Siva Prasad
Gita Acharan
Bhagavad Gita is a conversation between Lord Krishna and Warrior Arjun. The Gita is Lord's guidance to humanity to be joyful and attain moksha (salvation) which is the ultimate freedom from all the polarities of the physical world. He shows many paths which can be adopted based on one's nature and conditioning. This podcast is an attempt to interpret the Gita using the context of present times. Siva Prasad is an Indian Administrative Service (IAS) officer. This podcast is the result of understanding the Gita by observing self and lives of people for more than 25 years, being in public life.
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Auteur
Siva Prasad
Catégorie
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Dernier épisode
27 oct. 2026
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Épisodes
223. बुराई का फल बुरा ही होता है 09.05.2026 3:56
श्रीकृष्ण आसुरी प्रवृत्ति वालों का विस्तार से वर्णन करते हुए कहते हैं,"ऐसे अनेक प्रकार से भ्रमित मन वाले, मोह के जाल में उलझकर तथा विषय-भोगों में आसक्त होकर घोर नरक में गिरते हैं (16.16)। ऐसे अभिमानी और हठी लोग, संपत्ति के मद और अहंकार से मदमस्त होकर, शास्त्रों के विधि-विधानों का आदर न करते हुए पाखंडपूर्वक केवल नाम मात्र के लिए यज्ञ करते हैं (16.17)। अहंकार (मैं कर्ता हूँ), बल, दम्भ, कामना और...
222. शक्ति का दर्प सही नहीं 29.04.2026 3:39
श्रीकृष्ण कहते हैं कि आसुरी प्रवृत्ति वाला व्यक्ति सोचता है, “मैंने आज यह प्राप्त कर लिया है और अब इस इच्छा को पूरा करूँगा। यह सब मेरा है और कल मुझे इससे भी अधिक मिलेगा (16.13)। मैंने इस शत्रु को मार डाला है और अन्य शत्रुओं को भी मार डालूँगा। मैं मनुष्यों में शासक हूँ; मैं भोगी हूँ, मैं पूर्ण, शक्तिशाली और सुखी हूँ (16.14)। मैं धनवान और कुलीन हूँ; मेरे समान और कौन है? मैं त्याग करूँगा, मैं दान करू...
221. साधन और साध्य - दोनों शुद्ध हों 23.04.2026 3:57
श्रीकृष्ण आसुरी स्वभाव वालों के बारे में आगे कहते हैं, "यह मानते हुए कि यह सारा संसार शारीरिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए है, ऐसे लोग मृत्युपर्यंत सांसारिक चिंताओं में डूबे रहते हैं (16.11)। सैकड़ों इच्छाओं, काम और क्रोध के बन्धन में बंधे हुए, वे अपनी इंद्रियों की तृप्ति के लिए अन्यायपूर्ण तरीकों से धन संचय करने का प्रयास करते हैं" (16.12)। जब इच्छाएँ पूरी नहीं होतीं, तो क्रोध स्वाभाविक है,...
220. तर्क से परे 23.04.2026 3:40
श्रीकृष्ण ने अस्तित्व की व्याख्या करते हुए कहा कि यह प्रकृति और पुरुष का संयोग है, जो दोनों अनादि हैं। गुण और विकार प्रकृति से उत्पन्नहोते हैं (13.20)। जबकि प्रकृति कारण और प्रभाव के लिए जिम्मेदार है, पुरुष उन्हें सुख और दुःख के द्वंद्वों के रूप में अनुभव करता है (13.21)। श्रीकृष्ण ने आगे स्पष्ट किया कि वह नाशवान प्रकृति से अतीत हैंऔर अविनाशी पुरुष से भी उत्तम हैं, इसलिए उन्हें पुरुषोत्तम (परम पुर...
219. बन्धन से मुक्ति 25.03.2026 4:18
श्रीकृष्ण कहते हैं, “तेज (चरित्र का तेज), क्षमा, धैर्य, पवित्रता, शत्रुभाव का न होना और प्रतिष्ठा की इच्छा से मुक्त होना; ये सब दिव्य प्रवृत्ति से संपन्न लोगों के दैवीय गुण हैं (16.3)। दम्भ, अहंकार, अभिमान, क्रोध, कठोरता और अज्ञानता उस व्यक्ति के लक्षण हैं जो आसुरी प्रवृत्ति के साथ जन्म लेता है (16.4)। संसार में दो प्रकार के प्राणी हैं- एक वे जो दैवीय गुणों से सम्पन्न हैं और दूसरे वे जो आसुरी प्रव...
218. अहिंसा 23.03.2026 3:37
श्रीकृष्ण कहते हैं, “अहिंसा, सत्य, अक्रोध, त्याग, शान्ति, निन्दा न करना, सभी प्राणियों पर दया, लोभ से मुक्ति, नम्रता, विनयशीलता, स्थिरता ये सब दैवीय गुण हैं (16.2)। जबकि अहिंसा एक दिव्य गुण है, कुरुक्षेत्र का हिंसक युद्ध एक बड़ी बाधा है जिसे भगवद्गीता को समझने के लिए पार करने की आवश्यकताहै। सबसे पहले, इस विरोधाभास का उत्तर श्रीकृष्ण ने पहले ही दे दियाथा जब उन्होंने अर्जुन से कहा था कि यदि वह सुख-द...
216. भय से पार पाना 20.03.2026 4:17
भगवद्गीता के सोलहवें अध्याय का शीर्षक ‘दैव-असुर सम्पद विभाग योग’ है। इसका अर्थ है दैवी और आसुरी स्वभावों के बीच के भेद को समझकर परमात्मा से एकत्व की प्राप्ति करना। हममें से प्रत्येक व्यक्ति में अनेक गुण होते हैं, जिन्हें दैव (दैवी) और असुर (आसुरी) कहा जा सकता है। दैव वह आंतरिक यात्रा है जो परमात्मा की ओर ले जाती है, जबकि असुर प्रवृत्ति हमें उनसे दूर ले जाती है। श्रीकृष्ण ने ‘अभयं’ (भय का आभाव) को...
217. दान व्यापार नहीं है 20.03.2026 3:58
श्रीकृष्ण ने अंतःकरण शुद्धि (आंतरिक पवित्रता), ज्ञानयोग में दृढ़ता, दान, इंद्रियोंपर नियंत्रण, यज्ञ, स्वाध्याय (स्वयं का अध्ययन) और सत्यनिष्ठा को कुछ दैवी गुणों के रूप में वर्णित किया है (16.1)। भगवद्गीता में एक सामान्य सूत्र इंद्रियों पर नियंत्रण है। यद्यपि इन्द्रियाँ हमारे अस्तित्व के लिए आवश्यक हैं, फिर भी वे इच्छाएँ उत्पन्न करके हमें बाँधती हैं, जिसके परिणामस्वरूप हम मुक्ति के दिव्य मार्ग से भ...
215. खुला रहस्य 08.03.2026 3:53
भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय को 'पुरुषोत्तम योग' कहा जाता है। यह शीर्षक निम्नलिखित श्लोक से लिया गया है जहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं, "मैं नाशवान कार्य प्रकृति (सृष्टि) से परे हूँ और अविनाशी आत्मा (कूटस्थ) से भी उत्तम हूँ। इसलिए, वेदों और जगत में मुझे पुरुषोत्तम कहा गया है" (15.18)। एक बार जब जागरूकता स्थापित होने लगती है, तो हमारे सामने दो मूलभूत प्रश्न आते हैं: हमें क्या करना चाहिए...
214. कैसे और क्यों 07.03.2026 4:03
परमात्मा अनन्त सागर के समान हैं और आत्मा एक अविनाशी बूंद है जो नाशवान मानव शरीर में स्थित है। श्रीकृष्ण उस सागर का वर्णन करते हुए कहते हैं, "सूर्य में स्थित तेज जो सम्पूर्ण जगत को प्रकाशित करता है तथा जो तेज चन्द्रमा में है और अग्नि में भी है, उसको तू मेरा ही तेज जान (15.12)। मैं पृथ्वी में व्याप्त होकर सभी जीवों को अपनी शक्ति से पोषित करता हूँ। चन्द्रमा के रूप में मैं सभी वनस्पतियों को जीवन...
213. परमात्मा और आत्मा 06.03.2026 3:33
श्रीकृष्ण विभिन्न संदर्भों में 'सृष्टि' की व्याख्या करते हैं और संकेत देते हैं कि सम्पूर्ण अस्तित्व प्रकृति और पुरुष का समन्वय है। उनका गर्भ महत्-ब्रह्म (महान प्रकृति) है जिसमें वे बीज स्थापित करते हैं जो सभी प्राणियों के जन्म का कारण है (14.3)। गुण और विकार प्रकृति से उत्पन्न होते हैं (13.20) और प्रकृति ही कारण और प्रभाव के लिए भी उत्तरदायी है; पुरुष सुख और दुःख के द्वंद्वों का अनुभव करने...
212. पुनर्जन्म के नियम 25.02.2026 3:48
श्रीकृष्ण ने जीवन की एक रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए कहा कि उनका एक अंश देहधारी आत्मा के रूप में प्रकट होता है और इंद्रियों को आकर्षित करता है जो प्रकृति का हिस्सा हैं। यह संकेत करता है कि इच्छाएँ ही इंद्रियों को आकर्षित करती हैं। उदाहरण के लिए, देखने या सुनने की इच्छा के कारण, क्रमशःआँख या कान जैसी इंद्रियों का विकास हुआ। वे आगे देहधारी आत्मा के शरीर त्यागने और नए शरीर में प्रवेश करने की प्रक्रिया क...
211. जीवन की रूपरेखा 01.02.2026 3:26
सृष्टि को परमात्मा की लीला या दिव्य नाटक कहा जाता है और यहाँ गंभीरता से लेने जैसा कुछ भी नहीं है। इस दिव्य नाटक में कुछ नियमों का पालन किया जाता है। श्रीकृष्ण इन नियमों की व्याख्या करते हुए कहते हैं, "इस भौतिक संसार की जीवात्माएँ मेरी शाश्वत आत्मा का केवल एक अणु अंश मात्र हैं और पाँच इंद्रियों और मन को आकर्षित करती हैं, जो प्रकृति का एक हिस्सा हैं (15.7)। श्रवण, दृष्टि, स्पर्श, स्वाद, गंध की...
210. उनके धाम की कुंजियाँ 28.01.2026 3:47
श्रीकृष्ण कहते हैं, "वे जो अभिमान और मोह से मुक्त हो गए हैं, जिन्होंने आसक्ति की बुराइयों पर विजय पा ली है, जो निरंतर अपनी आत्मा और भगवान में लीन रहते हैं, जिनकी कामनाएँ पूर्ण रूप से नष्ट हो गई हैं और सुख-दुःख के द्वन्द्वों से परे हैं, ऐसे मान और मोह रहित ज्ञानीजन मेरे शाश्वत धाम को प्राप्त करते हैं" (15.5)।मूलतः, ये उनके धाम में पहुँचने के गुण हैं और यदि एक बार हम इनकोप्राप्त कर लेते है...
209. अनासक्ति की कुल्हाड़ी 25.01.2026 3:34
श्रीकृष्ण ने जीवन के उल्टे वृक्ष की बात की, जहाँ मनुष्य नीचे की ओर लटकती कर्म रूपी जड़ों से बंधा हुआ है। श्रीकृष्ण हमें तुरंत इस बन्धन से मुक्त होने के लिए 'अनासक्ति की कुल्हाड़ी' का प्रयोग करने की सलाह देते हैं (15.3)। अनासक्ति भगवद्गीता के मूलभूत सिद्धांतों में से एक है। श्रीकृष्ण ने कईअवसरों पर इस शिक्षा का उल्लेख किया है। मोटे तौर पर, हम लोगों, वस्तुओं, भावनाओं, विचारों और विश्वासों से...
208. जीवन का उल्टा वृक्ष 19.01.2026 4:01
भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय को 'पुरुषोत्तम योग' कहा जाता है। श्रीकृष्ण इस अध्याय का प्रारम्भ उल्टे जीवन वृक्ष का वर्णन करते हुए कहते हैं, "ज्ञानी लोग एक शाश्वत अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष की चर्चा करते हैं, जिसकी जड़ें ऊपर की ओर और शाखाएँ नीचे की ओर होती हैं, और जिसके पत्ते वेदों के मंत्र हैं। जो इस वृक्ष को जानता है, वही वास्तव में वेदों का ज्ञाता है (15.1)। तीनों गुणों से पोषित, इस वृक्ष...
207. एकनिष्ठ भक्ति 14.01.2026 3:19
भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय को ‘गुण त्रय विभाग योग’ कहा जाता है, जिसमे गुणों और गुणातीत की व्याख्या की गई है। श्रीकृष्ण इस अध्याय का समापन गुणों से परे जाने का उपाय बताते हुए करते हैं और कहते हैं, "जो लोग अनन्य (अव्यभिचारेण) भक्ति के साथ मेरी सेवा करते हैं, वे तीनों गुणों से ऊपर उठकर ब्रह्म (गुणातीत) के स्तर पर पहुँच जाते हैं (14.26), क्योंकि मैं ही उस निराकार ब्रह्म का आधार हूँ जो अमर, अविनाशी, श...
206. गुणातीत का आचरण 04.01.2026 4:09
श्रीकृष्ण गुणातीत के आचरण के बारे में बताते हैं जो प्रकृति के तीन गुणों से ऊपर उठ गए हैं और कहते हैं, “वे जो सुख और दुःख में समान रहते हैं;जो आत्मा में स्थित हैं; जो मिट्टी के ढेले, पत्थर और सोने के टुकड़े को समान मानते हैं; जो सुखद और अप्रिय घटनाओं में एक समान रहते हैं; जो बुद्धिमान हैं, जो निन्दा और प्रशंसा दोनों को समभाव से स्वीकार करते हैं; जो सम्मान और अपमान में एक समान रहते हैं; जो मित्र और...
205. गुण- दासता से प्रभुत्व तक 31.12.2025 4:00
यह समझाने के बाद कि सत्व, रजस् और तमस् नामक तीन गुण आत्मा को भौतिक शरीर से बांधते हैं, श्रीकृष्ण इन गुणों को पार करके गुणातीत या निर्गुण बनने के लिए कहते हैं। अर्जुन ने तुरंत पूछा कि इन तीनों गुणों से अतीत पुरुष के लक्षण क्या हैं, उसका आचरण कैसा होता है और वह इन तीनोंगुणों से कैसे परे जाता है (14.21)। श्रीकृष्ण कहते हैं, "तीनों गुणों से अतीत मनुष्य सत्वगुण से उत्पन्न प्रकाश, रजोगुण से उत्पन्न कर्म...
122. 'అంతా ఆయనే' అనే మంత్రం 22.12.2025 3:46
పరమాత్ముని రూపంలో ఉన్న శ్రీకృష్ణుడు, "సకల ప్రాణులయందును ఆత్మరూపముననున్న నన్ను (వాసుదేవుని) చూచుపురుషునకు, అట్లే ప్రాణులన్నింటిని నాయందు అంతర్గతములుగా ఉన్నట్లు చూచువానికి నేనుఅదృశ్యుడుని కాను, అతడును నాకు అదృశ్యుడు కాడు" అనిచెప్పారు (6.30). ఈ శ్లోకం భక్తి యోగానికి పునాది, ఇక్కడఅభ్యాసకులు ప్రతిచోటా మరియు ప్రతి పరిస్థితిలోనూ పరమాత్మను దర్శించగలుగుతారు. 'అంతా అయనే' అనే మంత్రంలో, '...
204. मृत्यु के दो प्रकार 17.12.2025 3:56
श्रीकृष्ण कहते हैं, "जब बुद्धिमान व्यक्ति (द्रष्टा) यह देखते हैं कि सभी कार्यों में प्रकृति के तीनों गुणों के अलावा कोई कर्ता नहीं है और जो तीनों गुणों से अत्यन्त परे मुझ परमात्मा को तत्त्व से जानते हैं, वे मेरी दिव्य प्रकृति को प्राप्त करते हैं (14.19)। शरीर से संबद्ध तीन गुणों को पार करके गुणातीत होकर शरीरधारी जीव (देही) जन्म, मृत्यु, रोग, बुढ़ापे और दुःखों से मुक्त होकर अमरत्व (मोक्ष)...
121. నమస్కారం యొక్క శక్తి 17.12.2025 3:31
భారతీయులు తారసపడినప్పుడు ఒకరికొకరు నమస్తే, సమస్కారం అని అభినందించుకుంటారు. 'నీలోని దైవత్వానికి వందనం' అన్నది ఈ పదానికి అసలైన అర్థం. విభిన్న సంస్కృతులలోని శుభాకాంక్షలు ఇదే విధమైన సందేశాన్ని అందిస్తాయి. "అన్నిజీవులలో తన ఆత్మను మరియు అన్ని జీవులని తన ఆత్మలో చూడటం మరియు ప్రతిచోటా అదే చూడటం" (6.29) అన్న శ్రీకృష్ణుడు ప్రభోధాన్ని ఆచరణలో పెట్టటడమే ఈ పదము యొక్క ప్రయోగం. ఈ అవగాహనతో మనము...
203. गुणों के पहलू 08.12.2025 4:00
श्रीकृष्ण कहते हैं, "जब देहधारी जीव सत्त्वगुण की प्रधानता में मृत्यु को प्राप्त होता है, तब वह उत्तम ज्ञान वालों के शुद्ध लोकों को प्राप्त होता है(14.14)। जो व्यक्ति रजोगुण की प्रधानता में शरीर त्याग करता है, वह कर्मों में आसक्त लोगों के बीच जन्म लेता है। और जो तमोगुण में लीन होकर मृत्यु को प्राप्त होता है, वह मूढ़ (अविवेकी या अज्ञानमय) योनियों में जन्म लेता है"(14.15)। श्रीकृष्ण ने पह...
202. प्रभावशाली गुण की पहचान 02.12.2025 4:24
श्रीकृष्ण कहते हैं, "सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण नामक प्रकृति से उत्पन्न तीन गुण अविनाशी जीवात्मा को शरीर में बांधते हैं (14.5)। इनमें, सत्वगुण निर्मल होने के कारण आत्मा को सुख और ज्ञान के भावों के प्रति आसक्ति उत्पन्न करके उसे बन्धन में डालता है (14.6)। रजोगुण की प्रकृति इच्छा है। यह कामना और आसक्ति को जन्म देता है और आत्मा को कर्म में बांधता है (14.7)। तमोगुण अज्ञान से उत्पन्न होता है और दे...
201. माता और पिता 30.11.2025 3:43
भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय का शीर्षक 'गुण त्रय विभाग योग' अर्थात्गुणों से परे जाकर एकता है। यह पहले बताए गए प्रकृति के वर्णनका विस्तार है। इस अध्याय में, श्रीकृष्ण प्रकृति से उत्पन्न गुणों के बारे में और ज्ञान प्राप्त करके उनको कैसे पार किया जाए इस विषय में गहराई से बताते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं, "अब मैं पुनः तुम्हें सभी ज्ञानों में उत्तम उस परम ज्ञान के विषय में बताऊँगा, जिसे जानकर...
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