Siva Prasad

Gita Acharan

Religion EN ↓ Επεισόδια: 674

Bhagavad Gita is a conversation between Lord Krishna and Warrior Arjun. The Gita is Lord's guidance to humanity to be joyful and attain moksha (salvation) which is the ultimate freedom from all the polarities of the physical world. He shows many paths which can be adopted based on one's nature and conditioning. This podcast is an attempt to interpret the Gita using the context of present times. Siva Prasad is an Indian Administrative Service (IAS) officer. This podcast is the result of understanding the Gita by observing self and lives of people for more than 25 years, being in public life.

Δημιουργός

Siva Prasad

Κατηγορία

Religion

Ιστοσελίδα του podcast

www.gitaacharan.org

Τελευταίο επεισόδιο

9 Ιουλ 2026

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Επεισόδια

232. शुभ कर्म 09.07.2026

श्रीकृष्ण कहते हैं ‘ॐ तत् सत्’ -यह तीन शब्द परम सत्य, ब्रह्म के त्रिविध प्रतीक हैं। वे आगे ‘सत्’ शब्द का अर्थ स्पष्ट करते हुए कहते हैं “ ‘सत्’ शब्द का अर्थ शाश्वत सत्य और शुभ है। हे अर्जुन! यह शब्द शुभ कर्मों को वर्णित करने के लिए भी प्रयुक्त होता है। जो व्यक्ति यज्ञ, तप और दान में निष्ठापूर्वक स्थित होता है, उसे भी ‘सत्’ कहा जाता है। और इस प्रकार जो भी कर्म इन उद्देश्यों के लिए किया जाता है, वह ‘...

231. ॐ तत् सत् 03.07.2026

भगवद्गीता के सत्रहवें अध्याय का शीर्षक ‘श्रद्धा त्रय विभाग योग’ है जिसमें श्रीकृष्ण जीवन और अस्तित्व के प्रत्येक पक्ष के तीन रूपों की व्याख्या करते हैं और कहते हैं कि ‘ॐ तत् सत्’ -ये तीन शब्द परम सत्य, ब्रह्म का त्रिविध प्रतिनिधित्व माने गए हैं। इसी ब्रह्म से ब्राह्मण ग्रन्थ, वेद और यज्ञ उत्पन्न हुए” (17.23)। ‘ॐ तत् सत्’ वेदान्त के संदर्भ में सर्वाधिक प्रचलित वाक्यांश है। ॐ एक मौलिक ध्वनि या कम्पन...

230. दान के प्रकार 01.07.2026

गुणों के संदर्भ में यज्ञ और तप का वर्णन करने के बाद श्रीकृष्ण दान के बारे में कहते हैं “जो दान केवल कर्तव्य समझकर, बिना किसी प्रतिफल की अपेक्षा के, उचित समय और स्थान पर, किसी योग्य व्यक्ति को दिया जाता है, वह सात्विक माना जाता है” (17.20)। इस श्लोक में दान के लिए कई प्रकार के निर्देश या नियम निहित हैं। श्रीकृष्ण ने पहले कहा था कि योग न तो उस व्यक्ति के लिए है जो बहुत अधिक खाता है और न ही उस व्यक्त...

229. तप के प्रकार 26.06.2026

तप के प्रकार

228. यज्ञ के प्रकार 26.06.2026

यज्ञ के प्रकार

227. मन और उदर का संबंध 26.06.2026

मन और उदर का संबंध

226. गुण और श्रद्धा 26.06.2026

गुण और श्रद्धा

225. शास्त्र एवं स्वधर्म 26.06.2026

शास्त्र एवं स्वधर्म

224. नरक के तीन द्वार 26.06.2026

नरक के तीन द्वार

223. बुराई का फल बुरा ही होता है 09.05.2026

श्रीकृष्ण आसुरी प्रवृत्ति वालों का विस्तार से वर्णन करते हुए कहते हैं,"ऐसे अनेक प्रकार से भ्रमित मन वाले, मोह के जाल में उलझकर तथा विषय-भोगों में आसक्त होकर घोर नरक में गिरते हैं (16.16)। ऐसे अभिमानी और हठी लोग, संपत्ति के मद और अहंकार से मदमस्त होकर, शास्त्रों के विधि-विधानों का आदर न करते हुए पाखंडपूर्वक केवल नाम मात्र के लिए यज्ञ करते हैं (16.17)। अहंकार (मैं कर्ता हूँ), बल, दम्भ, कामना और...

222. शक्ति का दर्प सही नहीं 29.04.2026

श्रीकृष्ण कहते हैं कि आसुरी प्रवृत्ति वाला व्यक्ति सोचता है, “मैंने आज यह प्राप्त कर लिया है और अब इस इच्छा को पूरा करूँगा। यह सब मेरा है और कल मुझे इससे भी अधिक मिलेगा (16.13)। मैंने इस शत्रु को मार डाला है और अन्य शत्रुओं को भी मार डालूँगा। मैं मनुष्यों में शासक हूँ; मैं भोगी हूँ, मैं पूर्ण, शक्तिशाली और सुखी हूँ (16.14)। मैं धनवान और कुलीन हूँ; मेरे समान और कौन है? मैं त्याग करूँगा, मैं दान करू...

221. साधन और साध्य - दोनों शुद्ध हों 23.04.2026

श्रीकृष्ण आसुरी स्वभाव वालों के बारे में आगे कहते हैं, "यह मानते हुए कि यह सारा संसार शारीरिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए है, ऐसे लोग मृत्युपर्यंत सांसारिक चिंताओं में डूबे रहते हैं (16.11)। सैकड़ों इच्छाओं, काम और क्रोध के बन्धन में बंधे हुए, वे अपनी इंद्रियों की तृप्ति के लिए अन्यायपूर्ण तरीकों से धन संचय करने का प्रयास करते हैं" (16.12)। जब इच्छाएँ पूरी नहीं होतीं, तो क्रोध स्वाभाविक है,...

220. तर्क से परे 23.04.2026

श्रीकृष्ण ने अस्तित्व की व्याख्या करते हुए कहा कि यह प्रकृति और पुरुष का संयोग है, जो दोनों अनादि हैं। गुण और विकार प्रकृति से उत्पन्नहोते हैं (13.20)। जबकि प्रकृति कारण और प्रभाव के लिए जिम्मेदार है, पुरुष उन्हें सुख और दुःख के द्वंद्वों के रूप में अनुभव करता है (13.21)। श्रीकृष्ण ने आगे स्पष्ट किया कि वह नाशवान प्रकृति से अतीत हैंऔर अविनाशी पुरुष से भी उत्तम हैं, इसलिए उन्हें पुरुषोत्तम (परम पुर...

219. बन्धन से मुक्ति 25.03.2026

श्रीकृष्ण कहते हैं, “तेज (चरित्र का तेज), क्षमा, धैर्य, पवित्रता, शत्रुभाव का न होना और प्रतिष्ठा की इच्छा से मुक्त होना; ये सब दिव्य प्रवृत्ति से संपन्न लोगों के दैवीय गुण हैं (16.3)। दम्भ, अहंकार, अभिमान, क्रोध, कठोरता और अज्ञानता उस व्यक्ति के लक्षण हैं जो आसुरी प्रवृत्ति के साथ जन्म लेता है (16.4)। संसार में दो प्रकार के प्राणी हैं- एक वे जो दैवीय गुणों से सम्पन्न हैं और दूसरे वे जो आसुरी प्रव...

218. अहिंसा 23.03.2026

श्रीकृष्ण कहते हैं, “अहिंसा, सत्य, अक्रोध, त्याग, शान्ति, निन्दा न करना, सभी प्राणियों पर दया, लोभ से मुक्ति, नम्रता, विनयशीलता, स्थिरता ये सब दैवीय गुण हैं (16.2)। जबकि अहिंसा एक दिव्य गुण है, कुरुक्षेत्र का हिंसक युद्ध एक बड़ी बाधा है जिसे भगवद्गीता को समझने के लिए पार करने की आवश्यकताहै। सबसे पहले, इस विरोधाभास का उत्तर श्रीकृष्ण ने पहले ही दे दियाथा जब उन्होंने अर्जुन से कहा था कि यदि वह सुख-द...

216. भय से पार पाना 20.03.2026

भगवद्गीता के सोलहवें अध्याय का शीर्षक ‘दैव-असुर सम्पद विभाग योग’ है। इसका अर्थ है दैवी और आसुरी स्वभावों के बीच के भेद को समझकर परमात्मा से एकत्व की प्राप्ति करना। हममें से प्रत्येक व्यक्ति में अनेक गुण होते हैं, जिन्हें दैव (दैवी) और असुर (आसुरी) कहा जा सकता है। दैव वह आंतरिक यात्रा है जो परमात्मा की ओर ले जाती है, जबकि असुर प्रवृत्ति हमें उनसे दूर ले जाती है। श्रीकृष्ण ने ‘अभयं’ (भय का आभाव) को...

217. दान व्यापार नहीं है 20.03.2026

श्रीकृष्ण ने अंतःकरण शुद्धि (आंतरिक पवित्रता), ज्ञानयोग में दृढ़ता, दान, इंद्रियोंपर नियंत्रण, यज्ञ, स्वाध्याय (स्वयं का अध्ययन) और सत्यनिष्ठा को कुछ दैवी गुणों के रूप में वर्णित किया है (16.1)। भगवद्गीता में एक सामान्य सूत्र इंद्रियों पर नियंत्रण है। यद्यपि इन्द्रियाँ हमारे अस्तित्व के लिए आवश्यक हैं, फिर भी वे इच्छाएँ उत्पन्न करके हमें बाँधती हैं, जिसके परिणामस्वरूप हम मुक्ति के दिव्य मार्ग से भ...

215. खुला रहस्य 08.03.2026

भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय को 'पुरुषोत्तम योग' कहा जाता है। यह शीर्षक निम्नलिखित श्लोक से लिया गया है जहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं, "मैं नाशवान कार्य प्रकृति (सृष्टि) से परे हूँ और अविनाशी आत्मा (कूटस्थ) से भी उत्तम हूँ। इसलिए, वेदों और जगत में मुझे पुरुषोत्तम कहा गया है" (15.18)। एक बार जब जागरूकता स्थापित होने लगती है, तो हमारे सामने दो मूलभूत प्रश्न आते हैं: हमें क्या करना चाहिए...

214. कैसे और क्यों 07.03.2026

परमात्मा अनन्त सागर के समान हैं और आत्मा एक अविनाशी बूंद है जो नाशवान मानव शरीर में स्थित है। श्रीकृष्ण उस सागर का वर्णन करते हुए कहते हैं, "सूर्य में स्थित तेज जो सम्पूर्ण जगत को प्रकाशित करता है तथा जो तेज चन्द्रमा में है और अग्नि में भी है, उसको तू मेरा ही तेज जान (15.12)। मैं पृथ्वी में व्याप्त होकर सभी जीवों को अपनी शक्ति से पोषित करता हूँ। चन्द्रमा के रूप में मैं सभी वनस्पतियों को जीवन...

213. परमात्मा और आत्मा 06.03.2026

श्रीकृष्ण विभिन्न संदर्भों में 'सृष्टि' की व्याख्या करते हैं और संकेत देते हैं कि सम्पूर्ण अस्तित्व प्रकृति और पुरुष का समन्वय है। उनका गर्भ महत्-ब्रह्म (महान प्रकृति) है जिसमें वे बीज स्थापित करते हैं जो सभी प्राणियों के जन्म का कारण है (14.3)। गुण और विकार प्रकृति से उत्पन्न होते हैं (13.20) और प्रकृति ही कारण और प्रभाव के लिए भी उत्तरदायी है; पुरुष सुख और दुःख के द्वंद्वों का अनुभव करने...

212. पुनर्जन्म के नियम 25.02.2026

श्रीकृष्ण ने जीवन की एक रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए कहा कि उनका एक अंश देहधारी आत्मा के रूप में प्रकट होता है और इंद्रियों को आकर्षित करता है जो प्रकृति का हिस्सा हैं। यह संकेत करता है कि इच्छाएँ ही इंद्रियों को आकर्षित करती हैं। उदाहरण के लिए, देखने या सुनने की इच्छा के कारण, क्रमशःआँख या कान जैसी इंद्रियों का विकास हुआ। वे आगे देहधारी आत्मा के शरीर त्यागने और नए शरीर में प्रवेश करने की प्रक्रिया क...

211. जीवन की रूपरेखा 01.02.2026

सृष्टि को परमात्मा की लीला या दिव्य नाटक कहा जाता है और यहाँ गंभीरता से लेने जैसा कुछ भी नहीं है। इस दिव्य नाटक में कुछ नियमों का पालन किया जाता है। श्रीकृष्ण इन नियमों की व्याख्या करते हुए कहते हैं, "इस भौतिक संसार की जीवात्माएँ मेरी शाश्वत आत्मा का केवल एक अणु अंश मात्र हैं और पाँच इंद्रियों और मन को आकर्षित करती हैं, जो प्रकृति का एक हिस्सा हैं (15.7)। श्रवण, दृष्टि, स्पर्श, स्वाद, गंध की...

210. उनके धाम की कुंजियाँ 28.01.2026

श्रीकृष्ण कहते हैं, "वे जो अभिमान और मोह से मुक्त हो गए हैं, जिन्होंने आसक्ति की बुराइयों पर विजय पा ली है, जो निरंतर अपनी आत्मा और भगवान में लीन रहते हैं, जिनकी कामनाएँ पूर्ण रूप से नष्ट हो गई हैं और सुख-दुःख के द्वन्द्वों से परे हैं, ऐसे मान और मोह रहित ज्ञानीजन मेरे शाश्वत धाम को प्राप्त करते हैं" (15.5)।मूलतः, ये उनके धाम में पहुँचने के गुण हैं और यदि एक बार हम इनकोप्राप्त कर लेते है...

209. अनासक्ति की कुल्हाड़ी 25.01.2026

श्रीकृष्ण ने जीवन के उल्टे वृक्ष की बात की, जहाँ मनुष्य नीचे की ओर लटकती कर्म रूपी जड़ों से बंधा हुआ है। श्रीकृष्ण हमें तुरंत इस बन्धन से मुक्त होने के लिए 'अनासक्ति की कुल्हाड़ी' का प्रयोग करने की सलाह देते हैं (15.3)। अनासक्ति भगवद्गीता के मूलभूत सिद्धांतों में से एक है। श्रीकृष्ण ने कईअवसरों पर इस शिक्षा का उल्लेख किया है। मोटे तौर पर, हम लोगों, वस्तुओं, भावनाओं, विचारों और विश्वासों से...

208. जीवन का उल्टा वृक्ष 19.01.2026

भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय को 'पुरुषोत्तम योग' कहा जाता है। श्रीकृष्ण इस अध्याय का प्रारम्भ उल्टे जीवन वृक्ष का वर्णन करते हुए कहते हैं, "ज्ञानी लोग एक शाश्वत अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष की चर्चा करते हैं, जिसकी जड़ें ऊपर की ओर और शाखाएँ नीचे की ओर होती हैं, और जिसके पत्ते वेदों के मंत्र हैं। जो इस वृक्ष को जानता है, वही वास्तव में वेदों का ज्ञाता है (15.1)। तीनों गुणों से पोषित, इस वृक्ष...

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