Lokesh Gulyani
इसे तुम कविता नहीं कह सकते (#poetry)
Spoken word poetry in Hindi by Lokesh Gulyani
Μην παραλείψεις να επισκεφτείς τη σελίδα του podcast και να στηρίξεις τον δημιουργό: www.spreaker.com
Δημιουργός
Lokesh Gulyani
Κατηγορία
Ιστοσελίδα του podcast
Τελευταίο επεισόδιο
28 Ιουλ 2026
Πού να ακούσεις;
Podcast στην εφαρμογή Replaio Radio Έρχεται σύντομαΤα podcast έρχονται σύντομα στην εφαρμογή. Εγκατάστησέ την τώρα και δες πρώτος μια εντελώς νέα προσέγγιση στα podcast
Επεισόδια
Episode 11 - लीनियर स्ट्रिप (linear strip) 21.10.2024 3:38
एक दिन शायद उन्होंने भी अपने कुएं में झांक लिया था। शायद ख़ुद को ही देख लिया था। उसके बाद वे वैसी न रही। फिर हम भी उनसे वैसे न रहे।
Episode 10 - मिट्ठू बोलो राम-राम 04.10.2024 2:54
सोचने वाली बात है कि समय क्या खाता होगा? क्या समय वेजिटेरियन है या नॉन–वेजिटेरियन, या कोहली की तरह वीगन? कहीं समय परजीवी तो नहीं? या कहीं ऐसा होता हो कि हर बीतते पल को आने वाला पल निगल जाता हो और डंग बीटल की तरह वक्त लुढ़कता चला जाता हो?
Episode 9 - प्रेम गीत 01.10.2024 3:02
तुम्हारे भरोसे का आधार तो मैं ही हूं फिर मेरे भरोसे का आधार तुम क्यों नहीं हो? क्या मैंने भविष्य देख लिया है या मुझे अतीत ने ही डस लिया है?
Episode 8 - दुनियां का पहला आदमी 30.09.2024 2:58
आदमी को जितना सोचना चाहिए, उससे ज़्यादा सोचने की बीमारी से वह अभिशप्त है।
Episode 7 - Natgeo से Pogo 24.09.2024 3:19
लड़ने से ज़्यादा न लड़ने का डर ज़्यादा बड़ा होता है। जब हम लड़ते हैं तो किसी से लड़ते हैं और जब हम लड़ना स्थगित करते हैं तो ख़ुद से लड़ते हैं। ख़ुद से लड़ने में हार ही हार है।
Episode 6 - One Night Stand 17.09.2024 3:02
परिचित गंध को अपरिचित शरीर में ढूंढने की जद्दोजहद
Episode 5 - भूखे आदमी की फ़िक्र 11.09.2024 2:51
मेरे लिए कभी किसी का पानी आंखों से उतर कर मट्टी में नहीं समाया। अगर समाया होता तो मैं उसे ढूंढ लेता हर उस कण में जहां उसके मिलने की उम्मीद होती और उसे बाहर खींचने में त्याग देता अपनी भी आंख का खारा पानी।
Episode 4 - इस ख़्याल को रुक जाना चाहिए 10.09.2024 2:53
कुछ लोग ख्यालों को दबाना सीख चुके हैं, वे लोग उदास हैं। कुछ ने अभी नहीं सीखा है, वे जल्दी में हैं, उन्हें उनके ख्याल से भी पहले कहीं पहुंचना है।
Episode 3 - तुम irrelevant हो 10.09.2024 3:51
जैसे ये शरीर की सुई थी, वैसी ही क्या कोई सिरेंज मन को टटोलने के लिए मिलती है? क्या मन की परतों में कोई सुई घुसाई जा सकती है और उसका हाल पता किया जा सकता है? क्या मन को कोई गोली देकर भटकाया जा सकता है, ख़ुश किया जा सकता है, कुछ भूलने को विवश किया जा सकता है। बात न मानने पर क्या मन की बाँह मरोड़ी जा सकती है या उसे चांटा लगाया जा सकता है?
Episode 2 - Midlife Crisis 04.09.2024 3:25
एक ख़्याल जब हम उसे ढूंढने की कोशिश करते हैं, जिससे हमनें प्यार किया था
Episode 1 - दीवार की तरफ़ 28.08.2024 3:19
मैं इंतज़ार में था एक सुन्दर सुबह के, जब लगभग सब कुछ सुन्दर ही दिखाई दे। ऐसी सुबह कई बार आती-आती रह गई। फिर धीरे-धीरे मैंने उसकी चाहना ही छोड़ दी। मैं डूब गया कुहरे से सनी सुबहों में, धूसर दिनों में और रातों की कालिख़ में। मुझे मिलते रहे मेरे जैसे लुटे-पिटे लोग, 'जो सुन्दर सुबह हो सकती है इस सम्भावना से आज़ाद हो चुके थे।' हम साथ बैठ कर बात करते, साथ काम करते, साथ खाते-पीते पर उस सुन्दर सुबह का ज़िक्र क...
Παρόμοια podcast
Το Replaio δεν είναι εκδότης podcast - τα ονόματα των εκπομπών, τα εξώφυλλα και ο ήχος ανήκουν στους δημιουργούς τους και διανέμονται μέσω δημόσιων ροών RSS