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Pratidin Ek Kavita

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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

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11. jul. 2026

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Episoder

Chupke Se Idhar Aa Jao | Shahryar 16.06.2026

चुपके से इधर आ जाओ । शहरयार दरवाज़ा-ए-जाँ से हो कर चुपके से इधर आ जाओ इस बर्फ़ भरी बोरी को पीछे की तरफ़ सरकाओ हर घाव पे बोसे छिड़को हर ज़ख़्म को तुम सहलाओ मैं तारों की इस शब को तक़्सीम करूँ यूँ सब को जागीर हो जैसे मेरी ये अर्ज़ न तुम ठुकराओ चुपके से इधर आ जाओ

Ibn-e-Insha | Swanand Kirkire 15.06.2026

इब्ने इंशा ।  स्वानंद किरकिरे हम इंशा जी के चेले हैं हम जोगी हैं बैरागी हैं हम प्रीत प्रेम के प्यासे हैं हम फ़ितरत से अनुरागी हैं इंशा की लय पर लिखते हैं कुछ उनकी तरह ही दिखते हैं इंशा की तरह हम प्रेमी हैं इंशा की तरह हम बाग़ी हैं है चाँद से अपना याराना है मन उसका आना-जाना जिस शै से हमारा दिल है लगा वो चाँद-चाँद कहलाती है हज़ारों रातें चाँद हज़ार हर शब है मोहब्बत का बाज़ार हम जीते हैं अजी ऐसे ही ह...

Shareef Log | Abdul Bismillah 14.06.2026

शरीफ़ लोग । अब्दुल बिस्मिल्लाह पत्थर के कोयले से जो धुआँ उठता है उसमें एक शहर महकता है सुना है उस शहर में शरीफ़ लोग रहते हैं लेकिन शराफ़त का धुएँ से क्या नाता है यह समझ में नहीं आता जैसे यह कि हर बार जंगल का राजा शेर ही क्यों हो जाता है या यह कि बच्चों की फ़सल मुरझाने क्यों लगी है कि बिना किसी बीमारी के मेरा जिस्म तलवार क्यों हो रहा है क्या यह बात शरीफ़ों के कर्त्तव्य से बाहर है कि वे धुएँ को ख़त्म...

Hatheli Ki Lakeerein | Madhav Kaushik 13.06.2026

हथेली की लकीरें । माधव कौशिक चले तो साथ थे लेकिन न जाने कैसे हुआ तुम्हारा हाथ किसी पिछले जन्म में शायद  हमारे हाथ से छूटा तो छूटता ही गया  हज़ारों साल से बिछड़ी हुई हैं दो आँखें हज़ारों साल में जाकर कभी मिलें तो मिलें कोई सुराग़ नहीं है इसीलिए शायद हथेलियों की लकीरों में ढूंँढता हूँ तुझे

Usne Kaha | Shiv Kumar Gandhi 12.06.2026

उसने कहा ।  शिव कुमार गांधी उसने कहा मुझसे ले चलो अपने शहर जो कहोगे वही करूँगा फिर पकड़ाई चाय जो गैस के चूल्हे पर बनी थी मैंने कहा मज़ाक़ में - जगह बदल लेते हैं हम और फिर वैसे भी शहर ख़ुद ही तो आ रहा है तुम तक उसने कहा वहाँ छत पर बैठना शाम में अच्छा लगता है रोशनियों बीच और फिर हवा तो आती ही है एक कारख़ाने में काम करता था उसका भतीजा जिसके साथ किसी छत पर बैठा था वह एक दिन इस शहर में रोशनियों बीच और उस...

Is Ghat-Antar Baag-Bageeche | Kabir 11.06.2026

इस घट-अंतर बाग़-बगीचे । कबीर इस घट-अंतर बाग़-बगीचे इसी में सिरजनहारा इस घट-अंतर सात समुंदर इसी में नौ लख तारा इस घट-अंतर पारस मोती इसी में परखनहारा इस घट-अंतर अनहद गरजै इसी में उठत फुहारा कहत 'कबीर' सुनो भाई साधो इसी में साईं हमारा

Kya Kiya | Sushma Kumari 10.06.2026

क्या किया।  सुषमा कुमारी घोर अँधेरे में जब 'मुक्तिबोध' के शब्द गूंजते हैं कानों में - 'कहो इस जीवन में क्या किया? किसी मेमने की तरह घबराई, मैं भागने लगती हूँ उल्टी दिशा में! बहुत-बहुत भाग कर फिर पहुँचती हूँ वहीं! न बचने की हालत में बहुत-बहुत सोचती हूँ, और पाती हूँ। अँधेरी खदानों में खोदती रही जीवन। उम्मीदों की अनाज से, भरती रही बच्चों का पेट! मजदूरी की झुकी हुई पीठ पर बोझा उठाया। कतरनों को चुन कर...

Be-Awaaz | Veeru Sonkar 09.06.2026

बे-आवाज़ । वीरू सोनकर जहाँ भाषा चूकती है और अर्थ बे-आवाज़ ही रह जाते हैं जहाँ शब्दों को कोई ईश्वर नहीं मानता हम वहाँ मिलेंगे और अपनी चुप्पियों में कहेंगे कि आवाज़ एक ख़लल है इस दुनिया को बिना किसी शर्त अब चुप हो जाना चाहिए!

Meri Ma Ek Patang Hai | Kumar Divyanshu Shekhar 08.06.2026

  मेरी माँ एक पतंग है । कुमार दिव्यांशगु शेखर  पतंग बने। नियत हुआ आकाश;  पर किसी  तौर उन्हें भाते रहे तार, पटरियों के ऊपर बिछे समानांतर। ओ मेरी मातः! तुम एक पतंग हो, तुमने नहीं चुना आकाश। कितना त्रासद है यह तार से चिपका-उलझा-फड़फड़ाता निरंतर सुलगता एक दिन गल जाएगा तुम्हारा अस्तित्व।

Harmony | Hemant Deolekar 07.06.2026

हार्मनी।  हेमंत देवलेकर सफ़ेद ओर काला अलग रहेंगे तो नस्ल कहायेंगे मिलकर रहेंगे तो संगीत हारमोनियम साहचर्य की एक मिसाल है। उंगलियों के बीच की खली जगह उंगलियों से भर देने के लिए है

Ummeed | Shailay 06.06.2026

उम्मीद । शैलेय अँजुरी भर जल तलुवे भर ओस आँख भर सपना नींद भर लोरी हौसले को जुगनू भर हिक़मत जुटा ही लेनी चाहिए नामुराद अंधड़ में कुछ तो मिट्टी टूटने से बचेगी कुछ तो उगी रह सकेगी दूब कि कभी न कभी तो फूट ही लेंगे कल्ले नए-नए।

Ek Abhineta Ki Thakaan | Agney 05.06.2026

एक अभिनेता की थकान। आग्नेय वह रंगमंच पर जा चुका है वह अपनी भूमिका पूरी कर चुका है उतार दी है पोशाक उस चरित्र की जिसका अभिनय किया उसने वह नहीं जानता जब वह रंगमंच पर था करतल-ध्वनियाँ हुईं या नहीं अथवा सन्नाटा पसरा रहा दर्शकों के बीच रंगशाला में प्रत्येक वर्ष यह भूमिका करते वह थक चुका है कहाँ जाए रंगमंच छोड़कर हो चुका है वह जो कुछ अभिनय करते उसको छोड़कर जाना क्या उस पर निर्भर करता है

Yah Number Maujood Nahi Hai | Manglesh Dabral 04.06.2026

यह नंबर मौजूद नहीं ।  मंगलेश डबराल दिस नंबर डज़ नॉट एग्ज़िस्ट जहाँ भी जाता हूँ जो भी फ़ोन मिलाता हूँ अक्सर एक बेगानी-सी आवाज़ सुनाई देती है दिस नंबर डज़ नॉट एग्ज़िस्ट यह नंबर मौजूद नहीं है कुछ समय पहले इस पर मिला करते थे बहुत-से लोग कहते आ जाओ हम तुम्हें पहचानते हैं इस अंतरिक्ष में तुम्हारे लिए भी बना दी गई है एक जगह लेकिन अब वह नंबर मौजूद नहीं है वह कोई पहले का नंबर था उन पुराने पतों पर बहुत कम ल...

Tum Ho | Nazim Hikmat 03.06.2026

तुम हो ।  नाज़िम हिकमत अनुवाद : सुरेश सलिल तुम्हीं मेरी ग़ुलामी हो, तुम्हीं मेरी आज़ादी गर्मियों की किसी बेलिबास रात की तरह मेरा जिस्म मेरा वतन हो तुम पन्ने जैसी हल्की हरी आँखें, हैरतअंगेज़ हो तुम, ख़ूबसूरत और ज़िंदादिल मेरी हस्रत हो तुम, मेरी पहुँच से परे हरदम।

Sankatgrasth | Vivek Nirala 02.06.2026

संकटग्रस्त।  विवेक निराला  भूमंडलीकरण के इस युग में  संकट ही संकट थे  स्थानीय लोग कुछ वैश्विक संकटों से जूझ रहे थे  और वैश्विक लोग स्थानीय संकटों से। मेरा संकट मेरी टूटी खाट थी  जब कि मैं स्वप्न में था।  किसानों के पास कर्ज था और उद्योगपतियों के पास मर्ज  सरकार को किसी से हर्ज न था। खुदगर्ज सिर्फ़ हिन्दी का कवि था लेकिन वह भी संकट से दुबराया था। न उसकी किताब बिकती थी और न उसकी आत्मा।  उसके शरीर मे...

Ped | Omprakash Valmiki 01.06.2026

पेड़ । ओमप्रकाश वाल्मीकि पेड़ तुम पेड़ उसी वक़्त तक पेड़ हो, जब तक ये हरे पत्ते हिल रहे हैं तुम्हारी टहनियों पर। पेड़, तुम्हारा हरापन उसी वक़्त तक है जब तक ये पत्ते सही सलामत हैं तुम्हारी टहनियों पर। पेड़, तुम उसी वक़्त तक पेड़ हो, जब तक ये पत्ते तुम्हारे साथ हैं। पत्ते झरते ही पेड़ नहीं ठूँठ कहलाओगे जीते जी मर जाओगे!

Tum Muskurana | Anurag Tiwari 31.05.2026

तुम मुस्कुराना । अनुराग तिवारी चाहे जैसी स्थितियां हो हालात चाहे कैसे हो दुख हो, निराशा हो या फिर झूठी आशा हो विफलता या असफलता हो या फिर घोर विकलता हो संताप, वेदना, दर्द हो या थक कर हारा मर्द हो जब अपनी शक्ति क्षीण लगे हम-तुम सा वीर अधीर लगे जब निश्छल प्रेम अधूरा हो अपना सोचा ना पूरा हो तब मानों इक बात मेरी, ना घबराना तुम मुस्कुराना मुस्कुराना मुस्कुराना।। सपने अगर अधूरे हो कोशिश हो ना पूरे हों रा...

Mohabbat Mein Der Ho Sakti Hai | Zeeshan Sahil 30.05.2026

मोहब्बत में देर हो सकती है। ज़ीशान साहिल जब तुम मुझे सुनो ये कहते हुए एक ख़ूब-सूरत लड़की पे मरना कितना आसान है और उसी के लिए मर जाना मैं पसंद करता हूँ और इस के बाद तुम मुझे देखो कई बरस तक अपने टूटे हुए दिल को जोड़ते गिरे हुए सितारों को दोबारा आसमान में टाँकते मिट्टी में मिले हुए फूलों को फिर से खिलाने की कोशिश करते एक ख़ूब-सूरत लड़की के लिए मोहब्बत में देर हो सकती है

Shabd | Kamala Das | Translation - Ranjana Mishra 29.05.2026

शब्द / कमला दास  अनुवाद. - रंजना मिश्रा मेरे चारों और शब्द, शब्द, शब्द हैं वे मुझपर पत्तों की तरह उगते हैं ऐसा लगता है वे कभी मेरे भीतर धीमे धीमे उगना बन्द नहीं करते पर मैं खुद से कहती हूँ — शब्द वे एक मुसीबत हैं, उनसे सावधान रहो, वे कई चीज़ें हो सकते हैं, जैसेकि खाई जहाँ तेज़ी से चलते क़दमों को ठहरना चाहिए देखो, वे समुद्र की पंगु बनाने वाली लहरें हो सकते हैं गर्म हवाओं का भूचाल या तुम्हारे सबसे अ...

Ek Aur Dhang | Shrikant Verma 28.05.2026

एक और ढंग। श्रीकांत वर्मा भागकर अकेलेपन से अपने तुममें मैं गया। सुविधा के कई वर्ष तुममें व्यतीत किए। कैसे? कुछ स्मरण नहीं। मैं और तुम! अपनी दिनचर्या के पृष्ठ पर अंकित थे एक संयुक्ताक्षर! क्या कहूँ! लिपि की नियति केवल लिपि की नियति थी— तुममें से होकर भी, बसकर भी, संग-संग रहकर भी बिल्कुल असंग हूँ। सच है तुम्हारे बिना जीवन अपंग है। - लेकिन! क्यों लगता है मुझे प्रेम अकेले होने का ही एक और ढंग है।

Ma | Amitabh 27.05.2026

माँ । अमिताभ हालाँकि मैं सबसे छोटा था ग़रीब दुर्बल पर माँ सर्वाधिक मेरे हिस्से में आई मैं ही था उसका अशिष्ट सेवक लापरवाह प्रेमी मैं ही अकेला चूम सकता था उसके गाल वही जानती थी बस कि मैं कवि हूँ

Buddh Chahiye Yuddh Nahi | Rajni Tilak 26.05.2026

बुद्ध चाहिए युद्ध नहीं ।  रजनी तिलक क्यों खड़ी की तुमने बारूद के ढेर पर हमारी दुनिया मुझे जीवन की आस है। मैं सावन को आँखों में भरकर बहारों में झूलना चाहती हूँ शाँति, ज्ञान, करुणा मेरा गहना युद्ध, क्रूरता, तृष्णा तुम्हारा हथियार हिरोशिमा की तड़प मैं भूलना चाहती हूँ। तुमने जो मृत्यु बीज परमाणु युद्ध क्यों बोया? यह घृणा-मृत्यु का वटवृक्ष पल में लाखों को भी लेगा, बुद्ध के देश में पंचशील, संकल्प टूट जा...

Mohabbat Mein Karein Kya Kuch | Daag Dehlvi 25.05.2026

मुहब्बत में करे क्या कुछ किसी से हो नहीं सकता ।  दाग़ देहलवी मुहब्बत में करे क्या कुछ किसी से हो नहीं सकता मेरा मरना भी तो मेरी ख़ुशी से हो नही सकता न रोना है तरीक़े का न हंसना है सलीके़ का परेशानी में कोई काम जी से हो नहीं सकता ख़ुदा जब दोस्त है ऐ 'दाग़' क्या दुश्मन से अन्देशा हमारा कुछ किसी की दुश्मनी से हो नहीं सकता

Bhejna | Tribhuvan 24.05.2026

भेजना | त्रिभुवन लौटते पत्र के साथ कुछ बादल भेजना समुद्र के कुछ पेड़ पत्तियों के बीच चहचहाते कुछ पक्षी और पानी की कुछ लहरें भेजना अपनी सुंदर आँखों के अक्स भेजना भेजना चेहरे की लालिमा के कुछ लैंडस्केप और रात भर नशा करके बैठी सुबह की कुछ छवियाँ भेजना हाँ, एक खुली खिड़की भेजना एक मदमाती पतली अकेली गली का वह कोना भेजना जहाँ मैं तुमसे मिल सकूँ और अपनी उँगलियों की छुअन भेजना जिसे अपनी चाहत की दीवारों में...

Na Hoga Kuch Tab | Ritu Kumar Ritu 23.05.2026

न होगा कुछ तब। ऋतु कुमार ऋतु हमें मालूम है एक न एक दिन हम सब मिल जाएँगे इसी मिट्टी में एक न एक दिन हमें मालूम है होगी निष्प्राण यह सृष्टि हमें मालूम है एक न एक दिन अपने यक़ीन पर आ जाएँगे हम सब और किसी सबूत की ज़रूरत नहीं होगी!

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