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Pratidin Ek Kavita

Arts HI ↓ 1195 episodes

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

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11. jul. 2026

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Episodes

Chutti Ka Din | Shariq Kaifi 27.04.2026

छुट्टी का दिन । शारिक़ कैफ़ी ये मेरी मौत पर छुट्टी का दिन है कैलेंडर पर छपी ये आज की तारीख़ मेरी मौत ही से लाल हो सकती थी शायद सवेरे तक जो काली रौशनाई (सियाही) से लिखी थी मज़ा ही कुछ अलग है ऐसी छुट्टी का अचानक जो मिले  ये मेरा आख़िरी तोहफ़ा है अपने साथियों को वगरना पीर (वृहस्पतिवार) का दिन कितना सर-दर्दी भरा होता है दफ़्तर का ये दुनिया जानती है

Baarish | Girdhar Rathi 26.04.2026

बारिश । गिरधर राठी बारिश जहाँ जोड़ती है ठीक वहीं तोड़ती है गुनगुनाती है अपने-आप लहराती हहराती है अपने-आप चुप हो जाती है बरसती रहती है अपने-आप तुम्हें कुछ नहीं करने देती ... दीवार है बारिश हे बनती और टूटती टूट-टूट पड़ती एकांत पर एकांत बारिश में (भी) ढहता नहीं

Badan Ka Faisla | Mohammad Alvi 25.04.2026

बदन का फ़ैसला । मोहम्मद अल्वी ये बदन जिसे मैं बेहतरीन ग़िज़ाएँ (भोजन) खिलाता रहा पानी की जगह शराब पिलाता रहा यही बदन मुझ से कहता है जाओ दफ़ा हो जाओ जन्नत के मज़े उड़ाओ कि दोज़ख़ के अज़ाब उठाओ मेरी बला से मैं तो अब क़ब्र में सो रहूँगा मिट्टी हूँ मिट्टी का हो रहूँगा!!

Mere Naseeb ka Likha | Shayar Jamali 24.04.2026

 मिरे नसीब का लिक्खा बदल भी सकता था । शायर जमाली मेरे नसीब का लिक्खा बदल भी सकता था वो चाहता तो मेरे साथ चल भी सकता था ये तू ने ठीक किया अपना हाथ खींच लिया मेरे लबों से तिरा हाथ जल भी सकता था उड़ाती रहती है दुनिया ग़लत-सलत बातें वो संग-दिल* था तो इक दिन पिघल भी सकता था संग-दिल: पत्थर दिल  उतर गया तिरा ग़म रूह की फ़ज़ाओं में रगों में होता तो आँखों से ढल भी सकता था मैं ठीक वक़्त पे ख़ामोश हो गया वर्...

Hum Rote Thodi Hain Pagal | Pradip Awasthi 23.04.2026

हम रोते थोड़ी हैं पागल । प्रदीप अवस्थी हमारे हिस्से आईं जो उदासियाँ गले तक भर आए जो दुख के घड़े जला गया आँखों को जो गरम पानी और जो कहानियाँ बनाईं अपने दिमाग़ में जिनमें हम सबसे उत्पीड़ित किरदार तुम्हें बाँहों में भरते ही गलेगा सब हम रोते थोड़ी हैं पागल ये तो बस तस्वीरें अय्यारी करती हैं।

Ye Kya Hai Mohabbat Mein | Shahryar 22.04.2026

ये क्या है मोहब्बत में तो ऐसा नहीं होता । शहरयार ये क्या है मोहब्बत में तो ऐसा नहीं होता मैं तुझ से जुदा हो के भी तन्हा नहीं होता इस मोड़ से आगे भी कोई मोड़ है वर्ना यूँ मेरे लिए तू कभी ठहरा नहीं होता क्यूँ मेरा मुक़द्दर (क़िस्मत) है उजालों की सियाही क्यूँ रात के ढलने पे सवेरा नहीं होता या इतनी न तब्दील हुई होती ये दुनिया या मैं ने इसे ख़्वाब में देखा नहीं होता सुनते हैं सभी ग़ौर से आवाज़-ए-जरस* क...

Kitabein | Laxmikant Mukul 21.04.2026

किताबें । लक्ष्मीकांत मुकुल कितनी रहस्य भरी है किताबों की दुनिया पन्नों के बीच दबे मोर-पंख याद दिलाते हैं बचपन के कच्चे प्यार उनके लिखित उतरते जाते हैं हौले से आत्मा की गहवर में उसके विस्तृत फैलाव में गुम हो जाती है हमारी कूप मंडुकता!

Jab Akhbaar Se Zyada Hon | Neelam Bhatt 20.04.2026

जब अख़बार से ज़्यादा हों । नीलम भट्ट जब अख़बार से ज़्यादा हों पन्ने इश्तहारों के तो समझो त्योहारों का मौसम आ गया... जब रिश्तों पर हावी हो सौग़ातों का बोझ तो समझो बाज़ार हम पर छा गया...  क्या खरीदें, कहां से, कितना और कैसे आसान किश्तों पर खुशी खरीदने का  चलन आ गया...

Filwaqt Jahan Hun | Parul Pukhraj 19.04.2026

फ़िलवक़्त जहाँ हूँ। पारुल पुखराज जाना है जहाँ हो रही मेरी प्रतीक्षा लौटना है फ़िलवक़्त जहाँ हूँ होने की जगह मेरे असंख्य नेवलों का वास है संभव है वे लुक-छिप साथ जाएँ निगलने प्रतीक्षा को मेरी अनुपस्थिति में जो फन काढ़ती है अक्सर

Suraj Doob Raha Hai | Kumar Divyanshu Shekhar 18.04.2026

 सूरज डूब रहा है  | कुमार दिव्यांशु शेखर सूरज डूब रहा है और मन भी। गैयों के धूल उड़ाते खुर स्मृतियों के ललाते आकाश पर छींटते हैं विस्मृतियों का धुँधलका। कच्ची नींद से उठ बैसाख की दोपहर पूस की भोर में सानी-पानी देते हाथ घूम जाते हैं धुँधलकों के पीछे। ललाती साँझ पर मिट्टी मलते  गैयों के झुंड। जी चाहता है दो कदम तेज़ लपक सट लूँ इनसे दुलारूँ, गर्दन सहलाऊँ पर मेरी बाहें छाती को चिपकी रहती हैं। फट के बह न...

Intezaar | Padma Sachdev 17.04.2026

इंतज़ार ।  पद्मा सचदेव फागुन की डयौढ़ी के आगे लग गया पहाड़ सूखी पत्तियों का कोई पत्ता सीधा कोई गोल-सा हुआ पड़ा कोई धीरे-धीरे ले रहा है साँस कोई लगता है यूँ बिल्कुल मरा-सा टहनियों पर नए फूल आने को आतुर बड़े हरी टहनियों के ऊपर जैसे हों मोती जड़े खुलेगी जब कली आ ही जाएँगे मुट्ठी बंद, बंद आँख, बंद होंठ सब ही तो खुल जाएँगे छोटे-छोटे हाथ पाँव, बाँह और छोटा-सा पेट खिलेगी पूरी बहार फागुन भी करता इसी का इंतज़...

Nirvaitikta - Ek Punarvichar | Satyam Tiwari 16.04.2026

निर्वैयक्तिकता: एक पुनर्विचार | सत्यम तिवारी हर ज़िम्मेदारी से भागने वाला यही तर्क देता है महानता का पैमाना नहीं इसलिए निर्वैयक्तिकता को देखो कथनी-करनी में अंतर की तरह एक आदमी बायाँ हाथ देकर दाहिने मुड़ जाता है उसका इंडिकेटर ख़राब था कि मंशा आत्मरक्षा में आए दिन होती हैं हत्याएँ अनजाने एक पत्ता भी नहीं हिलता जहाँ रात नहीं ढलती जहाँ सूरज नहीं निकलता बिना गए ही वहाँ जा रहे हो कवि? ऐसा क्या पा लोगे इस...

Main Gadhna Chahti Hoon | Priya Johri 'Muktipriya' 15.04.2026

मैं गढ़ना चाहती हूँ  | प्रिय जोहरी 'मुक्तिप्रिया'  मैं गढ़ना चाहती हूँ  एक पुरुष जो जानता हो एक स्त्री होना क्या होता है। जो जानता हो गाँव छूटता है, मां-बाप का बसाया घर-संसार छूटता है, तो क्या होता है। जो जानता हो कि स्त्री की काया संसार की माया नहीं, जगत का सृजन है, हर मानस का जन्म है। जो जानता हो किसी औरत का हौसला बनाना कोई एहसान नहीं. ईमान है उसका, सच्चे पुरुष होने का प्रमाण है उसका। जो जी सकें...

Sapna Aur Deewaar | Langston Hughes | Translation - Dharamvir Bharti 14.04.2026

सपना और दीवार। लैंग्स्टन ह्यूज़ अनुवाद : धर्मवीर भारती बहुत दिन हो गए! मैं अपने सपने को लगभग भूल चुका था। लेकिन सपना अनश्वर था मेरे सामने, झिलमिलाते हुए सूरज की तरह मेरा सपना! और फिर दीवार उठी, धीरे-धीरे, मेरे और मेरे सपने के बीच। उठती गई धीरे-धीरे मेरे सपने की रोशनी को धुँधला करते हुए, रोशनी का गला घोंटते हुए! यहाँ तक कि आकाश चूमने लगी वह दीवार! दीवार की छाया... ...मैं काला हूँ... मैं काली छाया म...

Ma Atithi Hai | Kumar Ambuj 13.04.2026

माँ अतिथि है | कुमार अम्बुज माँ घर में आई है लेकिन वह अतिथि है उसके पास उसके हज़ारों बाक़ी रह गए काम हैं उसके पास उसका अपना घर है जिसे लंबे समय तक नहीं छोड़ा जा सकता सूना जो भरा हुआ है बीते हुए समय से माँ धीरे-धीरे चली गई है इतनी दूर कि उसके सबसे स्मरणीय और चमकदार रूप के लिए लौटना होता है कई साल पहले के वक़्त में मैं चाहूँ तो भी नहीं रोक सकता माँ को जाने से भूल चुका हूँ मैं हठ करना दूर-दूर तक नहीं...

Samarpan | Hemant Deolekar 12.04.2026

समर्पण | हेमंत देवलेकर प्रेम सबको बहा ले जाता है - नदी को भी सिर्फ़ एक शब्द है नदी के जीवन में -'समर्पण' प्रेम से ज़्यादा श्रमसाध्य कोई काम नहीं जब हमें नदी के पानी में नदी का पसीना दिखाई देगा समुद्र के खारेपन के बारे में बदल जायेगी हमारी धारणा हम उसे भी एक शीशी में भरकर ले आयेंगे।

Yugm | Vivek Nirala 11.04.2026

युग्म | विवेक निराला     एक समय में रहे होंगे कम-से-कम-दो  जितने कि आवश्यक हैं सृष्टि के लिए। दो आवाज़ें भी रही होंगी कम-से-कम  एक सन्नाटे की  एक अँधेरे की। अँधेरा भी दो तरह का  रहा होगा अवश्य  एक भीतर का  दूसरा बाहर का। जल-थल  सर्दी-गर्मी  दिन-रात  युग्म में ही रहा होगा जीवन सुख-दुख से भरा हुआ।

Main To Arrey Kar Ke Reh Gaya | Naveen Sagar 10.04.2026

मैं तो अरे! करके रह गया। नवीन सागर अरे! सब कुछ समझ से परे कोई क्या करे! क्या करे वह जो सुन रहा है अंतर्तम की आवाज़ सीधे सरल जीवन की चाह आह! ओछेपन पर सर्वत्र वाह! वाह। हत्यारों पर आसमान से फूल झर रहे हैं जो मर रहे हैं उनके पास कोई नहीं है माँ स्तंभित है कब से रोई नहीं है घरों में दुःख अट रहा है अटूट बाज़ारों में सुख बिक रहा है ईश्वर से बड़ा यह कौन दिख रहा है जो हमारी दैनंदिनी लिख रहा है जो फिंकना थ...

Vimla Ki Yatra | Savita Singh 09.04.2026

विमला की यात्रा | सविता सिंह उसे जाना है आज शाम चार बजे रेलगाड़ी से जाना है पति के घर से इस बार पिता के घर एक घर से दूसरे घर जाते हैं वही नहीं होता जिनका अपना कोई घर बारह साल की उम्र में विमला ब्याह दी गई जब वह गई पति के घर पहली बार उस घर को उसने बनाया अपना लीप-पोत कर चमकाया उसे कूट-पीस कर हमेशा इकट्ठा किया और रखा साल-भर का अनाज धोए सबके पाँव सिले सबके उधड़े-फटे कपड़े कहते हैं पति का घर होता है पत...

Jab Milegi Roshni Mujhse Milegi | Ram Avtaar Tyagi 08.04.2026

जब मिलेगी रोशनी मुझसे मिलेगी । रामावतार त्यागी इस सदन में मैं अकेला ही दीया हूँ; मत बुझाओ! जब मिलेगी, रोशनी मुझसे मिलेगी!! पाँव तो मेरे थकन ने छील डाले अब विचारों के सहारे चल रहा हूँ, आँसुओं से जन्म दे-देकर हँसी को एक मंदिर के दीये-सा जल रहा हूँ; मैं जहाँ धर दूँ क़दम, वह राजपथ है; मत मिटाओ पाँव मेरे, देखकर दुनिया चलेगी!! बेबसी, मेरे अधर इतने न खोलो जो कि अपना मोल बतलाता फिरूँ मैं, इस क़दर नफ़रत न ब...

Gair Vidrohi Kavita Ki Talaash | Lal Singh Dil 07.04.2026

गैर विद्रोही कविता की तलाश | लालसिंह दिल।  सत्यपाल सहगल मुझे गैर विद्रोही कविता की तलाश है ताकि मुझे कोई दोस्त मिल सके। मैं अपनी सोच के नाखून काटना चाहता हूँ ताकि मुझे कोई दोस्त मिल सके। मैं और वह सदा के लिए घुलमिल जायें। पर कोई विषय गैर विद्रोही नहीं मिलता ताकि मुझे कोई दोस्त मिल सके।

Manush Raag | Jitendra Srivastava 06.04.2026

मानुष राग ।  जितेन्द्र श्रीवास्तव धन्यवाद पिता कि आपने चलना सिखाया अक्षरों शब्दों और चेहरों को पढ़ना सिखाया धन्यवाद पिता कि आपने मेंड़ पर बैठना ही नहीं खेत में उतरना भी सिखाया बड़े होकर बड़े-बड़े ओहदों पर पहुँचने वालों की कहानियाँ ही नहीं सुनाईं छोटे-छोटे कामों का बड़ा महत्त्व बताया सिर्फ़ काम कराना नहीं काम करना भी सिखाया धन्यवाद पिता कि आपने मानुष राग सिखाया बहुत-बहुत धन्यवाद यह जानते हुए भी कि...

Badi Hoti Ladki | Deepti Khushwah 05.04.2026

बड़ी होती लड़की ।  दीप्ति कुशवाह स्कूल से निकलकर पानठेला फिर चौराहा आगे कटिंग सैलून तक लड़की नज़र नहीं उठाती कानों में पड़ती उन बातों पर, जिनके अभिप्राय कक्षा में पढ़ाए अर्थों से होते हैं सर्वथा ज़ुदा कोई प्रतिक्रिया नहीं दर्शाती पर घर आकर वह चुप नहीं रहती धर किनारे बस्ते को माँ से कहती है रोज़ ‘स्कर्ट को थोड़ा और लंबा कर दो’

Aadmi Aadmi Se Milta hai | Jigar Muradabadi 04.04.2026

आदमी आदमी से मिलता है। जिगर मुरादाबादी आदमी आदमी से मिलता है दिल मगर कम किसी से मिलता है भूल जाता हूँ मैं सितम उस के वो कुछ इस सादगी से मिलता है आज क्या बात है कि फूलों का रंग तेरी हँसी से मिलता है सिलसिला फ़ित्ना-ए-क़यामत का तेरी ख़ुश-क़ामती से मिलता है मिल के भी जो कभी नहीं मिलता टूट कर दिल उसी से मिलता है कारोबार-ए-जहाँ सँवरते हैं होश जब बे-ख़ुदी से मिलता है रूह को भी मज़ा मोहब्बत का दिल की हम-...

Unke Bathroom Mein | Gyanendrapati 03.04.2026

उनके बाथरूम में ।  ज्ञानेन्द्रपति  उनके बाथरूम में वाशबेसिन के ऊपर लगे आईने की छाँव में रखे हैं दो टूथब्रश एक लम्बूतरे प्याले में बस माथ-भर दिखते मुँह से मिलाए मुँह दो टूथब्रश जिस घनिष्ठता का वे एक छायाचित्र हैं वह पिचकी हुई ट्यूब में चिपकी हुई टूथपेस्ट-सी बस ज़रा-सी बची है उनके मुँह भूल गए हैं चूमना एक-दूसरे को उन दोनों के मुँह दोमुँहेँ हो गए हैं धीरे-धीरे बेडरूम में और, ड्राइंगरूम में और वहाँ, ब...

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