा बोधिसत्व हज़ारों ग्रहों में यह धरती बहुत छोटी-सी है, हज़ारों घरों में बहुत छोटा है तुम्हारा घर तुम्हारा छोटा-सा घर था, ढेर सारे छोटे-छोटे समानों से भरा फिर भी तुम्हारा मन नहीं लगता था उससे तुमने अपने मनोरथ के लिए, लिया मेरा साथ, क्योंकि बिना घरनी के तुम्हारा घर था भूत का डेरा

Kehte Hain Taare Gaate Hain | Harivansh Rai Bachchan 27.07.2026

कहते हैं, तारे गाते हैं! । हरिवंश राय बच्चन कहते हैं, तारे गाते हैं! सन्नाटा वसुधा पर छाया, नभ में हमने कान लगाया, फिर भी अगणित कंठों का यह राग नहीं हम सुन पाते हैं! कहते हैं, तारे गाते हैं! स्वर्ग सुना करता यह गाना, पृथ्वी ने तो बस यह जाना, अगणित ओस-कणों में तारों के नीरव आँसू आते हैं! कहते हैं, तारे गाते हैं! ऊपर देव तले मानवगण, नभ में दोनों गायन-रोदन, राग सदा ऊपर को उठता, आँसू नीचे झर जाते हैं!...

Antim Sipahi Ki Tarah | Leeladhar Mandloi 26.07.2026

अंतिम सिपाही की तरह । लीलाधर मंडलोई मैं उनके लिए पागल हूँ जिन्हें बचा नहीं सका मैं उनके लिए रोता हूँ जो लड़ते हुए क़ब्र में अब भी ज़िंदा हैं मैं रस्मी मातम में शरीक़ नहीं मैं उन आवाज़ों में हूँ जिनमें मुक्ति का गान गूँजता है मैं उनके लिए अपनी घृणाओं को आकाश करना चाहता हूँ मैं न्याय के लिए अंतिम सिपाही की तरह जीत के लिए मर जाना चाहता हूँ।

Har Baar Deewaar | Jyotsna Milan 25.07.2026

हर बार दीवार।  ज्योत्स्ना मिलन आसमान होगा की उम्मीद में बाहर देखती खिड़की से बाहर दीवार होती सामने और होती फाँक भर धूप दो दीवारों के बीच धरी-सी दीवार की जगह आसमान नहीं निकला कभी घास का मैदान भी नहीं खिड़की के बाहर हर बार एक दीवार आसमान के बदले।

Main Dhoondhta Hun Jisey | Kaifi Azmi 24.07.2026

मैं ढूँडता हूँ जिसे ।  कैफ़ी आज़मी मैं ढूँडता हूँ जिसे वो जहाँ नहीं मिलता नई ज़मीन नया आसमाँ नहीं मिलता नई ज़मीन नया आसमाँ भी मिल जाए नए बशर का कहीं कुछ निशाँ नहीं मिलता वो तेग़ मिल गई जिस से हुआ है क़त्ल मिरा किसी के हाथ का उस पर निशाँ नहीं मिलता वो मेरा गाँव है वो मेरे गाँव के चूल्हे कि जिन में शोले तो शोले धुआँ नहीं मिलता जो इक ख़ुदा नहीं मिलता तो इतना मातम क्यूँ यहाँ तो कोई मिरा हम-ज़बाँ नहीं मि...

Mujhko Tera Shabab Le Baitha | Shiv Kumar Batalvi 23.07.2026

मुझ को तेरा शबाब ले बैठा। शिव कुमार बटालवी अनुवाद: आकाश 'अर्श' मुझ को तेरा शबाब ले बैठा रंग, गोरा गुलाब ले बैठा दिल का डर था कहीं न ले बैठे ले ही बैठा जनाब ले बैठा जब भी फ़ुर्सत मिली है फ़र्ज़ों से तेरे रुख़ की किताब ले बैठा कितनी बीती है कितनी बाक़ी है मुझ को इस का हिसाब ले बैठा मुझ को जब भी है तेरी याद आई दिन-दहाड़े शराब ले बैठा अच्छा होता सवाल ना करता मुझ को तेरा जवाब ले बैठा 'शिव' को इक ग़म पे...

Janamdin | Baby Shaw 22.07.2026

जन्मदिन ।  बेबी शॉ  तुम्हें सोचते हुए रोज़ एक नई दुनिया रचती हूँ मिट्टी के चावल धूल की सब्ज़ी पत्ते की रोटी खेल-घर जैसी... एक ऐसी दुनिया जिसे कोई नहीं जानता जहाँ प्रकाश-लोभ से स्वयं को जलाती हूँ मैं...

Apna Yatna Mein | Savita Singh 21.07.2026

अपनी यातना में । सविता सिंह  वह सो चुकी थी कई नींदें कई दिन और रातें बीत चुकी थीं कई ज़िंदगियाँ बन और बिखर चुकी थीं इस बीच लेकिन एक सपना था जो अब भी झिलमिला रहा था जिसकी झालर को पकड़ वह उठी थी और उन फूलों को ढूँढ़ने लगी थी जिन्हें सीने से लगा वह सोने गई थी जागने पर यह संसार उसे अब भी बहुत जाना-पहचाना ही लगा था फूल भले अनुपस्थित थे लेकिन उसके प्रेमी वहाँ खड़े थे बाँहें फैलाए हर हाल में प्रेम बचा रहत...

Vismriti ka Phool | Gobind Prasad 20.07.2026

विस्मृति का फूल । गोबिंद प्रसाद ...मैं हूँ मैं हूँ किसी का ...हूँ किसी का सपना देखा हुआ अनदेखा अपना स्मृति में जैसे बसा-किसी की विस्मृति का फूल बन, खिलने की हसरत में दिन-रात तपना पहरों-पहरों, देह की देहरी पर रह-रहकर अंगार-सा दहकना

Rone Wala Hi Gaata Hai | Gopaldas Neeraj 19.07.2026

रोने वाला ही गाता है । गोपालदास नीरज रोने वाला ही गाता है! मधु-विष हैं दोनों जीवन में दोनों मिलते जीवन-क्रम में पर विष पाने पर पहले मधु-मूल्य अरे, कुछ बढ़ जाता है। रोने वाला ही गाता है! प्राणों की वर्त्तिका बनाकर ओढ़ तिमिर की काली चादर जलने वाला दीपक ही तो जग का तिमिर मिटा पाता है। रोने वाला ही गाता है! अरे! प्रकृति का यही नियम है रोदन के पीछे गायन है पहले रोया करता है नभ, पीछे इंद्रधनुष छाता है।...

Karbala | Rajesh Joshi 18.07.2026

कर्बला।  राजेश जोशी पानी पियो तो याद करो प्यास इमाम हुसैन की! पानी पियो तो शुक्रिया अदा करो बादलों का नदियों, तालाबों और समुंदरों का शुक्रिया अदा करो समुंदरों का समुद्रों का पानी पीने के काम न आए तो भी! पानी पियो तो शुक्रिया अदा करो कुम्हारों का जिन्होंने बनाए पृथ्वी की तरह गोल मटके और बहुत सुंदर सुराहियाँ जिनकी गरदनें सुंदर स्त्रियों की तरह पतली और लंबी हैं! पानी पियो तो सोचो। काटी तो नहीं तुमने...

Jharkhand Ke Pahadon Ka Aranyarodan | Gyanendrapati 17.07.2026

झारखण्ड के पहाड़ों का अरण्यरोदन ।  ज्ञानेन्द्रपति डबडबा आया है भुरुकवा पूरब में भिनसार का भान है चिड़ियों का उजला कलरव जागने से पहले अँधियारी में एक काली कराह की मद्धिम गूँज है वह कौन है इस नीरव झारखण्ड में अपने कलपने को अपने भी कानों से दूर हिरदै की मुट्ठी में कसे हुए? वे छोटानागपुर के ठिगने पहाड़ हैं यहाँ के काले दुबले हड़ियल बूढ़े आदिवासियों की तरह ही चुप्पा कठिन नए दिन के लिए वे तैयार कर रहे ह...

Phir Kahe Ki Dooriyan | Anwar Suhail 16.07.2026

फिर काहे की दूरियाँ ।  अनवर सुहैल देखकर मुझको तुम्हें याद आती बिरयानी की मिलकर मुझसे बातें करते शराब-शबाब से लबरेज़ ग़ज़लों की तुम्हारे संवाद में अचानक उर्दू कुछ ज़्यादा आ जाती और अपने उर्दू ज्ञान से प्रभावित करने के लिए कहते मुझे जनाब की जगह ‘ख़ुदा-हाफ़िज़’ जबकि मैं तुम्हारी तरह इसी मिट्टी की उपज हूँ उतना ही हिंदी, उतना ही देसी, उतना ही देहाती जितने तुम फिर मुझे क्यों देखते हो एक परदेसी की तरह मै...

Mitti Ki Kaaya | Vishwanath Prasad Tiwari 15.07.2026

मिट्टी की काया ।  विश्वनाथ प्रसाद तिवारी इसी में बहती है मंदाकिनी अलकनंदा इसी में चमकते हैं कैलाश नील्कंठ इसी में लिखते हैं ब्रह्मकमल इसी में फड़फड़ाते हैं मानसर के हंस मिट्टी की काया है यह इसी में छिपती है ब्रह्मांड की वेदना।

Tope | Viren Dangwal 14.07.2026

तोप । वीरेन डंगवाल  कंपनी बाग़ के मुहाने पर घर रखी गई है यह 1857 की तोप इसकी होती है बड़ी सम्हाल, विरासत में मिले कंपनी बाग़ की तरह साल में चमकाई जाती है दो बार सुबह-शाम कंपनी बाग़ में आते हैं बहुत से सैलानी उन्हें बताती है यह तोप कि मैं बड़ी जबर उड़ा दिए थे मैंने अच्छे-अच्छे सूरमाओं के छज्जे अपने ज़माने में अब तो बहरहाल छोटे लड़कों की घुड़सवारी से अगर यह फ़ारिग़ हो तो उसके ऊपर बैठ कर चिड़ियाँ ही...

Zara Zara Sa | Sunita Jain 13.07.2026

ज़रा-ज़रा-सा। सुनीता जैन जी में जी खुलता है ज़रा-ज़रा-सा फागुन ऋतु का बौर हवा घुलता है ज़रा-ज़रा-सा गेरू रंग मधुमाखी है रंग पीला ततै - य्या ज़हरीला तितली के तो रंग गिनूँ क्या हर रंग ही चट - कीला अंतस में ज्वार उमड़ता कहाँ कहाँ का ज़रा-ज़रा-सा

Yehi hai Saadgi | Pablo Neruda | Translation - Prabhati Nautiyal 12.07.2026

यही है सादगी । पाब्लो नेरूदा   अनुवाद  -  प्रभाती नौटियाल ख़ामोश है ताक़त (पेड़ बताते हैं मुझे) और गहराई (बताती हैं जड़ें) और शुद्धता (बताता है आटा)   किसी पेड़ ने नहीं कहा मुझसे ”मैं सबसे ऊँचा हूँ।“ किसी जड़ ने नहीं कहा : ”मैं ही आती हूँ सबसे गहराई से ।“ और कभी नहीं कहा रोटी ने : ”कुछ भी नहीं है रोटी जैसा ।“

Abhida Ki Ek Sham | Vivek Nirala 11.07.2026

अभिधा की एक शाम।  विवेक निराला   एक छोटी शाम जो लम्बी खिंचती जाती थी बिल्कुल अभिधा में। रक्ताभा लिए रवि लुकता जाता था। लक्षणा के लद चुके दिनों के बाद अभिधा की एक छोटी-सी शाम धीरे-धीरे करती रही अपना प्रसार बढ़ती जाती थी भीड़ सिकुड़ता रहा सभागार। रचना ही बचना है कोहराम मचना है- कहा कभी किसी ने बे दांत जबड़ों के बीच कुतरे जाते हुए। अहंकार से लथपथ शतपथी ब्राहम्णों के पान से ललाये मुख से होते हुए आख़िर प...

Prakriya | Kedarnath Singh 10.07.2026

प्रक्रिया ।  केदारनाथ सिंह मैं जब हवा की तरह दृश्यों के बीच से गुज़रता हुआ अकेला होता हूँ तो क्षण भर के लिए मुझे कहीं भी देखा जा सकता है किसी भी दिशा से किसी भी मोड़ पर किसी भी भाषा के अज्ञात शब्दकोश में पर मैं जब कहीं नहीं होता सिर्फ़ कहीं होने की लगातार कोशिश में सामने की भीड़ को दूर से पहचानता हुआ हवा के आर-पार एक प्रश्न उछालता हूँ और हँसता हूँ तो न जाने क्यों मुझे लगता है कि गूँज-हीन शब्दों के...

Vismriti | Sushma Kumari 09.07.2026

विस्मृति।  सुषमा कुमारी  हम दूसरी दुनिया के चौथे, पाँचवे या सबसे निचले दर्जे के बचे हुए मुट्ठी भर अनाज हैं, आधे गेहूँ और आधे घून की तरह बची हुई हमारी नियति जातें में पीसने को तैयार है! गेहूँ है, घून है चक्की है, आटा है, भूख अब भी बैठी है आँत में हवा बदली है, मौसम बिगड़ा है। अख़बारों में युद्ध अब सबसे बड़ा मुद्दा नहीं, चूल्हे का सवाल इन दिनों सबसे बड़ा सवाल है! और चूहेदानी में फंसे रोटी के टुकड़े सब...

Sau Sau Janam Pratiksha Kar Lun | Bharat Bhushan 08.07.2026

सौ-सौ जनम प्रतीक्षा कर लूँ।  भारत भूषण सौ-सौ जनम प्रतीक्षा कर लूँ प्रिय मिलने का वचन भरो तो! पलकों-पलकों शूल बुहारूँ अँसुअन सींचू सौरभ गलियाँ भँवरों पर पहरा बिठला दूँ कहीं न जूठी कर दें कलियाँ फूट पडे पतझर से लाली तुम अरुणारे चरन धरो तो! रात न मेरी दूध नहाई प्रात न मेरा फूलों वाला तार-तार हो गया निमोही काया का रंगीन दुशाला जीवन सिंदूरी हो जाए तुम चितवन की किरन करो तो! सूरज को अधरों पर धर लूँ काजल...

O Achchi Ladkiyon | Pratibha Katiyar 07.07.2026

ओ अच्छी लड़कियों | प्रतिभा कटियार  ओ अच्छी लड़कियो, तुम मुस्कुराहटों में सहेज देती हो दुःख ओढ़ लेती हो चुप्पी की चुनर जब बोलना चाहती हो दिल से तो बाँध लेती हो बतकही की पाजेब नाचती-फिरती हो अपनी ही ख़्वाहिशों पर और भर उठती हो संतोष से कि ख़ुश हैं लोग तुमसे ओ अच्छी लड़कियो, तुम अपने ही कंधे पर ढोना जानती हो अपने अरमानों की लाश तुम्हें आते हैं हुनर अपनी देह को सजाने के निभाने आते हैं रीति-रिवाज, नियम...

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