Vedanta Ashram
Vedanta Ashram Podcasts
Pravachans / Moral-Stories / Chantings / Bhajans - by Mahatmas of Vedanta Ashram, Indore
Szerző
Vedanta Ashram
Kategória
A podcast weboldala
Legutóbbi epizód
2024. márc. 17.
Hol hallgathatod?
Podcastok az alkalmazásban Replaio Radio HamarosanA podcastok hamarosan megérkeznek az alkalmazásba. Telepítsd most, és láss elsőként egy teljesen új megközelítést a podcastokhoz
Epizódok
साधना पञ्चकं : प्रवचन-30 (सूत्र-29) 20.09.2022 1:00:20
साधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के 30वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने ग्रन्थ के 29वें सोपान की भूमिका एवं रहस्य पर प्रकाश डाला। इसमें शंकराचार्यजी कहते हैं की " शीतोष्णादि विषह्यतां "- अर्थात, सर्दी और गर्मी आदि को सहना सीखो। अगर हमें दुनियां में जीना है तो हमें दुनिया को यथावत स्वीकारते हुए उसमे रहना आना चाहिए। दुनियाँ में जो विविधता है उसमे स्वाभाविक अतियाँ हैं - बहुत सर्दी, बहुत गर्मी...
प्रेरक कहानियाँ : दान, धर्म और धैर्य की परिक्षा (0922-03-sp) 20.09.2022 5:43
पू स्वामिनी पूर्णानन्द जी से एक सुन्दर प्रेरक कहानी सुनें जिसका शीर्षक है - दान, धर्म और धैर्य की परिक्षा।
साधना पञ्चकं : प्रवचन-29 (सूत्र-28) 19.09.2022 1:04:53
साधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के 29वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने ग्रन्थ के 28वें सोपान की भूमिका एवं रहस्य पर प्रकाश डाला। इसमें शंकराचार्यजी कहते हैं की " विधिवशात प्राप्तेन सन्तुष्यतां "- अर्थात, ईश्वर इच्छा से जो भी प्राप्त हो जाये उसमे संतुष्ट रहो। हिन्दू धर्म अर्थात सनातन वैदिक धर्म में ईश्वर का बहुत महत्त्व होता है। उनसे हमारा व्यावहारिक जीवन अत्यंत घनिष्ठता से जुड़ा रहता है। ह...
साधना पञ्चकं : प्रवचन-28 (सूत्र-27) 18.09.2022 1:00:34
साधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के 28वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने ग्रन्थ के 27वें सोपान की भूमिका एवं रहस्य पर प्रकाश डाला। इसमें शंकराचार्यजी कहते हैं की " स्वादुन्नं न तु याच्यतां "- अर्थात, स्वादिष्ट अन्न की याचना नहीं करना चाहिए। ब्रह्म-ज्ञान में निष्ठा उत्पन्न करने वाले साधकों को आचार्यश्री सुझाव दे रहे हैं की जब तुम भिक्षा माँगो तब ध्यान रहे तुम किसी से भी स्वादिष्ट अन्न की याच...
साधना पञ्चकं : प्रवचन-27 (सूत्र-26) 17.09.2022 1:01:45
साधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के 27वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने ग्रन्थ के 26वें सोपान की भूमिका एवं रहस्य पर प्रकाश डाला। इसमें शंकराचार्यजी कहते हैं की " प्रतिदिनं भिक्षौषधं भुज्यतां "- अर्थात, प्रतिदिन अपनी क्षुधा रुपी रोग के निवारण के लिए भिक्षा से प्राप्त भोजन रुपी औषधि ग्रहण करो। मनुष्य शरीर बहुत महत्वपूर्ण और विशिष्ट होता है अतः इसकी उचित देख-भल एक सन्यासी को भी करनी चाहिए। इ...
साधना पञ्चकं : प्रवचन-26 (सूत्र-25) 16.09.2022 1:02:09
साधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के 26वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने ग्रन्थ के चौथे श्लोक में प्रवेश करते हुए साधना पञ्चकं के 25वें सोपान की भूमिका एवं रहस्य पर प्रकाश डाला। इसमें शंकराचार्यजी कहते हैं की " क्षुध व्याधिश्च चिकित्सितां "- अर्थात, भूख रुपी बीमारी का नियमित उपचार करें। मनुष्य शरीर की प्राप्ति ईश्वर का एक बहुत बड़ा आशीर्वाद होता है। शरीर अपने आप में न तो कोई समस्या है और न ह...
साधना पञ्चकं : प्रवचन-25 (सूत्र-24) 15.09.2022 1:05:11
साधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के 25वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने ग्रन्थ के 24वें सोपान की भूमिका एवं रहस्य पर प्रकाश डाला। इसमें शंकराचार्यजी कहते हैं की " बुधजनैः वादः परित्यज्यतां "- अर्थात, बुद्धिमान लोगों के साथ विवाद नहीं करना चाहिए। स्वामीजी ने बताया की निदिध्यासन की साधना में प्राथमिकता अपनी ब्रह्म-स्वरूपता के ज्ञान को सहज बनाना होता है। इसमें कुछ समय एकांत में रहकर समाधि का...
साधना पञ्चकं : प्रवचन-24 (सूत्र-23) 14.09.2022 1:03:38
साधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के 24वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने ग्रन्थ के 23वें सोपान की भूमिका एवं रहस्य पर प्रकाश डाला। इसमें शंकराचार्यजी कहते हैं की " देहेहं मतिः रुझ्यतां "- अर्थात, अपने देह में अहम् की मति को समाप्त करो। ब्रह्म-ज्ञान में अपने को ब्रह्म जानने का लक्ष्य होता है, अतः आज तक जो हम सब अज्ञानवशात अपने को देह समझ रहे थे, उस मोह को शीघ्रातिशीघ्र समाप्त होना चाहिए। देह...
साधना पञ्चकं : प्रवचन-23 (सूत्र-22) 13.09.2022 55:06
साधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के 23वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने ग्रन्थ के 22वें सोपान की भूमिका एवं रहस्य पर प्रकाश डाला। इसमें शंकराचार्यजी कहते हैं की " अहरहः गर्वः परित्यज्यतां "- अर्थात, प्रतिक्षण अपने गर्व को सिर उठाने नहीं दें। गर्व खंड में होता है, परायों के साथ होता है, अपनों के साथ कोई गर्व नहीं करता है। जहाँ गर्व आया तो हम पुनः द्वैत में आ जाते हैं, और अपनी छोटी अस्मिता क...
प्रेरक कहानियाँ : परोपकार (0922-02-sp) 13.09.2022 5:20
पू स्वामिनी पूर्णानन्द जी से एक सुन्दर प्रेरक कहानी सुनें जिसका शीर्षक है - परोपकार।
साधना पञ्चकं : प्रवचन-22 (सूत्र-21) 12.09.2022 1:00:09
साधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के 22वें प्रवचन में पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने ग्रन्थ के 21वें सोपान की भूमिका एवं रहस्य पर प्रकाश डाला। इसमें शंकराचार्यजी कहते हैं की "ब्रह्मैवस्मि विभाव्यतां"- अर्थात, मैं ही ब्रह्म हूँ यह तीव्र भावना उत्पन्न करें। वेदान्त केवल ब्रह्म का ज्ञान ही नहीं देता है, बल्कि यह भी बताता है की हम सब मूल रूप से ब्रह्म ही हैं। हम सबका जो आज का व्यक्तित्व है वो जगत रु...
साधना पञ्चकं : प्रवचन-21 (सूत्र-20) 11.09.2022 1:03:48
साधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के 21वें प्रवचन में पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने ग्रन्थ के 20वें सोपान की भूमिका एवं रहस्य पर प्रकाश डाला। इसमें शंकराचार्यजी कहते हैं की " श्रुतिमतः तर्कोनुसन्धीयतां "- अर्थात, श्रुति-सम्मत तर्क का अनुसन्धान-पूर्वक आश्रय लें। ये पूरा प्रसंग महावाक्य पर मनन करने का प्रसंग चल रहा है। इसी तरह से मनन करा जाता है। आज तक हम भेद बुद्धि में जी रहे थे - अब अगर अभेद और...
साधना पञ्चकं : प्रवचन-20 (सूत्र-19) 10.09.2022 59:37
साधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के 20वें प्रवचन में पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने ग्रन्थ के 19वें सोपान की भूमिका एवं रहस्य पर प्रकाश डाला। इसमें शंकराचार्यजी कहते हैं की " दुस्तर्कात सुविरम्यतां "- अर्थात, दुस्तर्क से दूर रहें। आचार्यश्री ने पिछले सोपान में हमें महावाक्य के अर्थ को समझने में शास्त्रोक्त पक्ष का ही आश्रय लेने का सुझाव दिया था। अब यहाँ पर कह रहे हैं की शास्त्र के सिद्धांत के व...
साधना पञ्चकं : प्रवचन-19 (सूत्र-18) 09.09.2022 1:01:13
साधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के 19वें प्रवचन में पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने ग्रन्थ के 18वें सोपान की भूमिका एवं रहस्य पर प्रकाश डाला। इसमें शंकराचार्यजी कहते हैं की " श्रुतिशिरः पक्षः समाश्रितां " - अर्थात महावाक्य के अर्थ को समझने में शास्त्रोक्त पक्ष का ही आश्रय लें। गुरुमुख से महावाक्य सुनने के बाद भी बहुत सारे लोग गलत अर्थ घटित करते हुए पुनः संसार में भटक जाते हैं। इसलिए आचार्य कहते...
साधना पञ्चकं : प्रवचन-18 (सूत्र-17) 08.09.2022 1:01:01
साधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के 18वें प्रवचन में पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने ग्रन्थ तीसरे श्लोक में प्रवेश करते हुए उसमें प्रतिपादित 17वें सोपान की भूमिका एवं रहस्य पर प्रकाश डाला। इसमें शंकराचार्यजी कहते हैं की " वाक्यार्थश्च विचार्यतां " - अर्थात गुरुदेव द्वारा प्रतिपादित महावाक्य के 'अर्थ पर गहराई से विचार करो'। वाक्य का निर्माण शब्दों से होता है - यहाँ महावाक्यों में एक तरफ जीव प्रति...
साधना पञ्चकं : प्रवचन-17 (सूत्र-16) 07.09.2022 1:00:12
साधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के 17वें प्रवचन में पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने ग्रन्थ के दूसरे श्लोक के अंतिम सूत्र, एवं ग्रन्थ में प्रतिपादित 16वें सोपान की भूमिका एवं रहस्य पर प्रकाश डाला। इसमें शंकराचार्यजी कहते हैं की " श्रुतिशिरो वाक्यं समाकर्ण्यतां " - अर्थात उन श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ गुरुदेव के द्वारा आपके प्रश्न के उत्तर में वेदांत के महावाक्यों के रहस्य के प्रतिपादन को बहुत ही ध्या...
साधना पञ्चकं : प्रवचन-16 (सूत्र-15) 06.09.2022 1:00:42
साधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के 16वें प्रवचन में पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने ग्रन्थ में प्रतिपादित 15वें सोपान की भूमिका एवं रहस्य पर प्रकाश डाला। इसमें शंकराचार्यजी कहते हैं की " ब्रह्मैकाक्षरं अर्थ्यतां " - अर्थात ब्रह्म, जो एक और अक्षर है, उसे जानने की जिज्ञासा प्रकट करो। जब हमें किसी ज्ञानी की सन्निधि की प्राप्ति का सौभाग्य मिलता है, तो हमें उनसे क्या पूछना चाहिए, यह इस सोपान में बता...
प्रेरक कहानियाँ : धर्मो रक्षति रक्षितः (0922-01-sp) 06.09.2022 9:00
पू स्वामिनी पूर्णानन्द जी से एक सुन्दर प्रेरक कहानी सुनें जिसका शीर्षक है - धर्मो रक्षति रक्षितः।
साधना पञ्चकं : प्रवचन-15 (सूत्र-14) 05.09.2022 1:05:15
साधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के 15वें प्रवचन में पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने ग्रन्थ में प्रतिपादित 14वें सोपान की भूमिका एवं रहस्य पर प्रकाश डाला। इसमें शंकराचार्यजी कहते हैं की " प्रतिदिनं तत्पादुका सेव्यतां " - अर्थात सदैव गुरुदेव की चरण पादुका की सेवा करें, अर्थात उनके मूल्य एवं रहन-सहन के अनुरूप उनकी और उनके आश्रम की यथा आवश्यक सेवा करें। सेवा के अनेकों प्रयोजन होते हैं। एक तो आप जिन...
साधना पञ्चकं : प्रवचन-14 (सूत्र-13) 04.09.2022 1:01:48
साधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के 14वें प्रवचन में पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने ग्रन्थ में प्रतिपादित 13वें सोपान की भूमिका एवं रहस्य पर प्रकाश डाला। इसमें शंकराचार्यजी कहते हैं की " सद्विद्वान उपसर्पयतां " - अर्थात सद्विद्वान के निकट जाईये। किसी भी ज्ञान की प्राप्ति के लिए व्यक्ति को उस विषय के विद्वान, अर्थात विशेषज्ञ के पास जाना चाहिए। एक दीप से ही दूसरा दीप जलता है। बिना गुरु के ज्ञान न...
साधना पञ्चकं : प्रवचन-13 (सूत्र-12) 03.09.2022 1:01:59
साधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के 13वें प्रवचन में पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने ग्रन्थ में प्रतिपादित १२वें सोपान की भूमिका एवं रहस्य पर प्रकाश डाला। इसमें शंकराचार्यजी कहते हैं की " दृढतरं कर्माशु संत्यज्यतां " - अर्थात दृढ़ता से कर्म को शीघ्र त्याग दें। इसका अर्थ गहराई से समझने योग्य है। एक समय ये ही आचार्य और शास्त्र हम सबको कर्म को अच्छी तरह से करने की प्रेरणा देते हैं, और अब वे ही कर्म...
साधना पञ्चकं : प्रवचन-12 (सूत्र-11) 02.09.2022 1:04:24
साधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के 12वें प्रवचन में पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने ग्रन्थ में प्रतिपादित ११वें सोपान की भूमिका एवं सूत्र पर प्रकाश डाला। इसमें शंकराचार्यजी कहते हैं की " शान्त्यादिः परिचियतां " - अर्थात शांति आदि गुणों का चयन कर उनके लिए अभ्यास करो। इससे पिछले सूत्र में ईश्वर भक्ति की प्राप्ति हेतु लक्ष्य बताया था, अब शांति आदि गुणों की प्राप्ति की बात कह रहे हैं। ऐसा इस लिए है...
साधना पञ्चकं : प्रवचन-11 (सूत्र-10) 01.09.2022 1:01:05
साधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के ११वें प्रवचन में पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने ग्रन्थ में प्रतिपादित दसवें सोपान की भूमिका एवं चर्चा करी। इसमें भगवान् शंकराचार्यजी कहते हैं की " भगवतो भक्ति: दृढ़ाधीयताम " - अर्थात भगवान् के प्रति दृढ़ भक्ति उत्पन्न करनी चाहिए। सत्पुरुष लोगों के साथ का यह ही प्रसाद और आशीर्वाद होता है। उन्ही को सत्पुरुष कहते हैं जो सरल, संतुष्ट, भगवत सेवा और भक्ति से युक्त और...
साधना पञ्चकं : प्रवचन-10 (सूत्र-9) 31.08.2022 1:02:20
साधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के १०वें प्रवचन में पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने ग्रन्थ में प्रतिपादित नवें सोपान की भूमिका एवं नवें सूत्र पर प्रकाश डाला। इसमें शंकराचार्यजी कहते हैं की " संघ: सत्सु विधीयतां " - अर्थात सत्पुरुषों का साथ उत्पन्न करो। अपने घर की अनुकूलता के दायरे से निकल कर अब ऐसा साथ ढूढना ही अगला सोपान है। सत्पुरुष लोग यद्यपि सबके प्रति स्नेह रखते हैं लेकिन वे किसी स्वतः सत...
प्रेरक कहानियाँ : सब हमारे हाथ में है (0822-04-sp) 30.08.2022 4:22
पू स्वामिनी पूर्णानन्द जी से एक सुन्दर प्रेरक कहानी सुनें जिसका शीर्षक है - सब हमारे हाथ में है।
Hasonló podcastok
A Replaio nem podcastkiadó; a műsorok nevei, borítóképei és hanganyagai a szerzőiket illetik, és nyilvános RSS-csatornákon keresztül terjednek.