Siva Prasad
Gita Acharan
Bhagavad Gita is a conversation between Lord Krishna and Warrior Arjun. The Gita is Lord's guidance to humanity to be joyful and attain moksha (salvation) which is the ultimate freedom from all the polarities of the physical world. He shows many paths which can be adopted based on one's nature and conditioning. This podcast is an attempt to interpret the Gita using the context of present times. Siva Prasad is an Indian Administrative Service (IAS) officer. This podcast is the result of understanding the Gita by observing self and lives of people for more than 25 years, being in public life.
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Episodes
106. खुशियों का लगाम 26.12.2023 4:00
एक बार, मध्य एशिया से घोड़े पर सवार होकर एक आक्रमणकारी ने दिल्ली पर कब्जा कर लिया और विजय जुलूस निकालना चाहा। एक हाथी को सजाया गया और उस पर चढऩे के बाद उसने हाथी की लगाम मांगी। जब बताया गया कि यह एक महावत द्वारा नियंत्रित है, तो वह नीचे कूद गया और अपने घोड़े को यह कहते हुए बुलवाया कि वह कभी ऐसी सवारी नहीं करता जिसकी लगाम उसके हाथ में नहीं होती। इसी तरह, हमें आत्म निरीक्षण करने की आवश्यकता है कि क्...
194. HE Dwells in Hearts of All 22.12.2023 3:29
Krishna says, "'That which is to be known' is the Sustainer, Destroyer and Creator of beings; indivisible and yet existing as if divided in living beings (13.17). The Light of lights; Beyond the darkness. He is knowledge, the object and the goal of knowledge. He dwells in the hearts of all (13.18). Realising this, My devotee attains My Being" (13.19). "He dwells in the heart...
105. चिरस्थायी आनंद 19.12.2023 3:44
श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो दिव्य ज्ञान की पक्की समझ रखते हैं और भ्रम से बाधित नहीं होते हैं, वह न तो कुछ सुखद पाने में आनन्दित होते हैं और न ही अप्रिय का अनुभव करने पर शोक करते हैं, वे ब्रह्म में स्थित होते हैं (5.20)। हम परिस्थितियों और लोगों को सुखद और अप्रिय के रूप में विभाजित करते हैं और ज्ञानी इस विभाजन को छोड़ देता है। श्रीकृष्ण बार-बार अर्जुन को मोह-माया से बाहर आने के लिए कहते हैं जहां हम यह...
74. శ్రద్ధ ఆనందాన్నిస్తుంది 15.12.2023 3:54
"దోషదృష్టి లేకుండ శ్రద్ధాయుక్తులై నా ఈ మతమును అనుసరించు మానవులు గూడ సమస్త కర్మబంధముల నుండి ముక్తులయ్యెదరు” అని శ్రీకృష్ణుడు హామీ ఇస్తున్నారు (3.31). శ్రద్ధ అంటే సాధారణంగా నమ్మకం లేదా విశ్వాసం అని భావిస్తారు కానీ అది వీటిని మించినది. మనకు సందేహాలు లేని, మన ప్రశ్నలన్నీ సమాప్తమాయ్యే స్థితి. చాలా కాలం వరకు సూర్యుడు భూమి చుట్టూ తిరుగుతున్నాడని మానవాళి విశ్వసించింది. విజ్ఞాన శాస్త్రం అది తప్ప...
74. श्रद्धा से आनंद 15.12.2023 4:11
श्रीकृष्ण कहते हैं कि, ‘‘जो कोई मनुष्य दोषदृष्टि से रहित और श्रद्धायुक्त होकर मेरे इस मत का सदा अनुसरण करते हैं, वे भी सम्पूर्ण कर्मों से छूट जाते हैं’’ (3.31)। श्रद्धा का अर्थ आमतौर पर विश्वास या आस्था माना जाता है, लेकिन श्रद्धा इन दोनों के परे है। इस अवस्था में हम संदेह से मुक्त होते हैं और हमारे सभी प्रश्न समाप्त हो जाते हैं। मानवता का मानना था कि सूर्य पृथ्वी के चारों ओर घूम रहा है जब तक यह प...
193. So Near Yet So Far. 14.12.2023 3:37
Once a father took his ten year old son to a playground. He threw a ball and the game is that the boy has to bring the ball back to his father. The ground is full of toys. On the way, the boy gets distracted by a toy and starts playing with it instead, till his father shouts to remind him about the ball. He leaves the toy and starts running after the ball again. There are other kids in the playgr...
104. निष्पक्षता प्राप्त करना 12.12.2023 4:02
श्रीकृष्ण कहते हैं कि जिसका मन और बुद्धि उस (आत्मा) में स्थित है और जिनके पाप जागरूकता से दूर हो गए हैं, वे बिना किसी वापसी की स्थिति में अर्थात शास्वत अवस्था में पहुंच जाते हैं (5.17)। अनजान जीना अँधेरे में जीने जैसा है, जहां हम गिरते रहते हैं और खुद को चोट पहुँचाते रहते हैं। अगला स्तर प्रकाश की कुछ चमक का अनुभव करने जैसा है जहां व्यक्ति एक पल के लिए जागरूकता प्राप्त करता है लेकिन फिर से अज्ञानता...
73. समर्पण की कला 07.12.2023 4:04
श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि, ‘‘मुझ अन्तर्यामी परमात्मा में लगे हुए चित्त द्वारा सम्पूर्ण कर्मों को मुझमें अर्पण करके आशारहित, ममतारहित और ज्वररहित होकर युद्ध कर’’ (3.30)। यह श्लोक गीता का सारांश है और यह दैनिक जीवन में हमारे कई संदेहों का निवारण करता है। हमारा पहला संदेह ‘हमें क्या करना चाहिए’ है, जो इसलिए उत्पन्न होता है क्योंकि हम जो कर रहे हैं उससे हम खुश नहीं हैं क्योंकि हमें लगता है कि खु...
192. He is and He is Not 07.12.2023 4:09
Curiosity is essential for survival. In today's context, one is expected to be updated in one's professional as well as personal life. Arjun raises the question of what is to be known (13.1). About this, Krishna earlier mentioned that 'once that is known there is nothing left to be known' (7.2). Krishna says, "I will declare 'That' which is to be known, which having...
73. సమర్పణ కళ 07.12.2023 3:40
“అంతర్యామిని, పరమాత్మను ఐన నాయందే నీ చిత్తమును ఉంచి, కర్మలనన్నింటినీ నాకే అర్పించి, జ్వరం, ఆశా మమతా సంతాపములను వీడి యుద్ధము చేయుము” అని శ్రీకృష్ణుడు అర్జునుడికి ఉపదేశించారు (3.30). ఈ శ్లోకం భగవద్గీత యొక్క సారాంశం; ఇది రోజువారీ జీవితంలో మన సందేహాలకు సమాధానం ఇస్తుంది. మన మొదటి సందేహం 'ఏం చెయ్యాలి' అనేది. సామాన్యంగా మనం చేసే పనిలో మనకు సంతృప్తి లేకపోవటం వల్ల, ఇంకేదో పనిలో సుఖం ఉంట...
103. पुण्य और पाप की जड़ें 05.12.2023 4:00
श्रीकृष्ण कहते हैं कि, ‘‘परमेश्वर मनुष्यों के न तो कर्तापन की, न कर्मों की और न कर्मफल के संयोग की रचना करते हैं, किन्तु स्वभाव ही बरत रहा है’’ (5.14)। परमेश्वर एक कर्ता नहीं बल्कि एक सृष्टा यानी रचनाकार या रचनात्मकता हैं। रचनाएं दो प्रकार की होती हैं। एक कुम्हार की तरह है जो मिट्टी के बर्तन बनाता है और सृष्टि (बर्तन) स्वतंत्र अस्तित्व के लिए निर्माता से अलग हो जाती है। दूसरा एक नर्तक की तरह है जो...
191. Being Spiritual 30.11.2023 4:23
In response to Arjun's request about knowledge (gyan), Krishna says, "Humility, simplicity, harmlessness, forgiveness, uprightness, service of the preceptor, purity, steadfastness, self-control (13.8). Dispassion (vairagyam) towards sense objects, absence ofahankaar (I am doer), perception of birth, death, old age and pain as flawed (13.9). Non-attachment, non-infatuation with children, s...
72. అపోహల ఖైదీ 30.11.2023 3:39
“ప్రకృతిగుణములచే పూర్తిగా మోహితులైన మనుష్యులు ఆ గుణముల యందును, కర్మలయందును మిక్కిలి ఆసక్తులగుదురు. అట్టి మిడిమిడి జ్ఞానముగల మందబుద్ధులైన అజ్ఞానులను పూర్తిగా తెలిసిన జ్ఞానియైనవాడు భ్రమకు (ఊగిసలాటకు) గురి చేయరాదు” అని శ్రీకృష్ణుడు చెప్పారు (3.29). మన కర్మలకు అసలైన కర్త అవడమే కాకుండా సత్త్వ, రజో, తమో గుణాలకు మన నిజమైన స్వభావాన్ని మరచిపోయేలా చేసి మనను మంత్రముగ్ధులను చేయగల సామర్థ్యం ఉంది. మనం వీట...
72. धारणाओं का कैदी 30.11.2023 3:56
श्रीकृष्ण कहते हैं कि, ‘‘प्रकृति के गुणों से अत्यन्त मोहित हुए मनुष्य गुणों में और कर्मों में आसक्त रहते हैं, उन पूर्णतया न समझनेवाले मंदबुद्धि अज्ञानियों को पूर्णतया जाननेवाला विचलित न करे’’ (3.29)। वास्तविक कर्ता होने के अलावा, गुणों में सम्मोहित करने और हम पर जादू करने की क्षमता होती है जो हमें हमारे वास्तविक स्वरूप को भुला देती है। हम तब तक मंत्रमुग्ध रहते हैं जब तक हमें एहसास नहीं हो जाता कि...
102. परिणाम का समभाव से स्वीकार 28.11.2023 3:47
श्रीकृष्ण कहते हैं कि योगी, संङ्गं (आसक्ति) को त्यागकर, केवल इंद्रियों -शरीर, मन और बुद्धि द्वारा अंत: करण की शुद्धि के लिए कर्म करते हैं (5.11)। यह व्याख्या की जाती है कि भले ही कोई वर्तमान क्षण में आसक्ति को छोड़ देता है, उसके पिछले कर्मबंधन पर ध्यान देने की आवश्यकता होती है। इसलिए वह कर्म करता रहता है। इसे देखने का एक और तरीका यह है कि एक बार अनासक्त होने के बाद, उसके पास भौतिक या प्रकट दुनिया...
190. Characteristics of Kshetra (field). 23.11.2023 4:06
Krishna refers to the physical body ( sariram ) as kshetra (field) and explains briefly its characteristics, its cause and effect ( vikar ); about kshetrajna (knower of the field) and the nature of His powers. He cautions that these were described by various sages and several spiritual texts in many ways (13.4 and 13.5). An important point is that kshetra and kshetrajna are described by various sa...
101. कमल के पत्ते का अनुकरण 21.11.2023 4:09
प्रत्येक भौतिक प्रणाली अलग-अलग इनपुट लेती है और कुछ आउटपुट उत्पन्न करती हंै। हम शब्दों और कर्मों जैसे अपने आउटपुट को लगातार मापते या आंकते हैं। हम दूसरों के कार्यों के साथ-साथ अपने आस-पास की विभिन्न स्थितियों को भी आंकते हैं। विकासवादी प्रक्रिया में, हमारे लिए खतरों को पहचानना बहुत जरूरी था। हालाँकि, समस्या कर्मों को सही या गलत निर्धारित करने के लिए मानकों के अभाव में है, जिसकी वजह से हम अक्सर अज्...
189. Field and Knower of the Field 16.11.2023 3:47
The thirteenth chapter of the Bhagavad Gita is called Kshetra Kshetrajna Vibhag Yog (Yoga through the distinction between the field and the Knower of the field). The chapter starts with Arjun's question, “I wish to understand what are prakriti (nature or matter) and purush (spirit or living entity); and what are kshetra (field) and kshetrajna (knower of the field). I also wish to know wha...
100. प्रतिक्रियात्मकता से सक्रियता तक 14.11.2023 4:18
जीवन एक दोतरफा प्रक्रिया है। हमें विभिन्न उत्तेजनाएं प्राप्त होती हैं और हम उनका जवाब देते रहते हैं। इस सन्दर्भ में श्रीकृष्ण कहते हैं कि, ‘‘तत्व को जानने वाला सांख्ययोगी तो देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूंघता हुआ, भोजन करता हुआ, गमन करता हुआ, (5.8) सोता हुआ, स्वास लेता हुआ, बोलता हुआ, त्यागता हुआ, ग्रहण करता हुआ तथा आँखों को खोलता हुआ और मूँदता हुआ भी, सब इन्द्रियाँ अपने-अपने अर्थों में...
71. గుణాల పరస్పర ప్రభావం 12.11.2023 3:21
“వాస్తవముగా కర్మలన్నియును అన్నివిధముల ప్రకృతి గుణముల ద్వారానే చేయబడుచుండును. అహంకార విమూఢాత్ముడు (అహంకారముచే మోహితమైన అంతః కరణముగల అజ్ఞాని) “ఈ కర్మలకు నేనే కర్తను' అని భావించును. కానీ, గుణ విభాగ తత్త్వమును, కర్మవిభాగ తత్త్వమును తెలిసికొన్న జ్ఞానయోగి గుణములే గుణముల యందు ప్రవర్తిల్లుచున్నవని భావించి వాటియందు ఆసక్తుడు కాడు” అని కృష్ణ భగవానుడు విశదీకరించారు (3.27, 3.28). భగవద్గీత యొక్క మూలో...
71. गुणों की परस्पर प्रक्रिया 12.11.2023 3:21
श्रीकृष्ण कहते हैं कि, ‘‘वास्तव में सम्पूर्ण कर्म सब प्रकार से प्रकृति के गुणों द्वारा किये जाते हैं तो भी जिसका अंत:करण अहंकार से मोहित हो रहा है, ऐसा अज्ञानी ‘मैं कर्ता हूँ’ ऐसा मानता है (3.27)। गुणविभाग और कर्मविभाग के तत्व को जानने वाला ज्ञानयोगी सम्पूर्ण गुण ही गुणों से बरत रहे हैं, ऐसा समझकर उनमें आसक्त नहीं होता’’ (3.28)। गीता का मूल उपदेश है कि किसी भी कार्य का कोई कर्ता नहीं होता है बल्कि...
188. In Tune with Existence 09.11.2023 3:38
Krishna says, "To whom praise and insult are the same, who is silent, content with anything, who is not attached to a place of stay, stable-minded; those devotees who follow this nectar of wisdom ( dharma ) declared here, endued with shraddha (trust), regarding Me as supreme -are exceedingly dear to me" (12.19 and 12.20). At its core, the game of praise and insult is the play of ahankaar...
99. द्वेष का त्याग करें, कर्म नहीं 07.11.2023 4:10
अज्ञान के कारण व्यक्ति भौतिक संपत्ति को हड़पने में लगा रहता है जिससे कर्मबंधन में बंधता है। जब जागरूकता की पहली किरण उतरती है, तो वह त्याग के बारे में सोचने लगता है जैसे अर्जुन यहां कोशिश कर रहे हैं। भ्रम इस बात में है कि क्या त्याग करें। सामान्य प्रवृत्ति सभी कर्मों या कार्यों को त्याग करने की होती है, क्योंकि हम उन्हें हमेशा अपने विभाजन करने वाले मन से अच्छे या बुरे के रूप में विभाजन करते हैं और...
70. సమయానికి అవకాశం ఇవ్వండి 05.11.2023 3:54
ఒక కాయ చెట్టు నుండి పోషకాలను గ్రహిస్తూ వృద్ధి చెందుతుంది. తరువాత అది తన స్వంత ప్రయాణాన్ని ప్రారంభించడానికి చెట్టు నుండి వేరు అవుతుంది. విత్తనము నుంచి చివరకు చెట్టుగా మారేవరకు, వివిధ దశలను కలిగి ఉంటుంది. మరోవైపు, అపరిపక్వ కాయ పండే వరకు, అంటే తన యాత్రను స్వయంగా ఆరంభించే దక్షత వచ్చేవరకు చెట్టుకు అంటిపెట్టుకుని ఉండాలి. పండిన పండు, అపరిపక్వమైన కాయను చెట్టును విడిచి పెట్టడానికి ఆకర్షించకూడదు ఎందుకంటే అప...
70. समय को एक मौका दें 05.11.2023 4:28
एक फल विकसित होने और पकने के लिए अपने मूल पेड़ से पोषक तत्वों को अवशोषित करता है। फिर वह अपनी यात्रा शुरू करने के लिए पेड़ से अलग हो जाता है। मूल वृक्ष से मुक्ति की यात्रा की शुरुआत से अंत में स्वयं वृक्ष बनने तक विभिन्न क्रियाएं शामिल हैं। दूसरी ओर, एक अपरिपक्व फल को मूल वृक्ष से तब तक जुड़ा रहना चाहिए जब तक कि वह पक न जाए, यानी अपनी यात्रा स्वयं शुरू करने में वह सक्षम न हो जाये। परन्तु, एक पके फ...
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